खतरों के बावजूद खतना कराने पर विवश होते लड़के

 सोमवार, 20 अगस्त, 2012 को 09:10 IST तक के समाचार
खतना की प्रक्रिया

खतना कब और कहाँ शुरु हुआ ये कहना तो मुश्किल है लेकिन ये दुनिया भर में प्रचलित है. कई जगह धार्मिक कारणों से और कई जगह दूसरी वजहों से.

मुसलमान और यहूदी खतना धार्मिक वजह से करवाते हैं लेकिन अफ़्रीका के बहुत से हिस्से में ये पारंपरिक तरीके से होता है.

हालांकि अब स्वास्थ्य का मसला भी जुड़ गया है.

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लेकिन दक्षिण अफ्रीका के कुछ जातीय समूहों में खतना कराना मर्दानगी की पहचान माना जाता है.

वहाँ खतना नहीं कराने वाले पुरुषों का मज़ाक उड़ाया जाता है, उन्हें जाति से बाहर कर दिया जाता है.

यही वजह है कि दक्षिण अफ्रीका में हर साल हजारों लड़कों का खतना किया जाता है.

समस्या ये नहीं है, समस्या ये है कि सही तरीके से खतना नहीं होने की वजह से कई बार जान को खतरा पैदा हो रहा है.

इसकी वजह से इसका विरोध भी होने लगा है.

मर्द बनने का दबाव

इस्टर्न केप राज्य के क़ुमू गांव में रहने वाले 18 वर्षीय एक युवक को इसलिए मर्द नहीं माना जाता था क्योंकि उन्होंने खतना नहीं कराया था.

खतना के लिए तैयार बच्चे

गलत तरीके से खतना होने की वजह से हर साल कई बच्चों की मौत हो जाती है

वे कहते हैं, ''मेरी कक्षा के सभी लड़कों का खतना हो चुका है, वो मुझे चिढ़ाते थे कि मैं अभी भी एक 'छोटा बच्चा' हूं. मैं खतना कराने के लिए दबाव महसूस करता था क्योंकि तभी मुझे सम्मान मिल सकता था.''

इसी दबाव में ये युवक अपने माता-पिता को बताए बिना खतना कराने चला गया जिस पर उसे अब अफसोस होता है.

अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा ये युवक यहां दो महीने से भर्ती है जहां उसके साथ मारपीट की जाती है, उसे भूखा रखा जाता है और कई बार पीने के लिए पानी तक नहीं दिया जाता.

इसकी वजह ये है कि खतना करने वाले कुछ पारम्परिक 'सर्जन' मानते हैं कि ऐसा करने से युवक सही मायने में दमदार मर्द बनते हैं.

ये युवक उन 300 लड़कों में से एक है जिन्हें खतना करने वाले ऐसी जगहों से जून से अगस्त महीनों के बीच बचाया गया है, जिन्हें वे स्कूल कहते हैं.

स्वास्थ्य अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि इनमें से कई लड़के मौत की कगार पर पहुंच गए थे, उनके शरीर में पानी की कमी हो गई थी और उनके घाव सड़ने लगे थे.

'कीड़े-मकोड़ों की तरह मौत'

समाज के गुस्से का शिकार बनने के डर से अपना नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर एक किशोर ने बताया कि खतने की पीड़ा के बाद उन्हें कई तरह की शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ा.

"ज्यादातर मौजूदा पारम्परिक सर्जन प्रशिक्षित नहीं है, उन्हें ठीक तरीके से खतना करना नहीं आता है. ये पैसा कमाने का तरीका बन गया है"

नेग्लेनी गांव के मुखिया जोंगुमहाबा

वे कहते हैं, ''खतने के एक हफ्ते बाद मेरा वज़न कम होने लगा और मैं बेहद कमजोर महसूस करने लगा. मेरा लिंग सूजा हुआ था. मुझे एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, तब तक मुझे गंभीर संक्रमण हो चुका था.''

इस किशोर का इलाज कर रहीं नर्सों का कहना है कि खतने की वजह से बना घाव सड़ने लगा, जिससे उसकी ये दशा हुई.

इस तरह के खतने की प्रथा दक्षिण अफ्रीका के दो जातीय समूहों में बहुत प्रचलित है. परम्परा के हिसाब से इन किशोरों को लोगों की निगाहों से दूर पहाड़ों में अलग-थलग रहते हुए लगभग छह हफ्ते बिताने होते हैं.

वहां इन किशोरों को अनुशासन और साहस के साथ समाज में एक सम्माननीय व्यक्ति बनने का तरीका सिखाया जाता है.

खतने का मौसम और दुर्दशा

दक्षिण अफ्रीका में खतना ज्यादातर जून-जुलाई और नवंबर-दिसम्बर महीनों में किए जाते हैं.

"हमारे बच्चे कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे हैं. मैं चाहती हूं कि इस तरह खतना करने वालों को गिरफ्तार करके सजा दी जाए"

खतना पीड़ित एक बच्चे की मां

ईस्टर्न केप के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, इन महीनों में लगभग 20,000 किशोरों को 'खतना-स्कूलों' में भर्ती कराया जाता है.

कुछ 'खतना-स्कूल' मशहूर हैं जहां आमतौर पर गड़बड़ी नहीं होती, लेकिन हजारों किशोर फर्जी 'सर्जन' के हाथों पड़ जाते हैं.

नेग्लेनी गांव के मुखिया जोंगुमहाबा बताते हैं, ''ज्यादातर मौजूदा पारम्परिक सर्जन प्रशिक्षित नहीं है, उन्हें ठीक तरीके से खतना करना नहीं आता. ये पैसा कमाने का तरीका बन गया है.''

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पास ही के अस्पताल में अपने बच्चे की दुर्दशा पर आंसू बहाती एक मां कहती है, ''हमारे बच्चे कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे हैं. मैं चाहती हूं कि इस तरह खतना करने वालों को गिरफ्तार करके सजा दी जाए.''

अधिकारियों का कहना है कि गलत तरीके से खतना करने की वजह से यहां बीते पांच वर्षों में 240 से ज्यादा लड़कों की मौत हो गई है जिनमें से कुछ की उम्र 13 के आसपास थी.

"ये तभी हो सकता है जब हम खुलकर बात करें कि खतना किस तरह किया जा रहा है. हमें उम्मीद है कि इससे बच्चों को मरने से बचाया जा सकेगा"

लिबो कोबोशियाने, मंत्री

उनका कहना है कि बच्चों की मौत और दिल दहला देने वाली इन कहानियों के बावजूद किसी को गिरफ्तार करना मुश्किल है क्योंकि लोग सामने नहीं आते.

ईस्टर्न केप सरकार के पारम्परिक मामलों के मंत्री लिबो कोबोशियाने कहते हैं कि सरकार इन मामलों में दखल नहीं देना चाहती, लेकिन खतना करने वाले फर्जी 'सर्जनों' की धरपकड़ के लिए जातीय समूहों का सहयोग जरूरी है.

वे कहते हैं, ''ये तभी हो सकता है जब हम खुलकर बात करें कि खतना किस तरह किया जा रहा है. हमें उम्मीद है कि इससे बच्चों को मरने से बचाया जा सकेगा.''

दक्षिण अफ्रीका के ग्रामीण इलाकों में खतना करने वाले फर्जी 'सर्जन' बड़ी संख्या में हैं.

हालांकि सरकार ने खतना करने वालों के लिए 'परमिट' जारी किए हैं, फिर भी कई लोग बिना मंजूरी के धड़ल्ले से गलत तरीके से खतना कर रहे हैं.

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