नौका चलाने की सबसे खतरनाक जगह?

 सोमवार, 27 अगस्त, 2012 को 13:51 IST तक के समाचार
ढाका में नावें

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हजारों लोग अपनी जान हथेली पर रख कर रोजाना छोटी छोटी नावों में सवार होकर बूड़ीगंगा नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे पर पहुंचते हैं.

बूडीगंगा नदी पर कुछ ही पुल हैं. रिहायशी इलाकों से रोजाना शहर के व्यावसायिक केंद्र में जाने वाले 25 हजार लोगों के लिए इकलौती पतवार से चलने वाली छोटी छोटी लकडी की नावें ही आने जाने का जरिया हैं.

यहां कोई आपात सेवा भी नहीं है. अगर कोई हादसा हो जाता है तो दूसरे नाव वालों को लोगों को बचाना पड़ता है.

मोहम्मद अब्दुल्लाह लतीफ उन बहुत से नाविकों में से एक हैं जो नदी के एक किनारे पर बसे रिहायशी इलाकों से लोगों को दूसरे किनारे पर स्थित शहर के मुख्य व्यावसायिक केंद्र तक ले कर जाते हैं.

ये सफर कितना खतरनाक है, इसके बारे में लतीफ बताते हैं, “रोजाना एक या दो नावें तो यहां डूबती ही हैं. कभी कभी छोटी नावें बड़ी नावों के नीचे चली जाती हैं और लोग मारे जाते हैं.”

जोखिम भरा सफर

ढाका नाव की सवारी

मोहम्मद अब्दुल लतीफ और कॉलिन विडो

नाव को खेना 40 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में बेहद मुश्किल काम है, खास कर 70 वर्षीय लतीफ के लिए.

वो बताते हैं, “इस सफर के लिए हिम्मत और हौसले की जरूरत होती है. अगर आपने बहादुरी नहीं दिखाई तो समझो आप गए.”

कुछ महीने पहले लतीफ के दोस्त की नाव को एक बड़ी मोटर बोट ने टक्कर मार दी थी. उस वक्त में नौ लोग सवार थे और वो पूरी भरी हुई थी.

वो बताते हैं, “मैंने उनमें से आठ लोगों को बचा लिया. बाकी एक शव तीन दिन बाद मिला था. अपने यात्रियों को बचाना हमारी जिम्मेदारी है. कभी कभी यात्रियों को बचाने के लिए हम अपनी जान को भी जोखिम में डालते हैं.”

कितना अंतर है!

"रोजाना एक या दो नावें तो यहां डूबती ही हैं. कभी कभी छोटी नावें बड़ी नावों के नीचे चली जाती हैं."

अब्दुल लतीफ, नाविक

लेकिन इस बहादुरी के एवज में इन नाविकों को ज्यादा कुछ नहीं मिलता है. नदी पार जाने वाले हर यात्री से उन्हें दो टका यानी 1.36 रुपया किराया मिलता है.

अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए लतीफ को एक दिन में 60 से ज्यादा बार नदी के आर पार जाना होता है. कभी कभी तो वो रात तक भी काम करते हैं.

लंदन की टेम्स नदी में चलने वाली वूलिच नौका पर ब्रिज ऑफिसर के तौर पर काम करने वाले कॉलिन विंडो ने दो हफ्ते ढाका में गुजारे और वो इस बात से हैरान हैं कि बांग्लादेश के नाविकों की जिंदगी कितनी मुश्किल है.

लतीफ के बारे में उनका कहना है, “वो पूरा दिन नाव चलाते हैं. बस थोड़ी देर के लिए वो काम छोड़ते हैं, वो भी शायद नमाज पढ़ने के लिए. लेकिन 70 साल की उम्र में भी वो हाथों से नाव को खे कर नदी के इतने चक्कर लगाते हैं. वो वाकई अद्भुत हैं.”

'पंख होते तो उड़ जाता'

ढाका नाव

बहुत से लोगों के रोजी रोटी का ये इकलौता जरिया हैं.

लतीफ कहते हैं कि शहर में रहना आसान नहीं है. लेकिन बाकी दूसरे नाव वालों की तुलना में उनका गुजर बसर आराम से हो रहा है.

उनके पास अपनी नाव है और उनके परिवार के पास रहने के लिए ढाका के झुग्गी बस्ती इलाके में एक कमरा भी है.

वहीं बहुत से दूसरे नाविकों को नाव किराए पर लेनी पड़ती है और वे रात में उसी पर सोते भी हैं.

लतीफ बताते हैं, “हमारे यहां एक कहावत है, ‘अगर मेरी बाहों पर पंख होते तो मैं वापस अपने गांव चला जाता’.”

राजधानी ढाका में लगभग दो हजार लोग अपने गांव छोड़ कर आते हैं. बांग्लादेश में मौसम के बदलते मिजाज के कारण किसान खेती से रोजी रोटी नहीं कमा पाते हैं और शहरों का रुख कर रहे हैं.

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