कौन रोक रहा है पाकिस्तान का पानी?

Image caption पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में पहले जहां खेत थे वहां धूल उड़ रही है

रेगिस्तान बड़ी तेज़ी से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के दक्षिणी मैदानी इलाक़ों को निगलता जा रहा हैं.

दो साल पहले की फ़सलों के भुरभुराते ठूंठ यज़मान के रेत में से मुंह उठाए इस बात की गवाही देते हैं कि कुछ समय पहले तक ये एक उपजाऊ भूमि हुआ करती थी.

एक समय था जब यहां के किसान ख़ुशहाल थे लेकिन अब वो ग़रीबी की मार झेल रहे हैं.

यार मोहम्मद अपने कमज़ोर मवेशियों की देखभाल करते हुए बताते हैं कि जब से पानी बंद हुआ है उनके आधे से अधिक मवेशी मर गए हैं.

वो गेंहूं की खेती किया करते थे लेकिन अब उनके खेतों में धूल उड़ती है.

वो कहते हैं, “राजनेता हमारी बात बस तब सुनते हैं जब उन्हे वोटों की ज़रूरत होती है. लेकिन अब वो हमारी पुकार नहीं सुन रहे. कोई नहीं सुनता”.

“हम अल्लाह की मदद की गुहार लगाते हैं लेकिन कभी कभी मुझे लगता है कि फांसी लगाने के अलावा कोई चारा नहीं है”.

‘पानी का आतंकवाद’

पंजाब की ये हालत देखकर लोग हैरान होते हैं. इस प्रांत का नाम पंजाब पड़ा ही इसलिए क्योंकि यहां पांच नदियां बहती हैं

लेकिन यज़मान के पास बहती सतलुज नदी का तल सूखा पड़ा है.

पश्चिम की तरफ़ बहती है चेनाब. लेकिन जिस रास्ते वो बहती थी वहां अब मवेशी चरते हैं और धूल का बादल उनके चारों ओर उड़ता है.

फिर भी उसमें पानी बहता दिखाई देता है हालांकि उसका स्तर काफ़ी नीचे चला गया है.

ये दोनों नदियां पाकिस्तान की पूर्वी सीमा के पार भारत से निकलती हैं. बहुत लोग नदी के बहाव को बदलने के लिए भारत को ज़िम्मेदार बताते हैं.

प्रतिबंधित इस्लामिक संगठन जमात-उद-दावा के क़ारी सैफ़ुल्लाह मंसूर इसे ‘पानी के आतंकवाद’ की संज्ञा देते हैं.

लेकिन सभी लोग पंजाब के सूखने के लिए भारत पर आरोप नहीं लगाते.

जल प्रबंधन पर सवाल

यज़मान में यार मोहम्मद की ज़मीन से कोई 15 किलोमीटर दूर हमें पानी मिला और पर्याप्त मिला. वो तेज़ बहती पानी की नहर थी.

लेकिन नहर के उस द्वार पर ताला पड़ा था जिससे यार मोहम्मद और उनके जैसे कई और किसानों तक पानी पहुंच सके. जबकि कुछ द्वार खुले हुए थे.

इसका मतलब ये है कि पानी पाकिस्तान आ तो रहा है लेकिन उसमें से बहुत सा पानी नहरों में जाता है. इसका मतलब ये हुआ कि ये फ़ैसला पाकिस्तान के प्रशासन के हाथों में है कि किस इलाक़े को पानी मिलेगा और किसको नहीं.

इस रेगिस्तानी इलाक़े में एक बड़ा सा तम्बू लगा है जिसमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे जमा हैं. उन्होने पानी बंद होते और अपनी उपजाऊ ज़मीन को रेगिस्तान बनते देखा है.

वो अपनी मुश्किलों के लिए भारत को ज़िम्मेदार नहीं मानते. बल्कि अपने राजनेताओं और सामंती जमींदारों को दोषी समझते हैं.

पानी के लिए अभियान चलाने वाले जाम हज़ूर बक्श कहते है, “एक दिन ये शांत निर्धन लोग विद्रोह कर उठेंगे”.

“ये लोग इतने हताश हो जाएंगे कि वो उन अधिकारियों के दफ़्तरों तक पहुंच जाएंगे जो पानी का प्रबंधन करते हैं और जो रिश्वत लेते हैं”.

“उन्हे इन अधिकारियों को चुनौती देनी चाहिए जो रईस जमींदारों को पानी दे रहे हैं लेकिन उनको नहीं”.

रेगिस्तान में जमा हुए प्रदर्शनकारियों का संदेश स्पष्ट था. अगर भारत सचमुच पानी का रास्ता बदल कर रहा है तो पाकिस्तान की सरकार को उसे चुनौती देनी चाहिए लेकिन साथ ही उसे ये देखना चाहिए कि वो अपनी जनता के साथ कैसा बर्ताव कर रही है.

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