मुर्दों की पक्की दोस्त

 सोमवार, 20 अगस्त, 2012 को 05:00 IST तक के समाचार
श्वे ज़ी क्वेत

किसी बर्मीज़ महिला के लिए खास तौर पर एक ऐसी महिला के लिए जो की एक नामचीन फ़िल्मी सितारे की ग्लैमरस पत्नी हो, जिसे अच्छी जिंदगी जीने की आदत हो वो एक ऐसा पेशा अपनाए यकीन नहीं होता.

पर साल 2001 में श्वे ज़ी क्वेत ने उन लोगों के लिए अंतिम संस्कार सेवा शुरू की जो इसका ख़र्च नहीं उठा सकते.

श्वे ज़ी क्वेत के पति चो तू, एक ज़माने में बर्मा के सबसे प्रसिद्द कलाकारों में से एक होते थे और एक पैसे वाले परिवार से ताल्लुक रखते हैं.

बर्मा के शहर रंगून में श्वे ज़ी क्वेत की सहायता संस्था अपने किस्म की पहली संस्था है. हांलाकि इस विचार की शुरुआत हुई मंडाले से जहाँ श्वे ज़ी क्वेत की एक रिश्तेदार इसी तरह की एक संस्था चलाती हैं. अब श्वे ज़ी क्वेत की संस्था सारे बर्मा में अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने में मदद करती है.

"सच बात तो यह है कि जब मैंने पहली बात एक मुर्दे को छुआ था तो मैं घबराई हुई थी. पर आप ज़रा सोचें कि हम सबको एक दिन इसी रास्ते से जाना है"

श्वे ज़ी क्वेत

बर्मा में बौद्ध धर्म के लोगों की बहुलता है. बौद्ध धर्म में अंतिम संसकारों का एक पूरा विधान है. और इन संस्कारों में काफी पैसा ख़र्च करना होता है.

सबसे पहले तो शव को तैयार करना होता है, शव के साथ चढ़ावे देने होते हैं, संस्कार करने वालों को भेंट देनी होती है और उसके अलावा बौद्ध भिक्षुओं को भोजन भी करना होता है. यह संस्कार कई दिनों तक चलते हैं.

श्वे ज़ी क्वेत बताती हैं "सच बात तो यह है कि जब मैंने पहली बात एक मुर्दे को छुआ था तो मैं घबराई हुई थी. पर आप ज़रा सोचें कि हम सबको एक दिन इसी रास्ते से जाना है"

दृढ़ता

आरंभ में श्वे ज़ी क्वेत के दोस्तों और परिवार वालों की प्रतिक्रया कुछ उत्साहित करने वाली नहीं थी लेकिन धीरे धीरे उनका रुख बदलने लगा.

सामाजिक रूप परंपरावादी बर्मा में शवों को अंतिम संस्कारों के लिए तैयार करने को कोई बहुत अच्छा काम नहीं माना जाता. केवल एक समूह के लोग ही यह काम करते हैं और उन लोगों के बीच भी यह काम पीढ़ियों से चला आ रहा है.

श्वे ज़ी क्वेत याद करती हैं "आरंभ में मेरे रिश्तेदारों को भी लगता था कि मुझे हो क्या गया है. वो मुझसे पूछते थे कि मैं यह अप्रिय काम क्यों कर रही हूँ लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि सबसे अधिक ज़रूरतमंदों की मदद करना सबसे अच्छा काम है."

श्वे ज़ी क्वेत कहती हैं कि आम लोगों का दुख उन्हें हिला देता है. वो एक किशोर लड़के को याद करती हैं जो अपनी माँ के अंतिम संस्कार के लिए पैसे जमा कर रहा था.

"मैं आश्चर्यचकित रह गईं थी, पर उसी पल मुझे यहाँ लगा कि मेरा यह काम सबकी मदद कर रहा है चाहे वो मेरे दोस्त हो या शत्रु"

श्वे ज़ी क्वेत

श्वे ज़ी क्वेत बताती हैं कि उसके पिता पहले ही मर चुके थे और वो अपनी माँ के साथ रहता था. अगर उनकी संस्था उस लड़के मदद नहीं करती तो वो अपना घर भी खो देता.

कठिनाइयां

श्वे ज़ी क्वेत का काम उन्हें सरकारी अधिकारीयों के बीच बहुत अधिक लोकप्रिय बनाता हो ऐसा नहीं है. साल 2007 में आये चक्रवात बाद श्वे ज़ी क्वेत और उनके पति को हिरासत में ले लिया गया था और उनसे सात दिन तक पूछ ताछ की गई थी.

बर्मा की तत्कालीन सैन्य सरकार चक्रवात से हुए नुकसान को लेकर बहुत संवेदनशील थी और वो यह नहीं चाहती थी कि दुनिया में इस बारे में ज़्यादा बात करे.

वो हिरासत में अपने दौर को याद करते हुए एक वाकया बताती हैं कि एक महिला पुलिस अधिकारी से उन्होंने कहा कि वो अपना काम बंद करना चाहती हैं क्यों कि यह सरकार को पसंद नहीं.

उस महिला पुलिस ने उनसे ऐसा नहीं करने के लिए बार बार अनुरोध किया और उसने श्वे ज़ी क्वेत को बताया कि उसकी कि साल भर पहले उसकी माँ के अंतिम संस्कार में श्वे ज़ी क्वेत के संस्था ने मदद की थी.

श्वे ज़ी क्वेत कहती हैं " मैं आश्चर्यचकित रह गईं थी, पर उसी पल मुझे यहाँ लगा कि मेरा यह काम सबकी मदद कर रहा है चाहे वो मेरे दोस्त हो या शत्रु."

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