जब छात्रों के गढ़ में दिखा छावनी सा माहौल

 सोमवार, 27 अगस्त, 2012 को 16:56 IST तक के समाचार
छात्रसंघ

मायावती ने अपने शासन काल के दौरान छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगा दी थी.

लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर का नज़ारा आजकल कुछ बदला-बदला सा है. हर तरफ आपको यहां पुलिस के जवान गश्त लगाते दिख सकते हैं.

अगले कुछ हफ़्तों में विश्वविद्यालय छात्र संघों के चुनाव होने वाले हैं और कैंपस में शांति बनाए रखने के लिए पुलिस पूरी तरह से मुस्तैद है.

पुलिस इस बात का पूरा ध्यान रख रही है कि बाहरी लोग यानी गैर-छात्र विश्वविद्यालय परिसर में न प्रवेश करें.

शुक्रवार को पुलिस ने तलाशी के दौरान कई बाहरी युवकों को देसी कट्टे के साथ पकड़ा जिसके बाद उन्हें थाने भेज दिया गया.

विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर प्रोफेसर ओ पी शुक्ल पुलिस टोली के साथ गश्त लगाते मिले. उनके अनुसार पूरे परिसर में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए छात्रों के परिचय पत्र देखे जा रहे हैं ताकि कोई बाहरी लोग न आयें. प्रोफ़ेसर शुक्ल कहते हैं कि प्रजातांत्रिक देश में छात्रसंघ के चुनाव होने चाहिए.

प्रोफ़ेसर शुक्ल और उनके सहयोगी प्रोफ़ेसर अजय मिश्र को उम्मीद है कि लिंगदोह समिति की सिफारिशों के आधार पर चुनाव होने से रचनात्मक रुझान वाले छात्र चुनाव के मैदान में आगे आयेंगे.

लेकिन कई दूसरे प्रोफ़ेसर इससे सहमत नही हैं. उनका कहना है कि फिर से ऐसे छात्र नेता आएंगे जो गुंडागर्दी और ठेकेदारी करेंगे और गलत लोगों को प्रवेश दिलाने से लेकर पास कराने तक के लिए दबाव डालेंगे.

आशंका

यह आशंका बेवजह भी नही है. ख़बरों के अनुसार चुनाव को लेकर गोरखपुर में तो दो छात्र नेताओं की हत्या भी हो चुकी है.

"साल 2006 में लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर आर पी सिंह ने छात्र संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था जो तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को नागवार गुजरा था."

कानपुर में कथित छात्र नेताओं ने अध्यापकों की पिटाई कर दी, जिसके बाद उन्होंने अपने आपको चुनाव प्रक्रिया से अलग करने की घोषणा कर दी है.

छात्र संघ नेताओं के द्वारा पूर्व में की गई कई करतूतों के कारण साल 2006 में लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर आर पी सिंह ने छात्र संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था जो तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को नागवार गुजरा था.

कुलपति के फैसले के विरोध में उपद्रव के चलते विश्वविद्यालय काफी दिन बंद रहा फिर 100 से अधिक छात्र नेताओं को निष्कासित करने के बाद ही विश्विद्यालय खोला जा सका.

प्रोफ़ेसर आरपी सिंह ने मेधावी छात्रों को प्रतिनिधित्व देकर छात्र काउसिंल बनाई और वे स्वयं भी छात्रों को उपलब्ध रहते थे.

साल 2007 में सरकार संभालने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति के चलते होने वाले उपद्रव और गुंडागर्दी को रोकने के लिए छात्र संघों पर प्रतिबंध लगा दिया था.

समाजवादी पार्टी ने मायावती के इस निर्णय का विरोध करते हुए आंदोलन चलाया था और सत्ता में आने पर छात्र यूनियनों की बहाली का वादा किया था.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनाव जीतने के तुरंत बाद मार्च में ही अपना चुनावी वादा पूरा करते हुए सभी विश्वविद्यालयों और डिग्री कालेजों में छात्र संघों के चुनाव को हरी झंडी दे दी.

गहमा-गहमी

"पिछले सालों में विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिस मनमाने तरीके से प्रवेश से लेकर, परीक्षा, हॉस्टल और मेस जैसी सुविधाओं की फीस बढ़ाई है उससे माहौल में घुटन है. चूंकि छात्रों की कहीं सुनवाई नहीं होती है, इसलिए छात्र संघ तो होना चाहिए, छात्रों को ऐसा नेता चाहिए जो उनकी समस्यायें उठा सके."

अनामिका, छात्रा

इसलिए गर्मी की छुट्टियां खत्म होने पर विश्वविद्यालय खुलते ही पुराने छात्र नेताओं ने चक्कर लगाने शुरू कर दिए. ये नेता बड़ी-बड़ी लक्ज़री गाडियां लेकर आ रहे हैं, जिन पर प्रचार के स्टिकर लगे हैं.

अखबारों में ख़बरें छपने पर प्रशासन ने छात्र नेताओं के प्रचार होर्डिंग्स उतरवाकर भारी जुर्माना लगाया है.

यह कार्यवाही तब शुरू हुई जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक सख्त़ बयान जारी करते हुए दोहराया कि छात्रसंघ चुनाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जे एम लिंगदोह समिति की सिफारिशों के आधार पर होंगे.

इन सिफारिशों में कहा गया है कि केवल वही छात्र चुनाव लड़ सकेंगे, जिनका कोई आपराधिक इतिहास न हो जिनकी उम्र 25 साल से ज्यादा नहीं होगी और जो क्लास में नियमित रूप से उपस्थित रहे हों.

लेकिन सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन समाजवादी छात्र सभा के कई नेता अभी इन सिफारिशों से सहमत नही हैं, क्योंकि इनसे पुराने नेता चुनाव प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे.

जहाँ तक आम छात्र- छात्राओं की बात है, उनके अनुसार पिछले पांच सालों में विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिस मनमाने तरीके से प्रवेश से लेकर, परीक्षा, हॉस्टल और मेस जैसी सुविधाओं की फीस बढ़ाई है और पानी से लेकर टॉयलेट आदि की सुविधाएं घटाई हैं, उससे माहौल में घुटन है.

बीए तीसरे वर्ष की छात्रा अनामिका के मुताबिक , "छात्रों को एक ऐसा नेता चाहिए जो उनकी समस्याओं को उठा सके."

छात्र नेता याद दिलाते हैं कि डाक्टर शंकर दयाल शर्मा लखनऊ विश्विद्यालय के ही छात्र थे और छात्र राजनीति ने देश को कई बड़े नेता दिए हैं, इसलिए लोकतंत्र में नये नेतृत्व के विकास के लिए छात्र संघ के चुनाव होने चाहिए.

कई उभरते हुए छात्र नेताओं का कहना है कि अगर सत्तारूढ़ दल अपने नेताओं पर काबू पा ले तो फिर कोई दूसरा समस्यायें पैदा नहीं कर पाएगा.

छात्रसंघ

लखनऊ विवि के छात्र लंबे समय से छात्रसंघ चुनाव करवाने की मांग कर रहे हैं.

अधिकारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बयान से समाजवादी छात्र नेताओं में कड़ा संदेश तो गया है लेकिन अभी किसी को यही समझ नहीं है कि आख़िर लिंगदोह समिति की सिफारिशों को चुनाव प्रक्रिया पर क्या असर पडेगा.

सरकार के रुख से यह साफ़ है कि छात्र संघ बहाल होंगे और अगले कुछ हफ़्तों में चुनाव होंगे. इसलिए लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ भवन में बरसों से लटक रहे ताले को खोलने और इमारत की रंगाई - पुताई की तैयारी कर रहा है.

मगर कई लोगों को आशंका है कि अगर छात्र संघ चुनाव के बाद विश्वविद्यालय के कैंपस में पहले जैसी अराजकता और गुंडागर्दी वापस आती है तो समाजवादी पार्टी को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड सकता है.

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