'पाक में अल्पसंख्यकों के साथ पक्षपात'

ईसाई

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों विशेषकर ईसाईयों पर हमले बढ़ रहे हैं.

पाकिस्तान की एक ग़ैर-सरकारी संस्था ने देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि अल्पसंख्यकों को पक्षपाती नियमों का सामना करना पड़ रहा है और विवादास्पद ईश-निंदा क़ानून को ख़त्म किया जाए.

इस रिपोर्ट को जिन्ना संस्थान ने तैयार किया है और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘एशियन ह्यूमन राईट्स कमीशन’ ने जारी किया है.

रिपोर्ट में पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति का विस्तार से आकलन किया गया है.

जिन्ना संस्थान की रिपोर्ट में बताया गया है कि विवादास्पद ईश-निंदा क़ानून में संशोधन के ख़िलाफ़ हुए हिंसक प्रदर्शनों पर वर्ष 2010 का अंत हुआ और वर्ष 2011 की शुरुआत पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी की हत्या से हुई. दोनों नेताओं ने ईश-निंदा क़ानून में संशोधन के लिए कोशिशें की थी.

'ईश-निंदा क़ानून में संशोधन नहीं'

रिपोर्ट में सरकार को कड़ी आलोचना का निशाना बनाया गया है और बताया गया है कि सरकार धार्मिक दलों के भारी दबाव के बाद ईश-निंदा क़ानून में संशोधन करने से पीछे हट गई.

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अल्पसंख्यकों पर हो रहे ताज़ा हमले सभी स्तर पर साज़िश का नतीजा हैं जिसमें न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका शामिल हैं.

जिन्ना संस्थान के मुताबिक़ सरकार ने पाकिस्तानियों की नागरिकता को दो हिस्सों मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम में बांटने में भूमिका निभाई है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि बढ़ते हुए चरमपंथ के बीच एक तरफ़ चरमपंथी अल्पसंख्यकों को ईश-निंदा क़ानून की आड़ में धमकियाँ देते हैं, दूसरी तरफ़ सरकार भी उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करती जो अल्पसंख्यकों पर हिंसा करते हैं.

'अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मिले'

जिन्ना संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को कुछ प्रस्ताव दिए हैं जिसके मुताबिक ईश-निंदा क़ानून को ख़त्म किया जाए और अगर सराकर उसे ख़त्म नहीं कर सकती है तो उस क़ानून के ग़लत इस्तेमाल को रोके.

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए पुलिस को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वह बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई कर सके.

ग़ौरतलब है कि जिन्ना संस्थान पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शेरी रहमान की संस्था है और उन्होंने ही सबसे पहले विवादास्पद ईश-निंदा क़ानून में संशोधन का बिल संसद में पेश किया था. बाद में सरकार के भारी दबाव के बाद उन्होंने यह बिल वापस ले लिया था.

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