'अब अल्लाह की अदालत से उम्मीद'

मुख़्तारां माई
Image caption मुख़्तारां माई ने अदालती फ़ैसले पर निराशा जताई है.

पाकिस्तान में स्थानीय पंचायत के फ़ैसले पर सामूहिक बलात्कार का शिकार बनीं मुख़्तारां माई ने कहा है कि अदालत के फ़ैसले पर उन्हें निराशा हुई है.

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लाहौर हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखते हुए मुख़्तारां माई के मुक़दमे में छह में से पांच अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश दिया.

मुख़्तारां माई ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "सुप्रीम कोर्ट से मुझे बहुत उम्मीद थी कि वह मुझे न्याय देगा लेकिन फ़ैसले से निराशा हुई है."

उन्होंने आगे कहा, "अगर सुप्रीम कोर्ट को यह फ़ैसला बरक़रार रखना था तो मुझे पाँच साल लटकाए क्यों रखा और अब तो मैं इन अदालतों से थक गई हूँ."

'अपील नहीं'

उन्होंने बताया कि वे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अदालत में अपील नहीं करेंगी क्योंकि वे 10 सालों से लगातार अदालतों के धक्के खा रही हैं.

उन्होंने कहा, "मैं पिछले 10 सालों से अदालतों के चक्कर लगा रही हूँ और अब मैं बिल्कुल थक गई हूँ. अब सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया है तो उससे ऊपर तो सिर्फ अल्लाह की अदालत है. मुझे अब अल्लाह की अदालत से उम्मीद है."

मुख़्तारां माई ने बताया कि इस फ़ैसले के बाद उनकी ज़िंदगी को ख़तरा हो गया है और अगर उनके साथ ऐसा हुआ तो सरकार और सुप्रीम कोर्ट ज़िम्मेदार होगी.

उन्होंने बताया कि वे इस समाज को बदलने और न्याय के लिए संघर्ष जारी रखेंगी और बलात्कार की शिकार महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ेंगी.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ उन्होंने विरोध प्रदर्शन करने की भी घोषणा की.

सामूहिक बलात्कार

ग़ौरतलब है कि पंजाब प्रांत के दक्षिणी ज़िले मुज़फ़्फ़रगढ़ में 2002 को स्थानीय पंचायत के फ़ैसले पर मुख़्तारां माई का सामूहिक बलात्कार किया गया था.

पुलिस ने इस मामले में 14 अभियुक्तों को स्थानीय अदालत में पेश किया था जिसमें से छह लोगों को सज़ा सुनाई थी और आठ लोगों को रिहा कर दिया था.

स्थानीय अदालत ने मुख़्तारां माई के साथ सामूहिक बलात्कार करने के आरोप में अब्दुल ख़ालिक़, अल्लाह दित्ता, फ़याज़ और ग़ुलाम फ़रीद सहित छह अभियुक्तों को मौत की सज़ा सुनाई थी.

लाहौर हाई कोर्ट ने 2005 में एक अभियुक्त अब्दुल ख़ालिक़ की सज़ा बरक़रार रखी थी और बाक़ी पांच अभियुक्तों को रिहा कर दिया था.

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