क्यों बराक ओबामा के मुरीद हैं भारतीय?

अमरीकी भारतीय

अमरीका में नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव है और मुख्य तौर पर दो पार्टियाँ चुनावी मैदान में रहती हैं- डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी. अमरीका में बसे भारतीय-अमरीकी समुदाय ने पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी को ही समर्थन दिया है.

एक किस्सा याद आता है. भारतीय मूल के एक अमरीकी युवक ने बताया था कि कैसे कुछ दिन पहले उनकी माँ ने कड़े शब्दों में साफ-साफ कहा था कि अगर उसने रिपब्लिकन पार्टी के मिट रोमनी को वोट दिया था, तो घर न लौटे.

माँ राष्ट्रपति ओबामा के चुनावी अभियान में जोर शोर से जुटी हुई हैं.

इस युवक ने अभी कोई फैसला नहीं किया है लेकिन उसका झुकाव कई कारणों से ओबामा की ओर हो रहा है- प्रवासियों के प्रति नीति से लेकर मध्यम वर्ग और छात्रों के प्रति नीति के कारण.

जैसे-जैसे राष्ट्रपति अभियान अपने अंतिम चरण में पहुँच रहा है, वर्जीनिया जैसे राज्यों में भारतीय-अमरीकी लोगों के वोट कीमती साबित हो सकते हैं. डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति इस समर्थन से ओबामा को फायदा हो सकता है.

पसंद है ओबामा

Image caption अमरीकी भारतीयों को डेमोक्रेटिक पार्टी की नीतियाँ रास आती हैं

भारतीय-अमरीकी लोगों की संख्या 28.5 लाख है. 2008 के चुनाव में इनमें से 84 फीसदी ने ओबामा के लिए वोट दिया था. क्या इस बार भी ओबामा को इन लोगों का प्यार मिलेगा?

लगता तो यही है.

जून में हुए प्यू रिसर्च सेंटर सर्वे के मुताबिक भारतीय मूल के अमरीकी लोगों में से 65 फीसदी को ओबामा का काम पसंद है. एशियाई मूल के जिन अमरीकी लोगों से बात की गई, उनमें से भारतीय मूल के लोगों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति सबसे ज्यादा झुकाव दिखाया.

केवल 18 फीसदी ने रिपब्लिकन का पक्ष लिया.

दिलचस्प बात ये है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए युवा पीढ़ी में ज़्यादा समर्थन है जबकि पहली नज़र में शायद ये लगे कि सफलता को लेकर रिपब्लिकन पार्टी की बातें युवाओं को ज़्यादा पसंद आएँगीं.

साथ लेकर चलने की नीति

Image caption भारतीय मूल के अभिनेता काल पेन मिशेल ओबामा से गले मिलते हुए

रिपब्लिकिन पार्टी के भारतीय-अमरीकी समर्थक उलझन में हैं और नाराज़ हैं कि डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति भारतीय-अमरीकी लोगों की वफादारी इतनी ज़्यादा क्यों है.

वे पूछते हैं, “पता नहीं कि भारतीय-अमरीकी समुदाय के लोग रिपब्लिकन पार्टी का समर्थन क्यों नहीं करते.”

डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक टोबी चौधरी इसका जवाब हँसते हुए देते हैं, “रिपब्लिकन पार्टी वाले अपने सम्मेलनों में चाय नहीं पिलाते.”

अमरीका में स्टारबक्स में चाय भले ही आसानी से मिलती है लेकिन रिपब्लिकन पार्टी के मेन्यू में चाय जगह नहीं बना पाई है.

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो रिपब्लिकन पार्टी में दूसरों को साथ लेकर चलने की नीति की कमी दिखती है.

अल्पसंख्यक समुदायों को साथ लेकर चलने की रिपब्लिकन पार्टी की नीति को भारतीय समुदाय महज सांकेतिक मानती आई है.

नस्लभेदी टिप्पणियाँ

Image caption बॉबी जिंदल रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य हैं

इस साल अपने सम्मेलन में रिपब्लिकन पार्टी ने भारतीय मूल के दो गर्वनर बॉबी जिंदल और निकी हेली को बुलाया था. हालांकि आईज़ैक तूफान के कारण जिंदल आ नहीं पाए थे.

बॉबी जिंदल और निकी हेली दोनों बड़े नाम माने जाते हैं, लेकिन बड़े स्तर पर स्वीकार किए जाने के लिए दोनों ही अपने समुदाय के नाम का सहारा लेने से बचते रहे हैं.

हिंदू और सिख धर्म से दोनों ने ईसाई धर्म अपनाया है. इस कदम के कारण बूढ़े-बुजुर्ग खासे नाराज थे. हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि दोनों ने ऐसा निजी कारणों से किया या राजनीतिक कारणों से.

वर्जीनिया के पूर्व सिनेटर जॉर्ज ऐलन ने 2006 में खुले आम एक भारतीय अमरीकी व्यक्ति के खिलाफ नस्लभेदी टिप्पणी की थी जिसे लोग भूले नहीं हैं.

उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के एसआर सिद्धार्थ को बंदर कहा था. इस बार जॉर्ज ऐलन फिर रिपब्लिकन पार्टी की ओर से सीनेट के लिए उम्मीदवार हैं.

इस बार रिपब्लिकन पार्टी के सम्मेलन में अफ्रीकी-अमरीकी मूल के एक कैमरामैन पर लोगों ने मूंगफलियाँ फेंकीं और कहा कि हम अपने जानवरों को ऐसे ही खिलाते हैं. ऐसी घटनाएँ इस धारणा को और गहरा करती है कि रिपब्लिकन पार्टी गोरों के लिए ही है.

ओबामा से उम्मीदें

Image caption अमरीकी भारतीय पारंपरिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट देते आए हैं

आज भारतीय-अमरीकी मूल के 70 फीसदी लोगों के पास कॉलेज डिग्री है और दो तिहाई के पास मैनेजमैंट नौकरियाँ हैं.

इनकी मीडियन आमदनी 88 हजार डॉलर है जो अमरीका में सबसे ज्यादा है.

अमरीका में रहने वाले जो भारतीय भारत में पले बढ़े हैं, वो चाहते हैं कि अमरीका सरकार अच्छा काम करे.

ज्यादातर भारतीय-अमरीकी लोग मध्यम वर्ग से हैं और उन्हें लगता है कि ओबामा उन मुद्दों को सुलझाएँगे जो उनके दिल के करीब हैं- जैसे कॉलेज शिक्षा की बढ़ती कीमत, नया स्वास्थ्य सेवा ऐक्ट पारित करना ताकि स्वास्थ्य सेवा मिलना सबका हक बन जाए और सोशल सेक्यूरिटी को बचाए रखना.

भारतीय-अमरीकी लोगों को सोशल सेक्यूरिटी का प्रावधान पसंद है क्योंकि कई लोगों के बूढ़े माता-पिता रिटायरमेंट के बाद उनके पास अमरीका आ जाते हैं.

टोबी चौधरी कहते हैं कि डेमोक्रेटिक पार्टी उन मुद्दों पर ध्यान देती रही है जो समुदाय के लिए अहम हैं.

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