कीनिया में चुनावी सुगबुगाहट से सहमे लोग

कीनिया में चुनावी हिंसा इमेज कॉपीरइट afp
Image caption कीनिया में चार साल पहले हुई चुनावी हिंसा में लगभग एक हजार लोग मारे गए.

अफ्रीकी देश कीनिया में अगले साल मार्च में आम चुनाव होने हैं, लेकिन अभी से देश चुनावी बुखार की गिरफ्त में आने लगा है. साथ ही लोगों में ये आशंकाएं भी घर करने लगी हैं कि कहीं 2007 के विवादास्पद राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुई हिंसा जैसे हालात फिर पैदा न हो जाएं.

कई लोगों का माना है कि पिछली बार जैसी चुनावी हिंसा को रोकने के लिए पुख्ता कदम नहीं उठाए गए हैं. नकुरु घाटी चुनावी हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक रही.

इसी इलाके में है कामवाउरा कस्बा जहां अलग अलग कबीलों से संबंध रखने वाले लोग रहते हैं. इस इलाके में भी चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं.

इसके साथ लोगों के बीच हिंसा की आशंकाएं भी पैदा होने लगी हैं जो उन्हें कबायली आधार पर बांट देती है.

सहमे लोग

सैम्युएल कनिआरू को पिछली बार चुनावी हिंसा में काफी कुछ गंवाना पड़ा. दंगाईयों ने उनके घर को तहस नहस कर दिया. इस बार भी वो सहमे हुए हैं.

वो कहते हैं, "चुनाव की तैयारियों के बीच हमारी चिंताएं फिर बढ़ गई हैं. असुरक्षा, चोरी और लोगों को जबरदस्ती उनके घरों से निकाले जाने को हम भूले नहीं हैं. हमें वापस अपने खेतों में लौटने और वहां सुरक्षित महसूस करने में वक्त लगेगा. इसीलिए हम सरकार से कह रहे हैं कि क्या वे हमारे लिए शांति सुनिश्चित कर सकते हैं.

कनीआरू के पड़ोसी लिविंगस्टोन बोगोंको भी अपना घर और संपत्ति गंवा चुके हैं. वो देश के राजनेताओं से एक ही अपील करते हैं.

उनका कहना है, "हम अपने देश के राजनेताओं से अपील करते हैं कि वे देश में स्थायी शांति और सुरक्षा कायम करें. हम ऐसी सुरक्षा नहीं चाहते जो सिर्फ चंद वर्षों तक ही चल पाए. हम दीर्घकालीन शांति चाहते हैं. हम बंटवारा नहीं चाहते हैं. हम सब केन्याई लोग शांति से रहना चाहते हैं."

बढ़ रहे हैं अवैध हथियार

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption 2007 के चुनाव में राइला ओडिंगा ने राष्ट्रपति म्वाकी किबाकी को टक्कर दी लेकिन बाद में ओडिंगा राष्ट्रीय एकता वाली सरकार में प्रधानमंत्री बन गए.

पिछली बार 2007 दिसंबर के विवादास्पद चुनावों के बाद हुई हिंसा में 2008 के दौरान लगभग एक हजार लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. हालांकि अगला चुनाव अभी महीनों दूर है, लेकिन चुनावी बुखार ने देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है.

चुनावों के हिंसक होने की आशंकाएं पैदा होने लगी हैं. स्मॉल आर्म सर्वे नाम के संगठन का अध्ययन कहता है कि इस वक्त देश में सबसे ज्यादा अवैध हथियार हैं.

शोधकर्ता मानाशेह वेपुंडी का मानना है कि इतनी ज्यादा मात्रा में हथियारों का होना बताता है कि लोग अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं.

वो कहते हैं, "लोगों को बार बार हिंसा, हत्याएं, बर्बादी और दंगों से जुड़े अनुभव रहे हैं, और सरकार की तरफ से उन्हें रोकने के लिए संतोषजनक कदम भी नहीं उठाए जाते हैं. उन्हें बचाने की पहल भी नहीं होती है. ऐसे में, लोग अगली बार ऐसे हालात पैदा होने के लिए बेहतर तैयारी कर लेना चाहते हैं."

अमन कारवां

वैसे सरकार अपनी तरफ से शांति को बढ़ावा देने की कुछ कोशिशें कर रही है. राष्ट्रीय मेलमिलाप और एकता आयोग गीत संगीत के जरिए लोगों के बीच एकजुटता पैदा करने की कोशिश करता है.

खास तौर से चलती फिरती गाड़ियों यानी अमन कारवां के जरिए संगीत कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. टॉम एमबोया ऐसी एक गाड़ी के साथ हैं और लोगों को शांति बनाए रखने की अहमियत समझाते हैं. उनका कहना है कि मार्च में होने वाले चुनावों के दौरान दोस्त एक दूसरे के दुश्मन न बनें.

वो कहते हैं, "भले ही आपका संबंध किसी दूसरे समुदाय से हो, लेकिन आपको बाकी लोगों के साथ रहना सीखना होगा. आप ये तो तय नहीं कर सकते कि कहां पैदा होंगे. लेकिन ये तो तय कर सकते हैं कि कहां रहेंगे. अब उन्होंने इसे अपना घर चुना है तो हम सब एक साथ मिल जुल कर क्यों नहीं रह सकते."

केन्या में लोकतांत्रिक प्रकिया पिछले चुनावों की छाया मुक्त नहीं दिखती. देश में ज्यादातर लोग मानते हैं कि राजनेता चुनावी फायदे के लिए कबीलों के बीच टकराव को हवा देते हैं.

वैसे ये भी उम्मीद की जानी चाहिए कि अमन कारवां जैसी कोशिशों का कुछ असर होगा और चुनावी माहौल में फैसला वोट से होगा, हथियारों से नहीं.

संबंधित समाचार