झूठ बोले-कौआ काटे

 गुरुवार, 13 सितंबर, 2012 को 14:08 IST तक के समाचार

बीबीसी की रजनी वैद्यनाथन लाई डिटेक्टर टेस्ट देती हुई

भारत में बहुत सी कंपनियाँ उन लोगों और कंपनियों को पॉलीग्राफ़ परीक्षण करने की पेशकश कर रही हैं जो अपने धोखेबाज़ पति, पत्नियों या बेईमान कर्मचारियों को रंगे हाथ पकड़ना चाहते हैं.

इसकी वजह से उन पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह कानून को अपने हाथों में ले रहे हैं. पॉलीग्राफ परीक्षक के तौर पर काम कर रही वैज्ञानिक दीप्ति पुराणिक को झूठ का पता लगाने के पैसे मिलते हैं.

मुंबई की कंपनी हेलिक एडवाएज़री के लिए काम करने वाली दीप्ति हर सप्ताह यह जानने के लिए उन ग्राहकों का परीक्षण करती हैं कि वह सच बोल रहे हैं कि नहीं और इसके लिए वह उन्हें 8000 से ले कर 18000 रुपए तक देते हैं.

बेवफ़ाई से लेकर ईमानदारी का परीक्षण

पुराणिक कहती हैं, ‘बेवफ़ाई के कुछ मामले हो सकते हैं जहाँ पत्नी को संदेह है कि उनके पति उन्हें धोखा दे रहे हैं. दूसरी तरफ किसी कंपनी में चोरी हो गई है और कंपनी के मालिक यह पता लगाना चाहते हैं कि इसके पीछे कौन हो सकता है.’

कई दूसरी चीजें जानने के लिए भी कंपनियां पॉलीग्राफ़ परीक्षण करती हैं. कई बार कंपनी के लोग किसी व्यक्ति को नौकरी पर रखने से पहले उसकी ईमानदारी के बारे में पता लगाना चाहते हैं.

कई मामलों में दोषी को पकड़ने के लिए यह परीक्षण कराया जाता है चाहे यह कंपनी में चोरी हो या घर में चोरी का मामला हो जहाँ घर के नौकर पर चोरी का संदेह हो.

एक साल से काम कर रही इस कंपनी का कहना है कि दिनों दिन कई लोग इस बारे में पूछताछ कर रहे हैं.चीजों को गोपनीय रखने की वजह भी लोगों को इस कंपनी की सेवाएं लेने के लिए प्रेरित कर रही हैं.

गोपनीयता

हेलिक की अध्यक्ष और महाराष्ट्र की सरकारी फ़ोरेंसिक सेवाओं की पूर्व प्रमुख रुक्मणी कृष्णमूर्ति का कहना है,’बहुत से लोग पुलिस के पास इस लिए नहीं जाना चाहते क्योंकि इसमें बहुत समय लगता है और पुलिस के पास ले जाई गई हर जानकारी सार्वजनिक हो जाती है.’

‘बहुत से ग्राहक हमारे पास सिर्फ इस लिए आते हैं क्योंकि वह नहीं चाहते कि बाहरी लोगों को पता चले कि उनके संगठन में कोई चोरी हुई है.’

जिस भी व्यक्ति का लाई डिटेक्टर परीक्षण किया जाता है उसकी इस बारे में पहले से ही सहमति लेनी होती है. पुराणिक का कहना है इससे किसी की बेगुनाही के साथ साथ गुनाह का भी पता चल सकता है हांलाकि कि वह यह भी मानती हैं पॉलीग्राफ़ परीक्षण पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं हैं.उनके अनुसार, ‘करीब अस्सी फ़ीसदी मामलों में यह सही होते हैं.’

पॉलीग्राफी में शारीरिक परिवर्तनों जैसे रक्त चाप, पसीने और सांस लेने की रफ्तार से सही या झूठ का पता लगाया जाता है. इसका आविष्कार 1917 में एक अमरीकी विलियम मार्सटन ने किया था.इस उपकरण का प्रयोग भारत में कई सालों से हो रहा है और पुलिस भी इसका इस्तेमाल करती है.

सुप्रीम कोर्ट इन परीक्षणों को साक्ष्य नहीं मानता

लेकिन 2010 में देश के सुप्रीम कोर्ट ने पॉलीग्राफ की मदद से जुटाए गए साक्ष्य को अवैध घोषित कर दिया था. इस फैसले में कहा गया था कि इस तरह के परीक्षण किसी व्यक्ति की निजी आजादी का उल्लंघन है.

सहमति से किए गए परीक्षणों की अनुमति जरूर है, लेकिन इन सिर्फ इन साक्ष्यों के बल पर सज़ा नहीं हो सकती. उन्हें सिर्फ सहायक साक्ष्यों के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

भारत में निजी फॉरेंसिक बाजार भी बढ़ रहा है और कंपनियाँ हस्ताक्षर सत्यापन से लेकर हस्तलेखन विष्लेषण और यहाँ तक कि व्यक्तित्व परीक्षण जैसी सेवाएं भी दे रही हैं.

बढ़ती जनसंख्या और पहले से ही व्यस्त पुलिस की वजह से यह कंपनियां बाजार के अंतर को पाट रही हैं और उनका कहना है कि उनकी वजह से ही पुलिस दूसरे गंभीर अपराधों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए सक्षम हो पा रही है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के वकील भरत चुग का कहना है कि इन कंपनियों पर नियंत्रण बहुत जरूरी हो गया है.’लोग कानून को अपने हाथों में ले रहे हैं. वह एक समानांतर व्यवस्था चला रहे हैं और झगड़ों का निपटारा कर रहे हैं.यह बहुत अच्छी बात नहीं है.’

लेकिन कृष्णमूर्ति का तर्क है कि जब तक सरकार और फ़ोरेंसिक प्रयोगशालाएं नहीं बनातीं, उनकी जैसी कंपनियाँ निजी और सार्वजनिक जरूरतों को पूरा कर सकती हैं और अंतत: पहले से लंबित आपराधिक मामलों के बैक लॉग को कम कर सकती हैं.

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