'गिलानी के बयान से अमरीका में दाल गलने वाली नहीं है'

गिलानी ने ओसामा की मौत के बाद उठे सवालों पर संसद में बयान दिया. इमेज कॉपीरइट Reuters

अल क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान के ऐबटाबाद में काकूल सैन्य अकेडमी के क़रीब छिपे होने की शुरुआती शर्मिंदगी के बाद प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने कहा है कि देश-विदेश में पाकिस्तान की आलोचना अब ख़त्म होनी चाहिए.

ओसामा के ऐबटाबाद में होने का मतलब है ब्रिटेन में सैनथर्स्ट या अमरीका में वेस्ट प्वॉंट के क़रीब यानी महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया सेवाओं के अड्डे के पास होना.

ओसामा संबंधी घटनाक्रम पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का बयान पढ़ें

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ओसामा संबंधित पूरे घटनाक्रम पर बयान देते हुए इन आरोपों को ख़ारिज किया कि ओसामा का पाकिस्तान में मारा जाना पाकिस्तानी अधिकारियों की असफलता को दर्शाता है. उन्होंने पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का अल क़ायदा के कुछ सदस्यों से मिलीभगत के आरोपों को भी बेमानी बताया.

'पाक पर दबाव बढ़ाने की घड़ी'

लेकिन गिलानी के बयान से अमरीका में कोई दाल गलने वाली नहीं है. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमरीका के निजी टीवी चैनलों ने इस बयान को दिखाया तक नहीं है.

उधर राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि 'यह एक महत्वपूर्ण घड़ी है जब पाकिस्तान और अमरीका और कारगर तरीके से मिलकर काम करने के बारे में तय कर सकते हैं.'

लेकिन अन्य लोग काफ़ी स्पष्ट बात करेंगे. वे इस घड़ी को ऐसे मोके की तरह देखते हैं जब मीडिया और अमरीकी संसद में पाकिस्तान की आलोचना के ज़रिए उसे अपनी ही संस्थाओं में अल क़ायदा के समर्थकों को निकाल फेंकने के लिए मजबूर किया जा सकता है.

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अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही ओबामा प्रशासन स्पष्ट कर चुका है कि अफ़ग़ान रणनीति नाम की कोई चीज़ नहीं है. पहले इसे आफ़-पाक रणनीति यानी अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान रणनीति कहा जाता था. फिर उसे पाक-आफ़ यानी पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान रणनीति कहा जाने लगा.

आप उसे जो भी कहें, ये सभी मानते हैं कि अल क़ायदा के साथ लड़ाई में शायद पाकिस्तान से निपटना ज़्यादा महत्वपूर्ण हो.

सभी जानकार मानते हैं कि सरकार के कुछ तत्व और विशेष तौर पर (पाकिस्तान की) ख़ुफ़िया एजेंसी के लोग जिहादियों के साथ मिले हुए हैं और उन्हें ज़रूर पता होगा कि ओसामा क्या कर रहा था.

'अमरीकी मदद के लिए शर्तें'

साथ ही ये भी समझना ज़रूरी है कि कि पाकिस्तान की सरकार के जो लोग उग्रवादियों और कट्टपंथियों के ख़िलाफ़ हैं, वे उस जनता के बारे में भी सोच रहे हैं, जो उन्हें अमरीकी कठपुतलियों के रूप में देखती है.

फिर भी वर्ष 2002 से अमरीका ने पाकिस्तान को 18 अरब डॉलर की मदद दी है. अमरीकी संसद के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा है कि एक दमड़ी भी और दिए जाने से पहले ये पहले पाकिस्तान को यह तय करना होगा कि वह किस तरफ़ खड़ा है.

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एक अन्य अमरीकी सांसद ने कहा है कि मदद देने के लिए और शर्तें रखी जानी चाहिए.

संभवत: मदद तो बंद नहीं होगी लेकिन इस पूरी कवायद का मतलब है कि भविष्य में कुछ करके दिखाने का पाकिस्तान पर राजनीतिक दबाव बढ़ेगा.

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जहाँ यह बहस जारी है वहीं राष्ट्रपति ओबामा को विश्व में अन्य जगहों पर ओसामा को मारने की कार्रवाई के क़ानूनी या नैतिक पहलुओं पर जताई गई चिंता की फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है.

ऐसा इसलिए क्योंकि ये मुद्दा अमरीका में किसी ने उठाया ही नहीं है. साथ ही, राष्ट्रपति ओबामा कह चुके हैं कि यदि कोई कहता है कि ओसामा के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर यदि किसी के कोई सवाल हैं, तो उसे अपने दिमाग का इलाज कराने की ज़रूरत है.

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