गूगल के 'डूडल्स' कला या तकनीक?

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क्या आपने कभी सोचा है कि गूगल के 'लोगो' की जगह हर दिन दिखने वाले एक नए कलात्मक डिज़ाइन के पीछे किसका दिमाग है?

इस डिज़ाइन को 'डूडल' भी कहा जाता है जिसे हर दिन लाखों-करोड़ों लोग देखते हैं.

कभी माउस के एक इशारे पर बजने वाला लेस पॉल गिटार, कभी रॉबर्ट मूग की याद में पैकमैन गेम तो कभी ओलंपिक खेलों से जुड़े कार्टून... ये गूगल के होम पेज पर अब तक के दिखाई देने वाले कुछ बेहतरीन 'डूडल्स' में से एक हैं.

जो चीज़ 1998 में अंग्रेज़ी में लिखे गए गूगल के शब्द 'ओ' से सटी एक आकृति हुआ करती थी वो अब किसी खेल, लोकप्रिय घटना या किसी व्यक्तिव से जुड़ी एक कलात्मक प्रस्तुती बन गई है.

अब तक करीब 1000 से ज्यादा डूडल्स बन चुके हैं जो प्रसिद्ध के साथ-साथ कम जाने-पहचानी हस्तियों और सालगिरह या वर्षगांठ से जुड़े होते हैं.

इनमें से कुछ तो बेहद रोचक और कुछ बेतुके भी होते हैं, लेकिन इन्हें काफी संवादात्मक और दिलचस्प पाया जाता है.

ज़ाहिर है हर रोज़ गूगल का इस्तेमाल करने वाले करोड़ों लोगों का ध्यान अनायास ही इन डिज़ाइनों की ओर आकर्षित हो जाता है.

रचनात्मक सोच

2012 के ओलंपिक आयोजनों के दौरान हर दिन किसी एक खेल से जुड़ा एक नया डूडल गूगल के होमपेज पर सर्च-बार के ऊपर नज़र आता रहा.

कभी यहां तैराकी से जुड़ी जानकारियां होती थीं तो कभी निशानेबाज़ी से जुड़ी, और हर नए डूडल के साथ इंटरनेट पर उससे जुड़े अनगितन लेख पढ़े जा सकते थे.

हर दिन एक नए प्रसंग के साथ लोगों को लुभाना कोई आसान काम नहीं होता होगा. डूडल्स का उद्देश्य है दफ्तरों में रोज़मर्रा का काम कर रहे लोगों की रूचि बढ़ाना और उन्हें विविधता का एहसास कराना.

इन डूडल्स को हम चाहें तो डिज़ाइन के तौर पर समझें या कला के तौर पर, सच्चाई ये है कि आज के समय में इसे सबसे ज्यादा देखा और पढ़ा जा रहा है.

उदाहरण के तौर पर चार्ली चैपलिन के डूडल्स देखें. इसे देखकर आपको उस टीम के बारे में थोड़ा-बहुत समझ में आ जाएगा जो अपने आपको भी 'डूडलर्स' कहते हैं और इस काम को अंजाम देते हैं.

ये वो लोग हैं जो कैलिफोर्निया के एक छोटे से ऑफिस में बैठकर हर दिन एक नया डूडल बनाते हैं.

इस टीम के रचनात्मक लीडर रयान जरमिक के अनुसार उनके दिमाग पर कभी भी ये बात हावी नहीं होती की उनके काम को लाखों लोग देख या पढ़ रहे हैं.

जरमिक कहते हैं, ''मानव मस्तिष्क ये समझ पाने में असमर्थ होता है कि किसी चीज़ को लाखों लोग किस तरह से लेंगे. मेरे लिए ज़्यादा मायने ये रखता है कि मैं अपने साथियों और दोस्तों को कितना हंसा सकता हूं या कैसे कोई नई तकनीक सीख सकता हूं. हमें कलाकार या डिज़ाइनर की श्रेणी में मत रखिए. हम बस ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हम कला और तकनीक को सबसे बेहतर स्वरूप में दुनिया के सामने पेश कर सकें."

उनका मानना है कि वे मनोरंजन, कला, तकनीक और ग्राफिक्स डिज़ाइन के बीच एक पुल बनाने का काम करते हैं.

कला या व्यवसाय?

Image caption डूडल का चुनाव इस टीम के लिए रोज़ एक नई चुनौति होती है

गूगल के पन्ने पर किस चीज़ या विषय को जगह देनी है, इसका फैसला काफी लोकतांत्रिक तरीके से किया जाता है.

इसमें ज़्यादा ध्यान इस चीज़ पर दिया जाता है कि जो विषय चुना गया है, उसमें आश्चर्य कितना ज्यादा है बजाय किसी आम सालगिरह की तारीख का जश्न मनाने पर.

इसमें दूसरे देशों में स्थित गूगल के दफ्तर से मिलने वाली युक्तियों का भी काफी महत्व होता है.

इस रचनात्मक कृति को देखकर ये भी सवाल मन में आता है कि क्या डूडल बनाना एक कला है या इसे महज़ व्यावसायिक ऐनक से देखा जाए?

कला के बारे में जो बात कही जाती है वो ये है कि कला का कोई व्यावसायिक पहलु नहीं होता.

लेकिन देखा जाए तो डूडल के मामले में व्यापारिक कला का एक व्यवहारिक पहलु भी होता है.

ग्राफिक डिज़ाइनर सी स्कॉट के अनुसार डूडल्स एक तरह से मॉडर्न आर्ट का ही एक रूप है, लेकिन मार्केटिंग कंपनी सेवेन ब्रांड्स की मुख्य कार्यकारी अधिकारी जैसमिन मोंटगोम्री इससे सहमत नहीं है.

जैसमिन के अनुसार, ''जब आपको आपकी रचनात्मकता के लिए पैसे दिए जाने लगते हैं तब आपका काम कला के दायरे से बाहर हो जाता है. क्योंकि तब आप अपने व्यवसायिक कर्ताधर्ता की बात मानते हैं ना कि रचनात्मक गुरु की.''

ये कला है या व्यवसाय या फिर दोनों का मिश्रण, इस बात पर भले ही मतभेद बना रहे, लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि डूडल्स का काफी दिलचस्प, रोचक और आकर्षक होते हैं.

और जब तक गूगल का बाजा़र पर वर्चस्व बरकरार रहेगा, तब तक इसके होमपेज पर दिखने वाले डूडल्स आपकी इंटरनेट सर्फिंग का एक अहम हिस्सा होंगे.

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