पाक सेना मुख्यालय पर हुए हमले की सुनवाई

पाकिस्तानी सेना

पाकिस्तानी सेना ने क़रीब डेढ़ साल पहले अपने मुख्यालय पर हुए चरमपंथी हमले के आरोप में सात अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कर लिया है जिसकी सुनवाई एक सैन्य अदालत में शुरु कर दी गई है.

फ़ील्ड जनरल कोर्ट मार्शल के समक्ष इस मुक़दमे की सुनवाई गत 24 जनवरी को शुरु हुई थी लेकिन सैन्य अधिकारी इस कार्रवाई को गुप्त रखने की कोशिश कर रहे हैं.

रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पर 10 अक्तूबर, 2009 की सुबह चरमपंथियों ने हमला कर दिया था.

आत्मघाती हमलावर मुख्यालय के प्रवेश द्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की हत्या कर इमारत के भीतर दाख़िल होने में सफ़ल हो गए थे जहाँ उन्होंने करीब 20 सैनियों को कई घंटों तक बंधक बनाकर रखा था.

सेना ने एक व्यापक स्तर पर अभियान चलाकर नौ हमलावरों को मार दिया था और एक चरमपंथी डॉक्टर उस्मान को गिरफ़्तार कर लिया था. उस हमले में 11 सैनिक भी मारे गए थे.

पाकिस्तानी सेना ने घटना के कुछ दिनों बाद छह ओर लोगों को हिरासत में लिया था जिन पर अब मुक़दमा चलाया जा रहा है.

जिन अभियुक्तों पर मुक़दमा चलाया जा रहा है उनमें से डॉक्टर उस्मान और उनका साथी इमरान सेवानिवृत्त सैनिक हैं जबकि पांच अभियुक्तों का सेना से संबंध नहीं है.

मुक़दमा

असैनिक अभियुक्त डॉक्टर उस्मान के दोस्त समझे जाते हैं और सेना का कहना है कि इन लोगों को मुख्यालय पर हमले की योजना की जानकारी थी और डॉक्टर उस्मान की मदद की थी.

असैनिक अभियुक्तों का बचाव कर रहे वकील इनाम रहीम ने बीबीसी को बताया कि इन आरोपों के तहत असैनिक अभियुक्तों का कोर्ट मार्शल नहीं किया जा सकता.

उन्होंने आगे कहा कि जो आरोप मेरे मुवक्किलों के ख़िलाफ़ लगाए गए हैं उसकी सुनवाई फ़ौजी अदालत में नहीं हो सकती.

इनाम के अनुसार उन्होंने सैन्य अदालत को बताया कि 10 अक्तूबर, 2009 के हमले लिप्त सभी हमलावर मारे गए इसलिए ये बात तय है कि उन असैनिक अभियुक्तों में से कोई उस हमले में लिप्त नहीं था.

इनाम रहीम ने बताया कि उनके मुवक्किल पिछले 15 महीनों से ख़ुफ़िया एजेंसियों की हिरासत में हैं और उस दौरान उनके परिजनों को कोई सूचना नहीं दी गई.

उन्होंने आरोप लगाया कि सैन्य अधिकारी मुक़दमे की सुनवाई के दौरान भी उनके मुवक्किलों से मिलने की अनुमति नहीं दे रहे हैं.

इस मुक़दमे की सुनवाई पर प्रतिक्रिया लेने के लिए कई बार पाकिस्तानी सेना से संपर्क किया गया लेकिन सेना की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

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