ईसाई भाइयों की कोर्ट परिसर में हत्या

क्रास
Image caption पाकिस्तान में ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय है.

पंजाब के शहर फैसलाबाद में पैग़ंबर इस्लाम का अपमान करने के आरोप में गिरफ्तार दो ईसाई भाइयों की अदालत के परिसर में हत्या कर दी गई जबकि हमलावर की फायरिंग में एक पुलिस अधिकारी घायल हो गया.

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी आमिर वहीद ने बीबीसी को बताया कि 32 वर्षीय राशिद इमैनुएल और उनके छोटे भाई को 12 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था.

उन्होंने कहा कि दोनों ईसाई भाइयों को अदालत के सामने पेश करने के बाद जब वापस लाया जा रहा था उसी समय अदालत के परिसर में अचानक उन पर गोलीबारी शुरु हो गई और भगदड़ मच गई. इस अफ़रातफ़री में हमलावर वहाँ से भागने में सफल रहे.

अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाली संस्था हार्मनी फाउंडेशन के आतिफ़ जमील ने बीबीसी को बताया कि फायरिंग की आवाज़ सुन जब वे घटनास्थल पर पहुँचे तो हमलावर फ़रार हो चुका थे लेकिन उनके रुमाल घटनास्थल से मिले जो पुलिस के हवाले कर दिए गए.

पुलिस अधिकारी आमिर वहीद के अनुसार गोलीबारी में घायल होने वाले पुलिस अधिकारी मोहम्मद हुसैन को क़रीबी अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

दोनों मृतकों के शव सरकारी अस्पताल में रखवा दिए गए हैं जहाँ उन के रिश्तेदार बड़ी संख्या में मौजूद थे.

ध्यान रहे कि 12 जुलाई को पुलिस ने दो ईसाई भाइयों को गिरफ्तार किया था और इनके ख़िलाफ पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के आरोप में मुक़दमा दर्ज किया गया था.

गिरफ़्तार किए गए दोनों भाइयों 32 वर्षीय राशिद इमैनुएल और 24 वर्षीय साजिद इमैनुएल पर आरोप था कि उन्होंने हाथ से लिखे हुए ऐसे पर्चे बंटवाए थे जिस पर पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ शब्द लिखे हुए थे.

मुक़दमा दर्ज करवाने वाले व्यक्ति ख़ुर्रम का कहना था कि फैसलाबाद के बस स्टैंड पर ऐसे पर्चे बाँटे जा रहे थे जिनमें पैगंबर मोहम्मद के बारे में अपमानजनक बातें थीं. हाथ से लिखे हुए इन पर्चों पर दो व्यक्तियों के नाम और फ़ोन नंबर लिखे हुए थे.

मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली एक ग़ैर-सरकारी संस्था के पदाधिकारी आतिफ़ जमील ने बीबीसी को बताया कि इस घटना के बाद कुछ मुसलमानों ने एक स्थानीय चर्च के बाहर प्रदर्शन किया था और पथराव भी किया था.

पाकिस्तान के संविधान के अनुसार पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने वाले को मौत की सज़ा दी जाती है. पैगंबर मोहम्मद के अपमान पर सज़ा का क़ानून पूर्व सैन्य शासक जनरल ज़िया-उल-हक़ के दौर में बनाया गया था.

मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाएँ इस क़ानून की कड़ी आलोचना कर रही हैं. इसे ख़त्म करने की मांग हो रही है क्योंकि उनके अनुसार यह क़ानून अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ इस्तेमाल हो रहा है.

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