हमले के पीछे नई तरह के चरमपंथी

Image caption हमलावर सैनिक साज़ोसामान को निशाना बनाने को प्राथमिकता दे रहे थे

पाकिस्तान के मेहरान नौसैनिक ठिकाने पर एक बड़े चरमपंथी हमले से संदेह पैदा होता है कि कहीं सैनिकों की तरह प्रशिक्षण प्राप्त हमलावरों को अंदर से मदद तो नहीं मिली हुई थी.

सवाल पाकिस्तान के सैनिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है क्योंकि मेहरान में चरमपंथियों पर काबू पाने में स्पेशल सर्विसेज़ ग्रुप-नेवी(एसएसजी-एन) को 15 घंटे लगे. याद रहे कि पाकिस्तान में एसएसजी-एन की हैसियत अमरीकी नौसेना के सील दस्ते जैसी है. इसलिए इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि मेहरान बेस पर कार्रवाई के दौरान कई घंटों तक एसएसजी-एन चरमपंथियों के सामने प्रभावहीन नज़र आए.

साधारण चरमपंथी नहीं

एक सुरक्षा अधिकारी ने अपना नाम नहीं देने की शर्त पर कहा, “वे साधारण चरमपंथी नहीं थे. तालिबान तो बिल्कुल ही नहीं. तालिबान के हमलावर अधिकतम लोगों को मारने और ज़्यादा से ज़्यादा विनाश करने की कोशिश करते हैं लेकिन मेहरान सैनिक ठिकाने पर हमला करने वालों का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट था.”

हमले की शुरुआत से ही साफ़ हो गया था कि हमलावरों को सैनिक ठिकाने के भीतर की स्थिति की विस्तृत जानकारी है. उन्हें इस बात का भरोसा था कि वे अपने उद्देश्य में सफल होंगे. साफ़ दिखता है कि हमले की योजना लंबे समय से बनाई जा रही थी.

एक अन्य अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि हमलावरों को सैनिक ठिकाने के कमज़ोर पहलुओं की जानकारी थी, तभी तो वे आसानी से पूर्वी हिस्से की दीवार सीढ़ियों से लाँघ कर अंदर आ गए. यह जानकारी उन्हें अंदर के सूत्रों से मिली होगी.

अधिकारी ने बताया, “यह दीवार हवाई पट्टी के पास थी. सुरक्षा टॉवर दूर बनाया गया है क्योंकि हवाई पट्टी पर नियमित रूप से विमानों का आवागमन चलता रहता है.”

अलग तरह का हमला

अधिकारियों से मुझे और भी कई बातें पता चलीं जिनसे पता चलता है कि मेहरान का चरमपंथी हमला अलग किस्म का था-

सैन्य संरचना- एक घायल सैनिक ने अधिकारियों को बताया कि हमलावरों का हुलिया और उनकी चालढाल सैनिकों जैसी थी. चरमपंथी किसी रणनीतिक सैन्य संरचना के अनुरूप संगठित होकर आगे बढ़ रहे थे. उनकी ज़ुबान पर भी सैनिकों जैसी बातें थीं. वे आपस में उर्दू के अलावा एक विदेशी भाषा का भी इस्तेमाल कर रहे थे.

पोशाक और हथियार- अधिकारियों का कहना है कि हमलावरों ने लड़ाई में शामिल सैनिकों जैसी वर्दी पहन रखी थी. उनके पास रात में देखने में सहायक उपकरण भी थे. याद रहे कि नाइटविज़न उपकरणों का आसानी से इस्तेमाल बहुत अभ्यास के बाद ही संभव हो पाता है. उन्होंने हाथों में आरपीजी उठा रखी थीं.

रणनीति- एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि हमलावर उसे भलीभांति देख रहे थे लेकिन उन्होंने जानबूझ कर उसे नज़रअंदाज़ करते हुए विमान तल पर खड़े दो विमानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. इससे लगता है कि उन्हें सैनिक साज़ोसामान को नष्ट करने का निर्देश मिला हुआ था. वे अलग-अलग टोलियों में बंट गए जिनके अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित लग रहे थे.

अचूक निशाना- एक सुरक्षा अधिकारी के अनुसार हमलावर अच्छे निशानेबाज़ थे. उन्होंने अपने नाइटविज़न चश्मों का ख़ूब फ़ायदा उठाया. यही कारण है कि एसएसजी-एन के जवानों के मौक़े पर पहुँचने तक वे बेरोकटोक हमले करते रहे. जब दोतरफ़ा लड़ाई शुरू हुई तो साफ़ लग रहा था कि वे ख़ासी देर तक अपने बल पर मुक़ाबला करने में सक्षम हैं. उनके पास एम16 कार्बाइन और स्नाइपर राइफ़लों का होना भी उल्लेखनीय है.

अधिकारियों का कहना है कि उपरोक्त तथ्यों से साफ़ हो जाता है कि वे तालिबान हमलावरों से अलग तरह के थे. तालिबान के हमले भी भयानक होते हैं लेकिन उनके हमलावर इस तरह संगठित नहीं होते.

एक अधिकारी के अनुसार पाकिस्तानी सैनिकों से तो तालेबान के लड़ाकों की तुलना ही नहीं की जा सकती. तालिबान के पास सबसे बड़ा हथियार होता है आत्मघाती हमलावर. साथ ही वे अच्छे निशानेबाज़ भी नहीं होते हैं. तालिबान की दिलचस्पी सैनिक साज़ोसामान को नष्ट करने में नहीं, बल्कि लोगों की जान लेने में होती है.

हमले की तेज़ी

नौसेना के एक प्रवक्ता का कहना है कि नौसैनिकों की बड़ी संख्या के कारण ही हमलावरों को ज़्यादा विमानों को नष्ट करने नहीं दिया जा सका.

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Image caption पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा मंत्री रहमान मलिक ने हमले को कायरतापूर्ण कार्रवाई बताया

लेकिन हमला जिस तेज़ी के साथ किया गया उस पर सैनिक अधिकारी हैरान हैं. विमानों को नष्ट करने में हमलावरों को कुछ ही मिनट लगे होंगे.

हमलावरों में से एक कुछ ज़्यादा ही ख़तरनाक था. एक अधिकारी के अनुसार छोटे क़द और दाढ़ी वाले इस हमलावर ने पहले एम16 राइफ़ल और फिर दो यूज़ी सबमशीनगनों का इस्तेमाल किया. एक सैनिक को तो उसने 600 गज दूर से मार गिराया.

हमलावर जिस क़दर तेज़ी से अपनी रणनीति बदल रहे थे, उस पर भी सैनिक अधिकारी हैरान हैं.

ऐसा लगता है कि हमलावरों के लक्ष्यों में वे बैरक भी शामिल थे जिनमें चीनी इंजीनियर रह रहे थे. जब नौसेना के कमांडों बैरकों की रक्षा के लिए पहुँच गए तो हमलावरों ने उन बख़्तरबंद गाड़ियों को निशाना बनाने की कोशिश की जिन पर चीनी इंजीनियरों को ले जाया जा रहा था.

जब चीनी इंजीनियरों को सुरक्षित बचा लिया गया तो उसके बाद हमलावरों ने अलग-अलग टोलियों में बंट कर बैरकों मे पोजीशन ले ली.

एक अधिकारी ने बताया, “मुठभेड़ ख़त्म होने के बाद हमने पाया कि उनके पास बैरकों का विस्तृत खाका मौजूद था.”

अंतत: एसएसजी-एन के जवानों ने बैरकों में घुस कर शेष बचे चरमपंथियों को मार डाला. हमलवार लंबी लड़ाई की तैयारी करके पहुँचे थे क्योंकि उनके पास पर्याप्त मात्रा में मेवे मिले.

मुंबई हमले से तुलना

पाकिस्तानी अधिकारी इस बात से इनकार करते हैं कि हमला ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की प्रतिक्रिया में था. एक अधिकारी के अनुसार मेहरान के हमले की तैयारी में महीनों लगे होंगे और इसकी तुलना सिर्फ़ मुंबई हमलों से की जा सकती है.

अधिकारी के अनुसार, “पाकिस्तान में ये अपनी तरह का पहला हमला भले ही हो, ये आख़िरी तो निश्चय ही नहीं होगा.”

अधिकारियों का कहना है कि इस तरह का अनुभव इससे पहले पाकिस्तान के क़बायली इलाक़ों में ख़ास कर चेचन और उज़्बेक मूल के अल-क़ायदा चरमपंथियों से मुठभेड़ का ही रहा है.

एक अधिकारी ने कहा, “उन्होंने जिस तरह हमला किया, मैं यही कह सकता हूँ कि वे अपने आप में कमांडो से कम नहीं थे.”

इस अधिकारी की सोच वाले बहुत लोग हैं जो मानते हैं कि कुछ हमलावर या तो कार्यरत या फिर सेवानिवृत सैनिक रहे होंगे.

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