अमरीकी कटौती का असर

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पिछले महीने पाकिस्तानी सेना के उच्च अधिकारियों की एक बैठक में कहा गया था कि गत दस बर्षों अमरीका ने जितनी सहायता का वादा किया था उतनी उन्हें दी नहीं है.

इस बैठक में यहां तक कहा गया कि सुरक्षा सहायता का प्रयोग लोगों की आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए किया जाना चाहिए.

रविवार को अमरीका के सैनिक सहायता में कटौती के फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए एक सैन्य प्रवक्ता ने कहा कि पाकिस्तानी सेना अपने बूते पर चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में सक्षम है और अमरीकी सहायता की उपलब्धता से ये क़ाबियलियत प्रभवित नहीं होगी.

अगर पाकिस्तानी सेना पर 80 करोड़ अमरीकी डॉलर की सुरक्षा सहायता में कटौती का कोई असर नहीं पड़ेगा तो अमरीका ने ऐसा क़दम उठाया ही क्यों?

अमरीका बार-बार ये कहता रहा है कि अफ़गानिस्तान में शांति की कुंजी पाकिस्तान सेना के पास है.

आने वाले महीनों में अफ़गानिस्तान में मौजूद अमरीका सेना में काफ़ी कटौती की जाएगी और उसके बाद वहां पाकिस्तान सेना की भूमिका और अहम हो जाएगी.

पाकिस्तान सेना का 'अपमान'

पाकिस्तान में बहुत से लोगों का मानना है कि अमरीका का कटौती का ये फ़ैसला पाकिस्तानी सेना का 'अपमान' है और ये अमरीका के अफ़गानिस्तान में लक्ष्यों पर विपरीत असर डाल सकता है.

कनाडा में रहने वाले पाकिस्तानी टीकाकार कामरान बुख़ारी के अनुसार वॉशिंगटन में कुछ लोगों का मानना है कि इस समय पाकिस्तानी सेना को दबाव में लाया जा सकता है क्योंकि देश के भीतर उसके सम्मान को धक्का लगा है.

कुछ लोगों का ये भी मानना है कि ये पाकिस्तानी सेना की ग़लती है कि एक प्रमुख सैनिक अकादमी के क़रीब रह रहे ओसामा बिन लादेन के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी.

ऐसे लोगों का मत है कि बिन लादेन ऑपरेशन के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को शर्मिंदा होना पड़ा था.

कामरान बुख़ारी ने बीबीसी को बताया,"पाकिस्तान में सुरक्षा तंत्र हमेशा ही राजनीतिक परिदृश्य पर हावी रहा है और अमरीका को लगता है कि वो इस दवाब का प्रयोग 'सिविल-मिलिटरी' असंतुलन को दुरुस्त करने के लिए कर सकता है."

हालांकि बुख़ारी का मानना है कि ये सोच कारगर सिद्ध नहीं होगी क्योंकि पाकिस्तान में आम राय इसके विरुद्ध है और देश का मीडिया मज़बूत और स्वतंत्र है और साथ ही पाकिस्तान पर कोई सैनिक तानाशाह राज नहीं कर रहा है.

बलि का बकरा

पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री ख़ुर्शीद मेहमूद कसूरी मानते हैं कि सेना के पास ऐसे संसाधन हैं कि वो बिना किसी अमरीका सहायता के भी अपना काम कर सकती है.

कसूरी का कहना है कि अमरीकी फ़ैसले के पीछे वहां होने वाले राष्ट्रपति चुनावों की राजनीति का खेल है.

उन्होंने कहा, "उन्हें अफ़गानिस्तान की विफलताओं के लिए कोई बलि का बकरा चाहिए और वो सोचते हैं कि इस मक़सद के लिए पाकिस्तान सेना सही है."

लेकिन पाकिस्तान में ऐसे भी लोग हैं जो इस अमरीकी कटौती को गंभीरता से लेते हैं.

रक्षा विश्लेषक और 'मिलिटरी इंक' नामक किताब की लेखिका आयशा सिद्दिक़ा आग़ा कहती हैं, " ये एक संकेत हो सकता है, अगर अमरीकी पाकिस्तान की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं होते हैं तो भविष्य में और कटौती हो सकती है और उससे हालात और बिगड़ जाएंगे. पाकिस्तान की ऋण चुकाने की क्षमता पर कई प्रश्नचिन्ह हैं और दीर्घकाल में इसका असर देश की सुरक्षा और राजनीतिक तंत्र पर पड़ सकता है."

कुछ अन्य लोग मानते हैं कि इसका असर एक साल के भीतर ही दिखने लगेगा.

दूर होगा गतिरोध

लाहौर के एक राजनीतिक और रक्षा विश्लेषक डॉक्टर हसन असकरी रिज़वी कहते हैं, "कबाइली इलाक़ों में ऑपरेशन जारी हैं और उनके चलते वित्तीय दबाव बढ़ता रहेगा. छह से आठ महीनों में ये एक समस्या बन सकती है. इन क्षेत्रों में प्रयोग में लाए जाने वाले सैनिक साज़ो-सामान में कटौती का असर सेना की क्षमता पर पड़ेगा. और साथ ही इसका असर सेना के आधुनिकीकरण कार्यक्रम पर भी पड़ेगा."

डॉक्टर हसन असकरी रिज़वी के अनुसार अमरीकी कटौती का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मिलने वाले धन पर भी पड़ेगा जो पाकिस्तानी के लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण है.

डॉ.रिज़वी के अनुसार ये गतिरोध दो से तीन महीनों में सुलझा लिया जाएगा.

उन्होंने कहा, "हमें उनके हथियार और उनकी आर्थिक सहायता चाहिए और उन्हें अफ़गानिस्तान में हमारा साथ. हम एक-दूसरे पर दबाव तो डाल सकते हैं लेकिन आख़िर में हमें मिलजुल कर ही काम करना है."

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