भारत-ईरान दोस्त, अमरीका गया 'तेल' लेने

 बुधवार, 29 अगस्त, 2012 को 19:51 IST तक के समाचार
ईरान का तेल

ईरान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गैस भंडार हैं

ऊपर से दिखाने की कोशिश है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा गुटनिरपेक्ष बैठक के सिलसिले में ही हैं और ये द्विपक्षीय बैठक नहीं है, और प्रधानमंत्री का ईरान जाना मात्र इत्तिफाक है.

ये तो बात रही कूटनीति की कि किस तरह अमरीका और यूरोपियन यूनियन के सामने स्पष्टीकरण दिया जाए.

अहम बात ये है कि ईरान भारत के लिए तेल और गैस मामलों पर इतनी अहमियत रखता है कि भारत अपने संबंध ईरान से पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता, चाहे अमरीका और यूरोपियन कुछ भी चाहें.

समझने की बात ये है कि भारत ने अमरीका और यूरोपियन यूनियन के दबाव में आकर ईरान से आयात जरूर कम किया है लेकिन साथ-साथ भारत वहाँ पर तेल औऱ गैस से जुड़े कामों को भी बढ़ाया है.

भारत की कंपनियाँ, जैसे इंडियन ऑयल और ओएनजीसी विदेश, ने वहाँ तेल के नए भंड़ारों में निवेश को बढ़ाना शुरू किया है.

इसके अलावा ईरान में भारत ने ये भी कोशिश की है कि वहाँ हम औऱ ज्यादा निवेश कर सकें, खासकर तेल और गैस के कुओं के अंदर.

ईरान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गैस भंडार हैं. भारत को भी गैस की बहुत जरूरत है क्योंकि भारत की निर्भरता गैस पर बढ़ रही है.

सरकार इसे अच्छी तरह से जानती है.

प्रधानमंत्री का ईरान दौरा बेहद महत्वपूर्ण है. भारत ईरान को समझाने की कोशिश करेगा कि वो परमाणु हथियार बनाने के कार्यक्रम पर काम नहीं करें क्योंकि भारत नहीं चाहता कि ईरान के पास आणविक हथियार हों. क्योंकि अगर ऐसा होता है तो मध्य-पूर्व औऱ मध्य-एशिया का इलाका एकदम बदल जाएगा और परमाणु हथियारों से लैस ईरान इसमें सूनामी का काम करेगा.

भारत ये नहीं चाहता क्योंकि इससे भारी अस्थिरता पैदा होगी. भारत ईरान से लंबे संबंध रखना चाहता है और ईरान को समझाना चाहता है कि जो आज की स्थिति है जिसमें ईरान अलग-थलग पड़ गया है, ये हमेशा रहने वाली नहीं है. ये जल्दी बदलेगी.

भारत सोचता है कि जब भी ईरान में स्थिति बदले तो भारत वहाँ पर फ्रंटलाइन निवेशक और तेल और गैस का खरीदार हो.

अमरीका अफगानिस्तान से निकलने की तैयारी कर रहा है. भारत नहीं चाहता कि अफगानिस्तान की स्थिति इतनी कमजोर हो जाए कि पाकिस्तान उसे हथिया ले.

भारत की अफगानिस्तान नीति तभी सफल हो सकती है जब भारत औऱ ईरान इस मसले पर मिलकर काम करें. इसलिए भारत वहाँ पर बंदरगाह और हवाइअड्डे के लिए भारी निवेश कर रहा है क्योंकि ईरान मध्य-एशिया के लिए एकमात्र रास्ता है.

बड़ा एजेंडा

पड़ोसी देश

"अमरीका चाहता है कि भारत की अफगान नीति सफल हो और भारत अफगानिस्तान में ज्यादा निवेश करे"

नरेंद्र तनेजा

मेरा मानना है कि ऊपर से ये गुटनिर्पेक्ष देशों की बैठक है लेकिन इसके पीछे भारत का एक बहुत बड़ा एजेंडा है. अगर अमरीका, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन वाकई में भारत की खुशहाली चाहते हैं, वो वास्तव में चाहते हैं कि भारत एशिया में महाशक्ति के तौर पर उभरे, तो ये बात उनको जरूर समझनी चाहिए कि भारत और ईरान के संबंध अच्छे होने जरूरी है.

अगर भारत की अर्थव्यवस्था इस कारण प्रगति नहीं कर पाती कि उसके ईरान से संबंध अच्छे नहीं हैं तो एशिया का जो राजनीतिक परिदृश्य उभरेगा उससे ना तो अमरीका खुश होगा, ना ही यूरोपीय यूनियन.

एक तरफ अमरीका चाहता है कि भारत ईरान के तेल पर अपनी निर्भरता कम करे. अमरीका को लगता है कि अगर तेल के डॉलर या तेल की रकम ईरान को मिलती रहती है तो ईरान पर लगे प्रतिबंधो का असर नहीं होगा. लेकिन अमरीका ये भी अच्छी तरह जानता है कि अगर ईरान साथ नहीं आता तो भारत की अफगान नीति असफल हो जाएगी.

अमरीका चाहता है कि भारत की अफगान नीति सफल हो और भारत अफगानिस्तान में ज्यादा निवेश करे.

अमरीका चाहता है कि भारत अफगानिस्तान में अपनी स्थिति को दृढ़ करे. यही कारण है कि ऊपर से अमरीका बार-बार नाराजगी जाहिर कर रहा है, लेकिन साथ-साथ जब भी आवश्यकता हुई है, उसने ईरान को लेकर भारत को कुछ छूट भी दी हैं.

कूटनीति में जो कहा जाता है वो जरूरी नहीं कि उसका मतलब वही हो.

ईरान के लिए ये सम्मेलन बहुत बड़ी खुशखबरी है. उनके लिए तो लॉटरी खुल गई है. वो पूरी दुनिया को दिखा रहे हैं कि प्रतिबंधों के बावजूद इतने सारे देश वहाँ इकट्ठा हो रहे हैं.

ईरान के मुताबिक ये सभी देश इसलिए इकट्ठा हो रहे हैं क्योंकि वो ईरान की परमाणु नीति का समर्थन करते हैं.

ईरान का कहना है कि अमरीका और यूरोपीय यूनियन के उन्हें अलग-थलग करने के सभी प्रयास विफल साबित हुए हैं.

ईरान की सरकार लोगों से कह रही है कि ये उसकी जीत है.

भारतीय हित

ईरान का तेल

भारत सोचता है कि जब भी ईरान में स्थिति बदले तो भारत वहाँ पर फ्रंटलाइन निवेशक और खरीदार हो

इससे ईरान में लोकतांत्रिक शक्तियों को नुकसान होगा, लेकिन भारत को देखना होगा कि उसके हित में क्या है.

मुझे लगता है कि भारत को ईरान से अपने संबंध सुदृढ़ करने चाहिए. भारत और ईरान को मिलकर अफगानिस्तान के लिए ऐसी नीति का निर्माण करना चाहिए जिससे अफगानिस्तान स्वतंत्र देश रह सके, और पाकिस्तान और तालेबान की दखलअंदाज़ी को रोका जा सके.

अगर अफगानिस्तान दोबारा तालेबान के हाथ में जाता है तो ये भारत और ईरान के लिए बुरी खबर है. इससे पूरे मध्यपूर्व की रणनीति पर असर पड़ेगा.

इससे तेल और गैस के दाम इतने बढ़ जाएंगे कि ये भारत और चीन के लिए बुरी खबर होगी.

एक वक्त था जब भारत ईरान से अपनी जरूरत का 17 प्रतिशत तेल मंगाते थे. भारत में मैंगलोर रिफाइनरी को ईरान के तेल के लिए ही बनाया गया था. इससे पता चलता है कि भारत और ईरान के संबंध कितने मजबूत थे.

भारत चाहे तो इन प्रतिबंधों को पूरी तौर पर नकार सकता है लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया है क्योंकि अमरीका और यूरोपीय यूनियन भारत के लिए अहम हैं. इसलिए भारत ने ईरान से आयात को कम किया है और आज भारत का आयात 10 प्रतिशत से नीचे जा चुका है.

भारत ने भुगतान की समस्या का भी हल ढूँढने की कोशिश की है, इसलिए हमने बीच का रास्ता अपनाया है ताकि अमरीका नाराज नहीं हो. दूसरी तरफ भारत ने अपनी जरूरतों का भी ध्यान रखा है.

भारत की कोशिश है कि हमारी निर्भरता ईरान के तेल पर से घटकर सात फीसदी हो जाए. भारत ने ईराक और लीबिया से तेल आयात बढ़ाया है, लेकिन भारत इसे एक अस्थायी विकल्प के तौर पर देखता है.

जैसे ही पश्चिमी देशों के संबंध ईरान से सुधरते हैं, भारत भी ईरान से तेल का आयात बढ़ा सकता है.

ये शताब्दी गैस की शताब्दी है. ऐसे हालात में दुनिया चाहे भी तो अपनी निर्भरता ईरान के गैस पर से कम नहीं कर सकती. अगर इसे कृत्रिम तरीके से कम किया जाता है तो ये बात दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी नहीं होगी.

भारत प्रयास कर रहा है कि ईरान और अमरीका के बीच संबंध सुधरें.

मुझे लगता है कि अगर राष्ट्रपति ओबामा दोबारा चुनाव जीत जाते हैं तो आप देखेंगे कि ईरान और अमरीका के संबंध बेहतर होंगे और पश्चिम की कंपनियाँ ईरान में बड़ी मात्रा में निवेश करना शुरू करेंगी.

ईरान को भी दुनिया की जरूरत है क्योंकि उसे अपने तेल का खरीदार चाहिए. साथ ही ईरान का तेल और गैस से जुड़ा मूलभूत ढांचा 70 के दशक का है और पुराना पड़ चुका है.

अब समय आ चुका है कि उसका आधुनीकीकरण हो और ये आधुनीकीकरण पश्चिम की तकनीक और दुनिया के पैसे के बिना संभव नहीं है.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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