अटकलों के बीच लोकतंत्र के पक्ष में प्रस्ताव

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Image caption प्रधानमंत्री गिलानी ने शुक्रवार को सत्तारूढ़ गठबंधन के सभी दलों के साथ एक अहम बैठक की थी

पाकिस्तान में सरकार, सेना और न्यायपालिका के बीच चल रहे तनाव के बीच सरकार ने संसद में एक प्रस्ताव पेश किया है और सदस्यों से कहा गया है कि वे लोकतंत्र और तानाशाही में से एक का चुनाव करें.

आवामी नेशनल पार्टी के प्रमुख असफ़ंदयार वली ने शुक्रवार को लोकतंत्र के समर्थन में एक प्रस्ताव संसद में पेश किया.

संसद के निचले सदन राष्ट्रीय असेंबली में उन्होंने प्रस्ताव पेश करते कहा कि देश में सभी संस्थानों को संविधान की ओर से दी गई सीमा में रहते हुए काम करना चाहिए.

उन्होंने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि संसद एक बार फिर कहती है कि देश की संप्रभुत्ता जनता से है और जनता ने ही इस संसद को चुना है.

इस प्रस्ताव पर सोमवार को मतदान होना है. हालांकि प्रधानमंत्री गिलानी ने कहा है कि ये उनकी सरकार के पक्ष में विश्वास मत नहीं है क्योंकि उनके पास बहुमत है और उन्हें विश्वास मत हासिल करने की ज़रुरत नहीं है.

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में मेमो विवाद के बाद से सरकार और सेना के बीच तनाव चल रहा है. इस तनाव में एक ओर प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने सेना अध्यक्ष जनरल कयानी और आईएसआई प्रमुख पाशा की ओर से बयान दिए जाने को ग़ैर क़ानूनी ठहरा दिया तो दूसरी ओर सेना ने प्रधानमंत्री को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे डाली.

इस बीच देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रधानमंत्री गिलानी की ईमानदारी पर सवाल उठाते हुए उनसे राजनीतिज्ञों के भ्रष्टाचार के मामलों पर कार्रवाई शुरु करने को कहा है.

'संविधान संशोधन करें'

प्रस्ताव में कहा गया है कि लोकतंत्र के सशक्तिकरण के लिए राजनीतिक नेतृत्व ने जो प्रयास किए हैं, संसद उसका समर्थन करती है.

प्रस्ताव की प्रतियाँ विपक्ष को दी गई हैं ताकि वह इस पर विचार विमर्श करे.

असफ़ंदयार वली ने कहा, "हम बहुमत में हैं इसके बावजूद भी विपक्ष की राय को दबाना नहीं चाहते, इसलिए हमने इस पर मतदान सोमवार को करने का फ़ैसला लिया है."

उससे पहले उन्होंने संसद को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार के कार्यकाल में कमी का अधिकार केवल संसद को ही है किसी दूसरे संस्थान को नहीं.

उन्होंने विपक्षी दलों से कहा, “मैं विपक्षी दलों को न्योता देता हूँ कि आएँ और ऐसा संविधान बनाएं जिसकी व्याख्या दूसरों को न करनी पड़े. अगर आप सरकार के कार्यकाल को पाँच सालों तक बर्दाश्त नहीं कर सकते तो संविधान में संशोधन करें.”

प्रधानमंत्री ने कहा है कि उन्हें विश्वासमत की ज़रुरत नहीं है क्योंकि उन्हें संसद ने सर्वसम्मति से चुना है.

ग़ौरतलब है कि इन दिनों पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार और सेना के बीच कथित मेमो विवाद को लेकर तनाव चल रहे हैं और दोनों पक्ष एक दूसरे के ख़िलाफ़ बयान दे रहे हैं.

तनाव का माहौल

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Image caption कथित मेमो विवाद के बाद गिलानी सरकार के सेना के साथ संबंधों में काफ़ी तनाव चल रहा है

ताज़ा संकट उस समय शुरु हुआ जब सेना ने बुधवार को एक बयान जारी कर प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी के उस इंटरव्यू पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, जिसमें प्रधानमंत्री ने मेमो विवाद के मामले में सेनाध्यक्ष और आईएसआई के प्रमुख की ओर से जवाब पेश करने को ग़ैरक़ानूनी बताया था.

बुधवार को सेना ने कहा था कि प्रधानमंत्री ने सेनाध्यक्ष और आईएसआई के प्रमुख पर गंभीर आरोप लगाए हैं और चेतावनी दी थी कि इस तरह के आरोपों से देश को गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है.

उसके कुछ घंटों बाद प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने पद का दुरुपयोग करने के आरोप में केंद्रीय रक्षा सचिव लेफ्टीनेंट जनरल (रिटायर्ड) नईम ख़ालिद लोधी को उनके पद हटा दिया था.

उन पर आरोप थे कि उन्होंने अपने पद पर रहते हुए कुछ ऐसे क़दम उठाए जिससे सरकारी विभागों के बीच ग़लतफहमियाँ पैदा हुईं.

इस तनाव के बीच राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी गुरुवार को एक दिन के लिए दुबई गए तो कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं लेकिन वे शुक्रवार को वापस लौट आए हैं.

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