उकसाती है पैग़ंबर मोहम्मद पर बनी फ़िल्म?

  • 14 सितंबर 2012
पैगंबर मोहम्मद पर बनी फ़िल्म का विरोध
Image caption फ़िल्म का विरोध अब ट्यूनीशिया में भी होने लगा है.

पैग़ंबर मोहम्मद का कथित तौर पर अपमान करने वाली एक इस्लाम-विरोधी फिल्म के इंटरनेट पर जारी होने के बाद, लीबिया और मिस्र में अमरीकी दूतावासों पर हमले हुए हैं. इन हमलों में लीबिया में अमरीकी राजदूत समेत तीन अमरीकी नागरिक और 10 लीबियाई नागरिक मारे गए हैं.

लेकिन सवाल ये है कि आख़िर इस फ़िल्म में क्या है जिसके कारण अरब दुनिया में कई जगहों में विरोध प्रदर्शन हो रहें हैं और इस फ़िल्म के पीछे कौन लोग हैं.

अब तक मिली जानकारी के मुताबिक़ फ़िल्म का नाम है 'इनोसेंस ऑफ़ मुस्लिम्स' और इसे अमरीका में शूट किया गया है.

पूरी फ़िल्म लगभग दो घंटों की है लेकिन ज़्यादातर लोगों ने जो देखी है वो फेसबुक और यू-टयूब पर दिखाई जाने वाली फ़िल्म का ट्रेलर है. एक ट्रेलर 14 मिनट का है.

इससे पूरी फ़िल्म की कहानी के बारे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल है लेकिन इतना ज़रूर है कि फ़िल्म को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है.

पहले हिस्से में दिखाया गया है कि मौजूदा मिस्र में इस्लामी चरमपंथी किस तरह से वहाँ रहने वाले कॉप्टिक ईसाइयों को सताते हैं, जबकि दूसरे हिस्से में पैग़ंबर मोहम्मद के जीवन की कहानी दिखाई गई है.

Image caption बेन्गाज़ी में फ़िल्म के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शन में अमरीकी राजदूत समेत कई लोग मारे गए हैं.

फ़िल्म के ट्रेलर को देखने के बाद साफ़ लगता है कि इस्लाम के बारे में जो भी बातें कहीं गई हैं वो कलाकारों ने शूटिंग के दौरान नहीं कही बल्कि उसे बाद में डब किया गया है.

पैग़ंबर मोहम्मद का किरदार एक नौजवान अमरीकी नागरिक ने निभाया है लेकिन उनके बारे में कोई नहीं जानता.

फ़िल्म में पैग़ंबर मोहम्मद को कथित रूप से व्याभिचारी के तौर पर दिखाया गया है.

कौन है निर्माता ?

फ़िल्म को पहले अंग्रेज़ी में बनाया गया था लेकिन अब अरबी भाषा में भी उसकी डबिंग हो गई है.

तकनीकी दृष्टि से भी फ़िल्म बहुत ही मामूली है.

सैम बेसाइल नाम के एक व्यक्ति ने फ़िल्म का निर्माण किया है जो ख़ुद को अमरीका में रहने वाले यहूदी बताते हैं और रियल स्टेट कारोबारी हैं.

वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार सैम बेसाइल ने लगभग 50 लाख डॉलर में ये फ़िल्म बनाई है. ये धनराशि उन्होंने 100 यहूदियों से मांग कर जमा किया था.

टेलिफ़ोन के ज़रिए किए गए एक साक्षात्कार में सैम बेसाइल ने इसे एक राजनीतिक फ़िल्म क़रार देते हुए कहा था कि इस्लाम एक कैंसर है.

लेकिन बीबीसी के तमाम प्रयासों के बावजूद उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी.

समाचार एजेंसी एपी ने इसराइली अधिकारियों के हवाले से कहा है कि इस नाम का कोई आदमी इसराइली नागरिक नहीं है.

द एटलांटिक जर्नल ने इस फ़िल्म का सलाहकार कहे जाने वाले स्टीव क्लेन नाम के एक आदमी से बातचीत के आधार पर कहा है कि सैम बेसाइल ना तो इसराइली नागरिक है और ना वो यहूदी हैं. स्टीव क्लेन के अनुसार ये एक फ़र्ज़ी नाम है.

जुलाई के महीने में सैम बेसाइल नाम से यू-टयूब पर इस फ़िल्म के ट्रेलर को अपलोड किया गया तभी से लोगों को सैम बेसाइल के बारे में पता चला.

अरब के कुछ टीवी चैनलों ने उसे यू-टयूब से उठा लिया और अपने टॉक शो का हिस्सा बनाया और उसे अरबी में डब किया. उसके बाद से लगभग तीन लाख लोगों ने उसे देखा है.

इस फ़िल्म के कारण अरब के कई देशों में हिंसा भड़क गई है और एक अमरीकी राजदूत समेत कई लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं.

लेकिन अभी भी सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है कि आख़िर इस फ़िल्म को किसने बनाया और क्यों.

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