'मौत को अपनी आँखों से देखा'

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Image caption क़बायली इलाक़ों में अग़वा की घटनाओं में बढ़ौतरी हुई है जिसमें तालिबान लिप्त पाए गए हैं.

“मैंने 40 दिनों तक रोज़ाना मौत को अपनी आँखों से देखा.”- यह शब्द 16 वर्षीय किशोर अब्दुल्लाह के हैं, जो तालिबान की क़ैद से फ़रार होने में सफ़ल रहा.

अब्दुल्लाह पाकिस्तान के क़बायली इलाक़े बाजौड़ का निवासी है, और वो उन बच्चों में शामिल था, जिन्हें क़रीब दो महीने पहले तालिबान ने अग़वा किया था.

अब्दुल्लाह के साथ अमानुल्लाह भी तालिबान की क़ैद से फ़रार हुए थे और दोनों लड़के रविवार को अपने गाँव पहुँचे.

अब्दुल्लाह ने बीबीसी से बातचीत करते हुए अपने अपहरण और फिर तालिबान की क़ैद से भागने का किस्सा सुनाया.

उन्होंने कहा कि क़ैद के दौरान उन्हें रात को कमरे में रखा जाता था और दिन के वक़्त एक पहाड़ी नाले में ले जाया जाता था.

'अपहरण की घटना'

उन्होंने अपने अपहरण की कहानी सुनाते हुए कहा, “हम ईद के दूसरे दिन पास ही पहाड़ों पर घूमने चले गए. जब हम चश्मे के क़रीब पहुँचे, तो कुछ बच्चों ने लंबे-लंबे बालों वाले सशस्त्र तालिबान को देख कर चीख़ना शुरु कर दिया कि ‘तालिबान हैं-तालिबान हैं.’ जिसके बाद हमने जान बचाने के लिए भागना शुरू कर दिया लेकिन हम वहाँ से निकलने में कामयाब नहीं हो सके.”

उन्होंने आगे कहा कि तालिबान की बड़ी-बड़ी दाढ़ियाँ और लंबे-लंबे बाल थे और उनकी संख्या चार थी.

अब्दुल्लाह कहते हैं, “हम तालिबान के साथ क़रीब एक घंटे तक पैदल चलते रहे और फिर उन्होंने हमें एक अज्ञात स्थान पर पहुँचा दिया, जहाँ हमें तीन गुटों में विभाजित कर विभिन्न इलाक़ों में ले जाया गया. दिन-रात सशस्त्र तालिबान हम पर नज़र रखते थे.”

उनके मुताबिक़ जिस इलाक़े में ताबिलान ने उन्हें रखा था, वहाँ छोटे-छोटे पहाड़ थे जिसके बीच में मकई के खेत थे.

अब्दुल्लाह ने बताया कि उस स्थान से कुछ ही दूरी पर एक छोटी आबादी दिखती थी, जिसमें कुछ ही घर थे लेकिन स्थानीय लोग कभी भी उनके पास नहीं आए.

'अमरीकी ड्रोन विमान'

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Image caption क़बायली इलाक़ों में सेना की मौजूदगी के बावजूद भी अपहरण की घटनाएँ हो रही हैं.

उन्होंने बताया, “जिस इलाक़े में तालिबान चरमपंथियों ने हमें रखा था, वहाँ हमने लड़ाकू विमानों की आवाज़े सुनी थी और ड्रोन विमान को देखा था.”

उन्हों आगे बताया, “जो तालिबान हम पर पहरा देते थे, उनकी भाषा उनके इलाक़े बाजौड़ जैसी लग रही थी लेकिन उनमें से हम किसी व्यक्ति को नहीं जानते थे.”

अब्दुल्लाह का कहना था कि क़ैद के दौरान उनको अपने माता-पिता बहुत याद आते थे और वह यह सोच रहे थे कि उनके जीवन का क्या होगा. “तालिबान हमें नाश्ते में चाय के साथ सूखी रोटी देते थे और दोपहर और शाम को ठंडे चावल या लोबिया मिलता था.”

अब्दुल्लाह और अपने 30 साथियों के साथ क़रीब 40 दिनों तक तालिबान की क़ैद रहे और बाद में वह अपने एक साथी अमानुल्लाह से साथ वहाँ से फ़रार होने में कामयाब हो गए.

'क़ैद से फ़रार'

उन्होंने तालिबान की क़ैद से फ़रार होने की कहानी सुनाते हुए कहा, “एक दिन मैं अमानुल्लाह के साथ एक पहाड़ी नाले में पेशाब करने के लिए चले गए और जब तालिबान की नज़र से छुप गए तो वहाँ से भाग गए, तालिबान ने थोड़ी देर बाद हमारा पीछा किया लेकिन हम वहाँ से फ़रार होने में कामयाब हो गए.”

उन्होंने कहा, “लगातार तीन घंटे पैदल चलने के बाद हम एक पहाड़ी पर पहुँच गए जहाँ से एक दूसरी पहाड़ी पर कुछ सुरक्षाबल नज़र आ रहे थे और फिर हम उनसे छुप गए.”

उनके मुताबिक़ उन्होंने करीब नौ घंटे पैदल सफ़र किया और शाम को क़रीब चार बचे अपने गाँव पहुँच गए और अपने माता पिता को देखा तो पूरी थकावट ही दूर हो गई.

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