इमरान की रैली तीसरे विकल्प की दस्तक?

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Image caption इमरान को वोट काटने वाले से बढ़कर प्रमुख पार्टियों के लिए चुनौती माना जा रहा है

पिछले रविवार को लाहौर के ऐतिहासिक मीनार-ए-पाकिस्तान में इमरान ख़ान की विशाल रैली को 'गेम चेंजर' यानी देश की राजनीति में पासा पलटने वाली घटना के तौर पर देखा जा रहा है.

ग़ौरतलब है कि मीनार-ए-पाकिस्तान वही ऐतिहासिक स्थल है जहाँ 1940 में पाकिस्तान प्रस्ताव अपनाया गया था.

पाकिस्तान के जो राजनीतिक दल इस रैली के असर और इमरान ख़ान के नई राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने को नज़रअंदाज़ करते हैं वो अपना ही नुक़सान करेंगे.

फ़िलहाल ये कहना मुश्किल है कि पूर्व क्रिकेट हीरो की तहरीके इन्साफ़पार्टी इस विशाल जनसमर्थन को चुनावों के दौरान निर्णायक राजनीतिक विजय में बदल सकती है या नहीं.

वैसे 2013 में होने वाले आम चुनाव अभी एक साल दूर हैं. यदि राष्ट्रपति ज़रदारी की चलती है तो वे आम चुनावों से पहले सीनेट के चुनाव मार्च 2012 में कराएँगे.

'बाज़ी मारनी है तो लंबा सफ़र तय करें'

रविवार को इमरान ख़ान की रैली चाहे निर्णायक शक्ति प्रदर्शन थी, लेकिन उसने तहरीके इन्साफ़में दरारे भी दिखाईं.

इमरान ख़ान ने घोषणा की कि देश बदलाव के दौर से गुज़र रहा है और लोक क्रांति की कगार पर है.

इमरान ख़ान संपन्न शहरी जनता के उस वर्ग को घरों से बाहर लाने में सफल रहे जो शासकों की कमियाँ बताने में तो मुखर होते हैं लेकिन रैलियों में भाग लेने से कतराते हैं और चुनावों के दौरान वोट देने भी कभी-कभी ही जाते हैं.

जो लोग वर्तमान राजनीतिक दलों से निराश हैं, वे पंजाब में नवाज़ शरीफ़ के भाई शाहबाज़ शरीफ़ के नेतृत्व में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के प्रदर्शन और केंद्र में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बुरे प्रशासन के कारण इमरान ख़ान की ओर आकर्षित हो रहे हैं.

वे पीपीपी और मुख्यधारा की अन्य पार्टियों को भ्रष्ट और अकुशल मानते हैं और इमरान ख़ान की ओर नई उम्मीद से देखते हैं.

'भाड़े की भीड़ नहीं'

इस तरह से इमरान ख़ान तीसरे विकल्प की तरह उभर कर सामने आ रहे हैं. लेकिन उनके आलोचक आरोप लगाते हैं कि शायद नवाज़ और जरदारी के विकल्प के तौर पर तहरीके इन्साफ़पार्टी को पाकिस्तान के शासक वर्ग का समर्थन प्राप्त है. इमरान इन आरोपों का पूरी तरह खंडन करते हैं.

इमरान ख़ान ने भीड़ जुटाने की क्षमता दिखाई है. जो युवा रविवार को उनकी रैली में शामिल हुए उन्हें किसी भी 'भाड़े की भीड़' की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है. इसके उलट पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ की शुक्रवार को हुई काफ़ी छोटी सी रैली में ऐसे लोगों की भरमार थी.

इस सब के बावजूद, यदि इमरान को अगले चुनावों में 'गेम चेंजर' यानी बाज़ी मारने वाले के रूप में उभरना है तो उन्हें काफ़ी लंबा रास्ता तय करना है. इमरान की रैली में लाहौर के कई वर्गों से लोग मौजूद थे लेकिन निमन मध्यवर्ग, ग़रीब शहरी और मज़दूर वर्ग से कुछ लोग ही उसमें शामिल हुए. यही लोग पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) का राजनीतिक आधार या यूँ कहिए - रीढ़ की हड्डी - हैं.

इमरान ने अपने भाषण में स्पष्ट तौर पर देश को वर्तमान दलदल से बाहर निकालने की बारे में दूरदर्शिता व्यक्त नहीं की. पाकिस्तान जिन आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है उनके लिए वोटरों को लुभाने वाले 'क्विक-फ़िक्स' फ़ैसलों की जगह निर्भीक और कल्पनाशील फ़ैसलों की ज़रूरत है.

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Image caption रविवार को इमरान की रैली में पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ की शुक्रवार की रैली के मुकाबले में कहीं अधिक भीड़ आई

उनके भाषण से उनके भोलेपन का भी अहसास होता है. उन्होंने जो कहा उससे आभास होता है कि ऊर्जा के संकट को बांध बनाकर हल किया जा सकता है और आर्थिक संकट को केवल भ्रष्टाचार का सफ़ाया करने से हल किया जा सकता है. ये कहना तो आसान है लेकिन करना बहुत मुश्किल है.

इमरान इस क्षेत्र में अमरीकी नीति और 'आतंक के ख़िलाफ़ जंग' में पाकिस्तान की भूमिका के कड़े आलोचक हैं. उन्होंने लगातार ड्रोन हमलों का विरोध किया है और उनकी पार्टी ने इनमें पाकिस्तान की सरकार की कथित मिलीभगत की न केवल आलोचना की है बल्कि उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन और धरने आयोजित किए हैं.

ये सोचना मूर्खता होगी कि जब अमरीका के नेतृत्व वाली सेनाएँ अफ़ग़ानिस्तान से हट जाती हैं तो अपने मुस्लिम भाइयों के ख़िलाफ़ आत्मघाती हमले करने वाले लोग जो धर्म के आधार पर इस्लामी देश कायम करने की बात कर रहे हैं, वे ख़ुदबख़ुद शांतिपूर्ण नागरिक बन जाएँगे.

इमरान ख़ान ने राजनीतिक परिदृश्य में ख़ुद को तालिबान समर्थक रूझान रखने वाले नेता के तौर पर प्रस्तुत किया है. इस तरह से वे विचारधारा के तौर पर पीएमएल (नवाज़) और जमाते इस्लामी के क़रीब हैं. लेकिन विरोधाभास यह है कि पंजाब में वे शहरी इलाक़ों में समर्थन जुटाकर पीएमएल (नवाज़) को उसके गढ़ में चुनौती दे रहे हैं. उधर पीएमएल (नवाज़) ने कीचड़ उछालकर उनकी छवि को धूमिल करने का अभियान चलाया है.

इमरान में एक और कमी है - चुनाव जीतने लायक उम्मीदवारों की सूची और कारगर तरीके से काम करने वाला पार्टी संगठन. वे भीड़ लाने के लिए केवल लोगों में अपने व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण पर निर्भर कर रहे हैं. लेकिन आम चुनाव में अपने उम्मीदवारों को पर्याप्त वोट दिलाने के लिए ये काफ़ी नहीं होगा.

आदर्शवाद-यथार्थवाद का द्वंद्व

दुर्भाग्य की बात यह है कि संसदीय प्रणाली में चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार के जीत पाने की क्षमता चुनाव का एक अहम पहलू होता है. इमरान की रैली के दौरान स्टेज पर बैठे और राजनीतिक स्तर पर आधारहीन, अज्ञात लोगों की सूची से पता चलता है कि तहरीके इन्साफ़को अच्छे उम्मीदवारों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कितनी मेहनत करनी होगी.

इमरान का सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि वे 'मिस्टर क्लीन' यानी साफ़-सुथरी छवि वाले नेता हैं और वे केवल इसी तरह के उम्मीदवारों को टिकट देंगे. लेकिन कहीं भी चुनावी राजनीति को परखें तो इस बात को सही पाएँगे कि ये ज़रूरी नहीं कि चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले सभी उम्मीदवार 'दूध के धुले' ही हों.

इसलिए तहरीके इन्साफ़पार्टी को आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच किसी एक को या फिर इसके मिश्रण को चुनना होगा. यही ख़तरे की बात है. यदि इमरान सतर्क नहीं रहते और बहुत से 'आया राम - गया राम' की तरह के लोगों को पार्टी में ले आते हैं तो चुनाव के समय तक उनके समर्थकों की नज़र में उनका आकर्षण कम हो जाएगा.

इमरान ख़ान ने अब तक अपने संदेश के आसपास भीड़ को आकर्षित करने की इच्छाशक्ति और दृढ़ता दिखाई है. क्या वो वास्तव में तीसरे विकल्प के तौर पर उभर पाते हैं, वो इस बात पर निर्भर करेगा कि वे अगले कुछ महीनों में अपने राजनीतिक पत्ते किस तरह खेलते हैं.

अब तक उनके बारे में केवल इतना कहा जाता था कि वे किसी का खेल बिगाड़ सकते हैं और दक्षिणपंथी वोट, विशेष तौर पर पीएमएल (नवाज़) के वोट में सेंध लगा सकते हैं. लेकिन ऐसा आकलन रविवार से पहले किया जाता था.

रविवार को लौहार में हुई ऐतिहासिक रैली ने राजनीतिक परिदृश्य को ख़ासा तबदील कर दिया है. अब तक पीपीपी केवल इमरान की लोकप्रियता और पीएमएल (नवाज़) की बढ़ती परेशानियों का मज़ाक उड़ा रही थी. लेकिन अब ये पीपीपी के लिए इमरान की बढ़ती लोकप्रियता चिंता का विषय है. इमरान अब केवल वोट काटने वाले नेता नहीं रहे, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में सामने आए हैं.

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