पाकिस्तान में कट्टरपंथ का बोलबाला

सलमान तासीर

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ऐसे वक्त में अमरीका की यात्रा पर हैं जब उनका देश उस पाकिस्तान से बहुत अलग दिख रहा है जिसका प्रतिनिधित्व उन्होंने दो साल पहले अपनी यात्रा में किया था.

पिछले हफ्ते सारी दुनिया एक नज़ारे को अविश्वास से देखती रह गई. जब दसियों हज़ार पाकिस्तानी एक ऐसे आदमी के साथ खड़े नज़र आए जिसने पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत के गवर्नर को गोलियों से भून डाला था.

मारे गए गवर्नर सलमान तासीर देश के एक सबसे अमीर व्यापारी थे, एक वरिष्ठ राजनेता, सत्ताधारी पार्टी के एक प्रमुख सदस्य और राष्ट्रपति ज़रदारी के नज़दीकी दोस्त.

ज़्यादा अहम बात यह है कि वो पाकिस्तान के विवादास्पद ईश निंदा क़ानून का विरोध कर रहे थे और उनका सार्वजनिक रुप से ऐसा करना उनकी मौत का कारण बना.

हैरान करने वाली बात ये है कि उनकी हत्या, दिन दहाड़े उनके ही सुरक्षा गार्ड ने राजधानी इस्लामाबाद में की जोकि पाकिस्तान का ऐसा शहर है जहाँ सुरक्षा का सबसे कड़ा इंतज़ाम है. उससे भी ज़्यादा हैरान परेशान करने वाली बात ये थी कि किस तरह के लोग इस हत्यारे के समर्थन में उमड़ें.

व्यापक समर्थक

इनमें हज़ारों लोग ऐसे थे जिन्हें पाकिस्तान के शासक देश के मध्यमार्गी शहरी मध्यम वर्ग का नाम देता रहा है. इनमें वक़ील, पत्रकार, व्यापारी, व्यवसाई और पेशेवर लोग शामिल है. ये निरंतर बढ़ते रहने वाला वो तब़का है जो देश के सांस्कृतिक और वाणिज्यिक जीवन को देश के बड़े शहरों मे आगे बढ़ाता है.

तासीर की हत्या तक उन्हें दुनिया के सामने असली पाकिस्तान के रुप में पेश किया जाता था. जो धार्मिक था पर मध्यमार्गी भी, एक चुप रहने वाला बहुमत.

पर अब इस हत्या के बाद उन्हें तासीर के हत्यारे को फूल मालाएं पहनाते देखा गया और ये लोग उदारवादियों को तासीर के समर्थन में बोलने पर तासीर की तरह ही जान गवाने की धमकी देते भी नज़र आए.

ज़रदारी पर नज़र

अब ज़रदारी के लिए दिक्कत ये है कि वो कैसे समझाए की उनके लोकतंत्र की छत्रछाया में कब और कैसे पाकिस्तान इतने नाटकीय अंदाज़ में बदल गया.

पाकिस्तानी अधिकारियों ने संकेत दिए है कि वो देश के क़बायली इलाक़ों में लगातार जारी ड्रोन हमलों को इसका ज़िम्मेदार ठहराएंगे. ये कह कर कि ऐसा करने से अमरीका विरोधी भावनाएं बढ़ती है जिससे कट्टर धार्मिक सोच रखने वालों को राजनीति में ज़्यादा जगह मिलती है.

पर कई विश्लेषक कहते हैं कि अगर वो ये तर्क लेते है तो वो या तो असलियत से नावाकिफ़ है या जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं.

इन विश्लेषकों का तर्क है कि पाकिस्तान में लगातार पिछले तीन दशकों से जिहाद चल रहा है. अफ़ग़ानिस्तान के साथ सोवियत संघ के युद्ध के समय से लेकर कश्मीर में घुसपैठ, तालेबान के अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में बढ़ते क़दम तक पाकिस्तान एक संघर्ष से दूसरे का 1979 से सामना कर रहा है.

इसका मतलब ये कि 40 साल से कम उम्र के पाकिस्तानी अपने देश को धर्म पर आधारित एक युद्ध से दूसरे युद्ध में जाते हुए देख रहे हैं. पाकिस्तान के उदारवादी, इस पीढ़ी को अकसर युद्ध की पीढ़ी बुलाते हैं, और ये पाकिस्तान की 18 करोड़ आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा है.

कट्टरपंथ की बढ़ती जकड़

मानवाधिकार कार्यकर्ता सालों से चेतावनी देते रहें है कि इस आबादी में जो कट्टरपंथ की धारा बह रही है वो उससे अलग नहीं जो पाकिस्तान के तालेबान में है. वो तालेबान जो देश के सुरक्षा बलों के साथ पिछले दस सालों से क़बायली इलाक़ों में लड़ रहा है.

पर ये एक मुश्किल तर्क है, ख़ासकर एक ऐसे माहौल में जहाँ समाज में दशकों से तेज़ी से बदलाव आ रहे हैं, और ऐसे में इस तरह की कहानी को समाचारों का हिस्सा बनाना मुश्किल रहा है.

पर अब ये बात कहने का समय आ गया है. पर सवाल ये है कि क्या ज़रदारी ऐसा करेंगे. क्योंकि वो अगर ऐसा करने की कोशिश भी करते है तो उन्हें अविश्वास की उस दीवार का सामना होगा, जो 11 सितंबर के हमलों के बाद से अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों को चरितार्थ करती है.

युद्ध में सहयोगी होते हुए भी अमरीकी इस बात को मानने को तैयार नहीं होते की कट्टरपंथी धार्मिक ताक़तें वाकई ऐसी राय रखते हैं.

पश्चिम की शंका

कई पश्चिमी विश्लेषक अब भी मानते हैं की पाकिस्तान का सुरक्षा तंत्र जोकि देश की विदेश नीति पर हावी है, अकसर पश्चिम से और रियायतें लेने के लिए कट्टरपंथियों का हौवा दिखाते हैं.

उनकी निगाहों में तासीर की हत्या के बाद का सारा मामला भी पाकिस्तान की शक्तिशाली सेना की सोची समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है. क्योंकि सेना को डर है कि पाकिस्तानी भूमि से तालेबान को हटाने की अपनी मुहीम को अमरीका 2011 में और तेज़ करने जा रहा है.

पाकिस्तान के उदारवादियों को शायद आशा है कि देश में उदारवादी राजनीति फिर से अपनी जगह बना ले. पर ये आशा इस पर टिकी है कि ज़रदारी अपने अमरीकी साथियों का पाकिस्तान को शक की नज़र से देखना बंद करवा पाएंगे या नहीं.

साथ ही क्या ये भी विश्वास दिलवा पाएंगे कि अमरीकी फौज को सहायता देने से दुनिया का एकमात्र मुस्लिम देश अपनी काया पलट पाएगा.

हालांकि पाकिस्तान के लिए दुख की बात ये है कि ये ज़िम्मेदारी देश के एक सबसे ख़राब छवि वाले नेता के हाथ है.

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