कैसे संभलेगा बाढ़ पीड़ित पाकिस्तान?

पाकिस्तान बाढ़

पाकिस्तान घिरा हुआ है. एक ओर तो बाढ़ का पानी है जो 23 प्रतिशत खेती लायक़ ज़मीन बहा ले गया है तो दूसरी ओर चरमपंथी तालिबान हैं जिन्होंने पिछले एक हफ़्ते में ही कम से कम 120 लोगों की जान ले ली है.

इसके अलावा ज़बरदस्त राजनीतिक मतभेद अलग हैं. इसी दौरान मार्शल लॉ की बात हो रही है और आर्थिक गिरावट है जिसका असर कई वर्षों तक दिखता रहेगा.

कुछ पाकिस्तानी कह रहे हैं कि शायद ये सैलाब चेतावनी साबित हों और पाकिस्तानी का सत्ताधारी कुलीन वर्ग अब अच्छा प्रशासन देने का प्रयास करे, पुनर्विकास पर ध्यान दे, ग़रीबी हटाने की सच्ची कोशिश करें और इस्लामी चरमपंथ को परास्त करने के लिए लोकतंत्र को मज़बूत करे.

बहरहाल, हालिया संकट की वास्तविक मुश्किलें इस तरह की किसी उम्मीद को नकारती हैं. सैन्य और असैन्य सत्ताधारी कुलीन वर्ग से लोगों का विश्वास पूरी तरह टूटू चुका है.

कहा जा सकता है कि वर्षों के कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार, कुशासन, सैनिक शासन और फिर कमज़ोर निर्वाचित सरकार ने बड़ा नुक़सान किया है.

बात देश की हो या विदेश की हर जगह और हर मंच पर सहायता करने वाले देश, संस्थाएं, अमीर लोग या स्कूल के बच्चे इन दो करोड़ बाढ़ पीड़ितों की परेशानियों को दूर करने के लिए पाकिस्तान सरकार को पैसा देने से इनकार कर रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दानदाता देश पाकिस्तान सरकार से किसी क़िस्म का वादा नहीं करना चाह रहे हैं बल्कि पश्चिमी और पाकिस्तानी ग़ैर-सरकारी संस्थाओं के ज़रिए वे अपनी मदद दे रहे हैं.

सहायता में कमी

Image caption दुनिया ने बाढ़ से निपटने की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान पर ही छोड़ दी है

प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी के मुताबिक़ जितनी सहायता का वादा किया गया है उनमें से 20 प्रतिशत से भी कम का संयोजन सरकार के ज़रिए किया जा रहा है.

इसी दौरान ये भी देखने में आ रहा है कि यूरोप या अमरीका की सहायता एजेंसियाँ इतनी भीषण प्राकृतिक तबाही के लिए बहुत ही कम धन इकठ्ठा कर पाई हैं.

बाढ़ के पांच हफ़्ते बाद भी संयुक्त राष्ट्र की 45.9 करोड़ डॉलर की अपील दूर-दूर तक पूरी होती नहीं दिख रही है.

संयुक्त राष्ट्र ने दो सितंबर को कहा पिछले दो हफ़्ते के दौरान धन इकठ्ठा करने की प्रक्रिया लगभग रुक गई है और अभी तक सिर्फ़ 1.7 करोड़ डॉलर ही जमा हो सके हैं.

ऐसा लगता है कि दुनिया ने बाढ़ की त्रासदी से निबटने का जिम्मा पाकिस्तान पर छोड़ दिया है या कोई सरकार पर भरोसा नहीं करता.

इसके बावजूद केंद्र सरकार और चारों सूबों की सरकारों में इस बात पर जंग छिड़ चुकी है कि पैसे कौन ख़र्च करेगा.

इसी दौरान कुछ मौक़ापरस्त राजनेता मार्शल लॉ या फ़्रांस जैसी क्रांति की गुहार लगा रहे हैं.

जब से पाकिस्तान में बाढ़ आई है न तो राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और न ही प्रधानमंत्री गिलानी ने मिलकर कोई ऐसी पारदर्शी संस्था खड़ी की है जो अंतरराष्ट्रीय और पाकिस्तानी दान देने वालों की संतुष्टी के लिहाज़ से पैसा हासिल और ख़र्च करे.

केंद्र सरकार, सूबाई सरकारें, सेना और यहां तक कि नेशनल एसेंबली ने अलग-अलग बाढ़ राहत कोष स्थापित कर लिए हैं. और हाल ये है कि कोई भी पाकिस्तानी दान देने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि किसी को भी उनमें से किसी पर भी भरोसा नहीं है.

बहरहाल, पुनर्वास और बरबाद हो गए मूलभूत ढांचे के पुनर्निमाण के लिए बड़ी मदद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा संस्थानों से आ रही है जोकि दो से तीन अरब डॉलर है.

ट्रस्ट फंड

Image caption ज़रदारी और गिलानी की ओर से अभी तक कोई सार्थक पहल नहीं की गई है

अगर वास्तव में ये मदद आनी है तो यह सही समय है जब पाकिस्तानी शासक लोगों में कुछ विश्वास पैदा करें.

राजनेताओं के लिए ज़रूरी है कि वह 'ट्रस्ट फंड' के लिए राज़ी हों और वह लगभग उसी तर्ज़ पर होगा जैसा अफ़ग़ानिस्तान में सरकार, सेना और पुलिस को देने के लिए फ़ंड है.

पाकिस्तान के पुनर्निर्माण ट्रस्ट फ़ंड को चलाने के लिए ऐसे लोग होने चाहिए जिनका पाकिस्तानी सरकार से कोई सरोकार ना हो जैसे इसमें विश्व बैंक, अन्य क़र्ज़ देने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ और पाकिस्तानी स्वतंत्र अर्थशास्त्री और सामाजिक कल्याणकारी व्यक्ति शामिल हों.

इस पर भी पाकिस्तानी बड़े फ़ैसले लें लेकिन फ़ैसले लेने वाले न तो राष्ट्रपति, न प्रधानमंत्री और न ही विपक्ष दलों के नेता हों.

पाकिस्तान की नौकरशाही और सेना की भी उस में जगह हो लेकिन उनके पास पैसे ख़र्च कैसे किए जा रहे हैं इस पर कोई वीटो पावर न हो.

उनका काम ये होगा कि वह ट्रस्ट फ़ंड के ज़रिए किए गए कार्यों को निष्पक्ष ढंग से लागू करें.

इस फ़ंड के ज़रिए न सिर्फ़ पैसों की निगरानी होगी बल्कि ये गै़र-राजनीतिक और तटस्थ रुप से पुनर्माण कार्यों में सरकार की मदद करेगी.

इससे दीर्घकालीन आर्थिक सुधार की योजना बनाने में भी मदद मिलेगी. जैसे कर ढाँचे का विस्तार और ज़मींदारों को कर देने पर ज़ोर देना.

सरकार ने क़ाबिल पाकिस्तानी टेकनोक्रैट्स, स्वयंसेवी कार्यकर्ता और अर्थशास्त्रियों का उपयोग नहीं किया है, जो बड़ी संख्या में पाकिस्तान में मौजूद हैं.

Image caption बाढ़ में लग भग दो करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं.

इसमें शक नहीं कि सेना और राजनेता इस प्रकार के किसी भी विचार के ख़िलाफ़ होंगे.

उनका तर्क ये होगा कि ऐसे किसी क़दम से परमाणु शक्ति वाले इस देश की स्वाधीनता ख़तरे में पड़ जाएगी और यह किसी भी स्वतंत्र देश के लिए स्वीकार्य नहीं होगा.

लेकिन पाकिस्तानी कुलीन वर्ग की स्वाधीनता हर दिन खोती जा रही है, ये देश को फिर से वापस नहीं ला सकते और न ही लोगों का विश्वास हासिल कर सकते.

इस सैलाब में जो स्वाधीनता सरकार ने गंवाई है वह इतिहास की सबसे से बड़ी क्षति है सिर्फ़ एक बार को छोड़ कर जब सत्ताधारी कुलीन वर्ग ने ने पूर्वी पाकिस्तान को 1971 में गंवा दिया था और बांग्लादेश का गठन हुआ था.

वह क्षति भी एक राष्ट्रीय आपदा से जनमी थी जब देश के पूर्वी हिस्से में तूफ़ान आया था और पश्चिमी पाकिस्तानी कुलीनों की ओर से कोई मदद नहीं पहुंची थी.

जैसे जैसे पानी कम होता जाएगा और बिना किसी व्यवस्था के पुनर्नर्माण के काम शुरू होंगे राजनीतिक मतभेद और ख़तरे गहराते जाएंगे.

अगर पुनर्निर्माण का काम सरकार पर छोड़ दिया गया तो सार्वजनिक हितों की बजाए राजनेताओं और ज़मींदारों के हितों की भेंट चढ़ जाएंगे.

जबकि 5000 किलो मीटर लंबी सड़कें और पटरियां और एक हज़ार पुल पानी में बह चुके हैं, 7000 स्कूल और 400 स्वास्थ केंद्र बर्बाद हो चुके हैं, उत्तर का एक बड़ा हिस्सा अभी तक देश के बाक़ी हिस्सों से कटा पड़ा है, काश्तकारी की ज़मीन का पांचवाँ हिस्सा अभी भी पानी में डूबा हुआ है और बाढ़ पीड़ितों में महामारी का ख़तरा मुंह बाए खड़ा है एसे में पुनर्निर्माण की एक सुसंगत योजना की बहुत ज़रूरत है.

और इसके लिए सरकार, सेना और लोगों के बीच विश्वास की ज़रूरत है जो इस समय नदारद है.

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