दिक़्क़तों से घिरा पाकिस्तान

यूसुफ़ रज़ा गिलानी
Image caption प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी की सरकार को सदन में बहुमत सिद्ध करना पड़ सकता है

शेक्सपियर की भाषा में बोलें तो जब पाकिस्तान में संकट आता है तो छप्पर फाड़ के. वो वहाँ अकेले एक जासूस नहीं बल्कि पूरी बटालियन समेत आता है.

सबसे पहले देश में तेज़ी से बढ़ता आर्थिक संकट है – क़ीमतों में भारी कटौती, गै़स, बिजली और इंधन की भारी कमी. अब मुद्रास्फीति में 15 प्रतिशत वृद्धि जो अब अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण देने पर रोक लगाने के बाद जो दुनिया भर में महसूस की जाने लगी है.

दूसरी ओर अमरीका और नेटो का पाकिस्तान पर चरमपंथियों से निपटने के लिए अप्रत्याशित भारी दबाव. एक ऐसे समय जब डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देशों में गिरफ्तार लोगो के तार या तो पाकिस्तान से जुड़े हैं या उनका यहाँ प्रशिक्षण हुआ है. विवादास्पद ईश निंदा क़ानून में सुधार की कोशिश को रोकने के लिए इस्लामी पार्टियों ने जिस तरह आम जनता को इकट्ठा करने की कोशिश की वो देखने लायक है.

और इस सब के बढ़ कर अब एक और राजनीतिक संकट. पाकिस्तान की सत्ताधारी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी केंद्र में अपनी सरकार के निकटतम सहयोगी खो चुकी है. और जो संभावना नज़र आ रही है वो ये कि प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी की सरकार को विश्वासमत का सामना करना पड़ सकता है.

इस समय देश राजनीतिक संकट की चर्चा में जुटा है हालांकि जो दूसरे मुद्दे है वो शायद लंबे समय में देश के सामने ज़्यादा नकारात्मक असर छोड़ें.

राजनीतिक संकट

इस सप्ताहांत, पीपीपी के संसद में बहुमत खोने के बाद गिलानी प्रमुख विपक्षी दलों से मिले. ये संकट मुत्तहिदा क़ौंमी मूवमेंट के विपक्ष में बैठने और उसके मंत्रियों के इस्तीफे के बाद पैदा हुआ. एक दूसरा छोटा धार्मिक दल जमीयत ए उलेमा इस्लाम पिछले हफ्ते इस गठबंधन से बाहर हो गया था.

संसद के 342 सदस्यों में सरकार बहुमत से 14 कम है क्योंकि सदन में एमक्यूएम के 25 सदस्य हैं जो अब विपक्ष में चले गए हैं.

गिलानी अब सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं जिनमें नवाज़ शरीफ़, उनके भाई शहबाज़ शरीफ़ जो कि पंजाब में सरकार चलाते है और पाकिस्तान मुस्लिम लीग के अध्यक्ष भी हैं, शामिल हैं. अभी तक इन नेताओं ने नहीं कहा है कि वो गिलानी सरकार को गिराना चाहते है पर छोटे दल गिलानी का इस्तीफा चाहते है.

जब तक गिलानी सरकार के साथ शरीफ बंधु बने रहते है उनकी सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. गिलानी ने सोमवार को कहा, “सरकार चलती रहेगी चाहे गठबंधन साथियों का साथ हो या नहीं.’’

पर जो बात तय है वो ये कि सरकार ऐसी स्थिति में है जैसे इसको लकवा मार गया हो और वो कोई नया क़ानून नहीं बना सकती.

आर्थिक संकट

देश में जो बढ़ते रोष का कारण है बढ़ती तेल की क़ीमते, ग़ैस और बिजली की लगातार जारी क़िल्लत और अन्य चीज़ों के बढ़ते दाम. जब से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, आईएमएफ, ने अमरीका के 11.3 अरब डॉलर के ऋण में से 3.5 अरब डॉलर पर रोक लगाई है पाकिस्तान हायपर इंफ्लेशन या अति मुद्रास्फीति की गिरफ़्त में आ गया है. आईएमएफ़ का कहना है कि देश की आर्थिक स्थिति पहले जो सोची जा रही थी उससे कहीं बदतर है.

आईएमएफ़ का ये भी मानना है कि पाकिस्तान ने अपने बजट घाटे को कम करने के लिए कुछ नहीं किया है जोकि मौजूदा वित्त वर्ष के चार प्रतिशत लक्ष्य को पार कर छह प्रतिशत हो गया है.

ये कमी इस साल के ख़त्म होते होते आठ प्रतिशत तक पहुँच सकता है.

मुद्रा कोष इस बात से भी नाराज़ है कि सरकार बिक्री कर और कृषि क्षेत्र में आमदनी पर कर लगाने के अपने वादे से पीछे हट गई है.

पाकिस्तान के अमीर ज़मींदार और राजनेता नहीं के बराबर आयकर देते है.

पर अपनी हिस्सेदारी देने में देर करने कर के आईएमएफ ने अरबों डॉलर के विश्व बैंक, एशियन डेवलपमैंट बैंक, जापान, यूरोपीय संघ और अमरीका से आ रहे द्विपक्षीय सहायता को भी खटाई में डाल दिया है.

सरकार की गठबंधन पार्टियों का सरकार से मोहभंग काफ़ी हद तक उसके आर्थिक कुप्रबंधन का कारण है. पिछले तीन सालों में सरकार में चार वित्त मंत्री नियुक्त हुए है.

गिलानी अब ऐसे प्रधानमंत्री हो गए है जिनके हाथ बंधे है -- जो कोई भी नए कर लागू नहीं कर सकते न ही कोई कड़े खर्च कम करने के उपाय ही लागू कर सकते.

अंतरराष्ट्रीय दबाव

साथ ही अमरीका और नेटो चाहते है कि अफग़ान सीमा पर पाकिस्तान की सेना आतंकवादियों को क़बायली इलाक़ों से खदेड़े. और पाकिस्तान सेना इस के लिए ज़्यादा तत्पर नहीं लगती. ये वो इलाक़ा है जहाँ अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियो को अल क़ायदा और पाकिस्तानी और अफ़गान तालेबान प्रशिक्षण दे रहे है.

हाल में एक अप्रत्याशित क़दम उठाते हुए ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और यूरोपीय संसद के नेताओं ने खुले शब्दों में पिछले कुछ महीनों में उत्तर वज़ीरिस्तान में चरमपंथियों के खिलाफ़ क़दम न उठाने पर आलोचना की है.

यूरोप में नवीनतम आतंकवाद की विफल कोशिश की घटना में स्वीडन और डेनमार्क में पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था. इनकी कोशिश थी कि दो साल पहले पाकिस्तानी आतंकवादियों के मुम्बई पर हमले की तर्ज़ पर हमला करें. प्रेस रिपोर्टों के अनुसार अरब मूल के इन पाँच में से दो लोग पाकिस्तान प्रशिक्षण पाने के लिए गए थे.

जर्मनी में, पाकिस्तान में प्रशिक्षित जर्मन नागरिकों के हाथों आतंकवादी हमलों के ख़तरे के मद्देनज़र, हाई अलर्ट की घोषणा की गई है. दिसंबर में क़रीब एक दर्जन चरमपंथी गिरफ्तार किए गए थे. दिसंबर में ही स्टॉकहोम में एक आत्मघाती हमलावर ने क्रिसमस की खरीददारी कर रहे लोगों के बीच बम धमाके की कोशिश में खुद को उड़ा दिया था. इस अरब मूल के बम हमलावर का रिश्ता पाकिस्तान में पैदा हुए इंग्लैंड के लुटन शहर के एक चरमपंथी से बताया जाता है.

हाल में वरिष्ठ अमरीकी और यूरोपीय अधिकारियों ने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि उनकी भूमि पर हुए किसी भी हमलें का कोई संबंध पाकिस्तान के क़बायली इलाक़े से पाया गया तो इसके गहरे परिणाम झेलने पड़ सकते है.

पर पाकिस्तान की इस्लामी पार्टियों पर पश्चिमी देशों की इस धमकी का कोई असर होते नहीं दिखता. पिछले हफ्ते ही उन्होंने एक दिन की ईशनिंदा क़ानून को सुधारने के प्रस्ताव के विरुद्ध देशव्यापी हड़ताल की थी. ये विरोध ईशनिंदा क़ानून के तहत एक महिला को मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद किया गया था.

गिलानी चाहे अगले कुछ हफ्ते अपनी कुर्सी बचा लें पर ये तय है कि मौजूदा सरकार इतने लचर हाल में है कि वो इस संकट की घड़ी में कोई भी क़दम नहीं उठा पा रही जिससे पाकिस्तान को मौजूदा संकट से उबारने का काम कर सके. और इस सब के बीच पाकिस्तानी लोग आगे आने वाले और आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक असंतोष के सामने की तैयारी कर रहे है.

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