कांटों का ताज

शेरी रहमान इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption शेरी रहमान को ऐसे समय में ज़िम्मेदारी सौंपी गई है जब अमरीका पाकिस्तान के रिश्तों में भारी तनाव है

अमरीका में पाकिस्तान की नई राजदूत शेरी रहमान को आभास है कि उन्हें कितनी कठिन चुनौती से दो-चार होना है. इसे पाकिस्तान में सबसे मुश्किल काम माना जाता है.

हुसैन हक़्क़ानी के इस्तीफ़े के पेंच और भ्रम इस बात का प्रबल उदाहरण है कि कैसे वॉशिंगटन में हर पाकिस्तानी राजदूत का स्वागत साज़िशों के मकड़जाल से होता है.

जब से पाकिस्तान अमरीका के कट्टरपंथ के विरुद्ध लड़ाई में प्रमुख भागीदार बना है तब से ये काम बेहद पेचीदा हो गया है.

कौन हैं शेरी रहमान?

शेरी रहमान का सामना शक्की और चिड़चिड़े अमरीकी प्रशासन से होने वाला है जो पाकिस्तान की सरज़मीं से चलाए जा रहे कट्टरपंथी मंसूबो को रोक पाने में असफल प्रशासन के प्रति लगातार धैर्य खोता जा रहा है.

साथ ही उन्हें पाकिस्तान में सैनिक और सिविलियन प्रशासन के बीच अनवरत खौलते तनाव के बारे में भी फूंक-फूंक कर क़दम रखने होंगे.

इस समय बहुत कम लोग यक़ीन के साथ ये कह पाएंगे कि इनमें से कौन-सी चुनौती अधिक मुश्किल होने वाली है.

कठिन डगर

उनके पूर्ववर्ती को काफ़ी तेज़-तर्रार माना जाता था.

हुसैन हक़्क़ानी की असाधारण क्षमता और सलाह बेनज़ीर भुट्टो और उससे पहले उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नवाज़ शरीफ़ के लिए बहुमूल्य रही है.

जब बेनज़ीर की हत्या के बाद पाकिस्तान पीपल्स पार्टी सत्ता में आई तो हक़्क़ानी अमरीका में पाकिस्तान राजूदत बनने के प्रबल दावेदार के रूप में उभरे थे.

उनकी प्रमुख ज़िम्मेदारी अमरीकी प्रशासन को पाकिस्तान की सिविल सरकार के साथ काम करने के लिए तैयार करने की थी.

लेकिन जैसा कि बाद में साबित हुआ, ये एक विस्फोटक स्थिति थी.

अमरीका ने जनरल मुशर्रफ़ के साथ गठबंधन कर आंतकवाद के ख़िलाफ़ जंग के शुरूआत की थी. मुशर्रफ़ के सत्ता से हटते समय पाकिस्तान के तालिबान या अल-क़ायदा के विरुद्ध कार्रवाई ढीली पड़ रही थी. अमरीकी प्रशासन में इस बात पर चिंताएं बढ़ रही थीं कि कहीं पाकिस्तान उनके साथ ‘डबल गेम’ तो नहीं खेल रहा.

और जैसे-जैसे पाकिस्तान की दोहरी चाल के सूबत बढ़ते गए, हक़्क़ानी के लिए अपने देश की नीतियों का बचाव और सेना तथा सिविल सरकार के आतंकवाद के ख़िलाफ़ कथित जंग में अलग-अलग मतों का बचाव करना लगातार मुश्किल होता गया.

हालात इतने गंभीर हो गए थे कि कुछ वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी पत्रकारों को दबी ज़ुबान बता रहे थे कि उन्हें नहीं मालूम कि वॉशिंगटन में पाकिस्तानी हितों को अधिक नुकसान विरोधियों से हो रहा है या अपने राजदूत से.

जिस विवादास्पद मेमो की वजह से हक़्क़ानी को इस्तीफ़ा देना पड़ा है, उसका सच शायद कभी सामने ना आए.

पाकिस्तान में वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों ने बीबीसी उर्दू को बताया है कि उन्होंने मेमो मामले की जांच कर ली है. अधिकारियों को यक़ीन है कि ये मेमो राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से था लेकिन ये साफ़ नहीं है कि इसमें राष्ट्रपति ज़रदारी और राजदूत हक़्क़ानी की कितनी भूमिका थी.

अधिकारियों ने ये भी बताया कि हक़्क़ानी ने सैनिक नेतृत्व के दबाव में इस्तीफ़ा नहीं दिया. उनका कहना है कि इस्तीफ़ा पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के दबाव में लिया गया है क्योंकि वहां कुछ अधिकारी मानते थे कि हक़्क़ानी उनकी अवहेलना करते थे.

रहमान की चुनौतियां

इमेज कॉपीरइट AFP Getty
Image caption शेरी रहमान को कूटनीतिक चतुराइयों का कोई अनुभव नहीं है

जो भी हो, लेकिन पाकिस्तान में मेमोगेट के नाम से जाने जा रहे इस स्कैंडल पर अधिकारियों की ध्यानपूर्वक दी टिप्पणियां किसी सवाल का जवाब नहीं देतीं.

ज़रदारी जैसे सावधान रहने वाले राष्ट्रपति इस तरह से विवादास्पद ढंग से काम क्यों करेंगे, वो भी जानते हुए कि इससे उनकी कुर्सी ख़तरे में पड़ सकती है? ख़ासकर तब जब ऐसे क़दम से उन्हें कोई लाभ तो नहीं होगा लेकिन मुसीबत ज़रुर बढ़ेगी.

जब सैनिक नेतृत्व पर ऐबटाबाद में ओसाम बिन लादेन के पाए जाने के बाद पड़े तीव्र दबाव को झेल रहा हो, तब ज़रदारी को सेना द्वारा तख़्ता पलटने का डर क्यों सताएगा? विशेषकर तब जब वे इकलौते सियासतदान हैं जो सेना का इस मामले में खुलकर समर्थन कर रहे हैं.

इन सवालों के जवाब शायद कभी ना मिल पाएं.

लेकिन जो चीज़ दिखाई दे रही है वो ये है कि सेना हक़्क़ानी को हटने से इतनी नाखुश भी नहीं होगी. वो भी ऐसे समय में जब अमरीकी अधिकारी पाकिस्तान की तालिबान के मुद्दे पर कथित दोहरी नीति पर लगातार आपत्तियां जताते जा रहे हैं.

शेरी रहमान की चुनौती अमरीकियों को सिविलियन सरकार के साथ काम करते रहने के प्रति यक़ीन दिलाने की है. लेकिन साथ ही उन्हें तालिबान के प्रति नीति पर सेना और सिविल सरकार के बीच कोई साफ़ विभाजक रेखा ना होने का भी आभास देना होगा.

लेकिन हक़्क़ानी से विपरीत शेरी रहमान को ना तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की नाज़ुक कला का कोई अनुभव है और ना ही एक राजनीतिक दल की वफ़ादार कार्यकर्ता होने के नाते सेना का खुला समर्थन है.

लेकिन उनके पास एक विचारधारा के प्रति वफ़ादारी है क्योंकि उन्होंने कभी अपनी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा और ना ही अपने विचारधारा को त्यागा.

लेकिन सबसे अहम ये है कि चाहे पाकिस्तान सेना हो या सिविल नेतृत्व या अमरीकी प्रशासन, शेरी रहमान के साथ काम करते वक़्त उन्हें ये यक़ीन होगा कि वो ऐसे व्यक्ति के साथ काम कर रहे हैं जो सीधे-सीधे बात करने पर विश्वास रखता है.

वो किसी नौकरशाह की तरह दोहरी चाल की कला में माहिर नहीं हैं.

संबंधित समाचार