'विजिल आंटी' ने छेड़ी पाकिस्तानी मीडिया में नई बहस

maya_khan
Image caption विवादित कार्यक्रम की प्रस्तुतकर्ता को टीवी चैनल ने बर्ख़ास्त कर दिया

कराची में गुनगुनी धूप में एक पार्क के कोने में एक युवा जोड़ा कुछ एकांत क्षणों का आनंद ले रहा है. ज़ाहिर है वो एक-दूसरे के बेहद क़रीब हैं.

तभी एक महिला बड़ी तेज़ी से उनकी ओर आती है और बहुत ही रूख़े और सख़्त अंदाज़ में उनके संबंधों के बारे में सवाल करती है- ‘क्या तुम्हारे रिश्ते के बारे में तुम्हारे मां-बाप को पता है?’

सवाल सुनकर युवा जोड़ा अवाक् रह जाता है.

यह महिला कोई और नहीं बल्कि माया ख़ान है जिनकी इस समय पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा चर्चा है. और ऊपर जिस घटना का ज़िक्र किया गया है वो 17 जनवरी को पाकिस्तान के एक टेलीविज़न पर एक घंटे के कार्यक्रम के दौरान प्रसारित किया गया था.

उस एक घंटे के कार्यक्रम में माया ख़ान और उनकी तरह की कुछ और महिलाएं अनौपचारिक नैतिक पुलिस बल की तरह इन्हीं सवालों के साथ युवा जोड़ों पर टूट पड़ीं. इन महिलाओं को लोगों ने ‘विजिल आंटी’ का नाम दे दिया.

प्रतिक्रिया

पाकिस्तान एक रूढ़िवादी देश है, लेकिन इस कार्यक्रम के प्रसारित होने के बाद कई उदारवादी अभिजात्य लोगों ने इस कार्यक्रम के ख़िलाफ़ सोशल वेबसाइटों के ज़रिए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की. पाकिस्तान की अंग्रेज़ी मीडिया ने भी इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाया.

साथ बैठकर बातचीत करते इन युवा जोड़ों के साथ इन महिलाओं ने जो व्यवहार किया वह बहुत ही बुरा था.

इस कृत्य के लिए हालांकि माया ख़ान ने दो बार माफ़ी मांगी. लेकिन इस कार्यक्रम को प्रसारित करने वाले टेलीविज़न चैनल के सीईओ ने एक पत्र लिखकर सूचना दी कि यह माफ़ी पर्याप्त नहीं थी और माया ख़ान को नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया गया है.

घटना के बाद

ये मामला तो रफ़ा दफ़ा हो गया, लेकिन सवाल ये है कि पाकिस्तानी समाज के बारे में इस घटना के बाद क्या संदेश जाता है?

मैं राजधानी इस्लामाबाद में एक पार्क में गया और लोगों से पूछा कि लोग सार्वजनिक जगहों पर जाने पर कैसा महसूस कर रहे हैं.

लोगों से बातचीत में यही पता लगा कि माया ख़ान की माफ़ी उसकी नौकरी बचाने के लिए पर्याप्त नहीं थी.

कुछ लोगों का कहना था कि किसी लड़की के साथ सार्वजनिक जगह पर जाना बहुत मुश्किल हो गया है. और यदि लड़की का हाथ पकड़ लीजिए, फ़िर तो लोग आपको ग़लत ढंग से ही लेंगे.

पार्क में एक व्यक्ति ने कहा, ‘मैं बेहद धार्मिक व्यक्ति हूं. फिर भी मेरे जीन्स पहनने की वजह से लोग मुझे अजीब तरीक़े से देखते हैं और उन लोगों की निग़ाह में मैं एक अच्छा मुसलमान या अच्छा व्यक्ति नहीं समझा जाता हूं.’

वहीं एक युवा महिला का कहना था, ‘मैंने भी माया ख़ान की करतूतों के बारे में सुना है. लेकिन मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लोग क्या सोचते हैं. मैं अपने पति का हाथ पकड़ूंगी. मुझे इससे कोई हैरानी नहीं होगी कि और लोग ऐसा नहीं कर रहे हैं.’

महिला के पति का कहना था, ‘यहां कुछ ऐसी जगहें हैं जहां हम अपनी चाहत का प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन ऐसी भी बहुत सी जगहें हैं जहां यह करना बेहद मुश्किल है.’

वैसे पाकिस्तान में दोस्ती का प्रदर्शन करते लोग अक्सर दिख जाते हैं, लेकिन आदमी और औरत नहीं. बल्कि दो पुरुष एक-दूसरे का हाथ पकड़े या फिर एक-दूसरे की उंगली पकड़े दिख जाते हैं, ख़ासकर निम्न तबके से आने वाले लोग.

दोस्ती का यह प्रदर्शन वैसा नहीं है जैसा कि समलैंगिक लोग करते हैं. समलैंगिकता तो पाकिस्तान में प्रतिबंधित है, बल्कि यह तो भाईचारे का प्रतीक है.

दरअसल, पाकिस्तान में युवाओं के सामने समस्या यह है कि वहां मनोरंजन वाली जगहें बहुत कम हैं और हर व्यक्ति मंहगे रेस्टोरेंटों में जा नहीं सकता है.

विवाद

हाल ही में पंजाब प्रांत की विधानसभा ने आपत्तिजनक संगीत समारोहों को प्रतिबंधित करने संबंधी एक प्रस्ताव पारित किया था.

क्या मर्यादित है और क्या मर्यादित नहीं है, ये गंभीर बहस का विषय है. लेकिन जो बात स्पष्ट है वो ये कि पाकिस्तान में कट्टरपंथियों और उदारवादियों के बीच लड़ाई तेज़ हो गई है.

युवाओं के लिए पार्क जैसी जगहें भले ही कम हो रही हों, लेकिन सोशल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है. युवा इनका बड़ी मात्रा में उपयोग कर रहा है और इसके ज़रिए एक दबाव समूह की शक्ति बढ़ रही है.

ट्विटर पर अब्दुल्ला साद नामक एक व्यक्ति की टिप्पणी थी, ‘ऑनलाइन सक्रियता वास्तविक सक्रियता की मदद कर सकती है, उसकी जगह नहीं ले सकती. लेकिन इसकी ताक़त को कम करके भी नहीं आंका जा सकता.’

मीडिया

इस घटना से पाकिस्तानी मीडिया की भी कलई खुल गई, जो कि समाज के तीसरे संतंभ के तौर पर पेश की जाती है और स्वतंत्र मानी जाती है.

सच्चाई यही है कि पाकिस्तानी मीडिया अभी भी अपनी जगह तलाश रहा है और उसके पास कोई आचार संहिता नहीं है.

हाल ही में मानवाधिकार कार्यकर्ता फ़रज़ाना बारी एक सरकारी टीवी चैनल पर पाकिस्तान की दंड संहिता के अनुच्छेद 14 का ज़िक्र कर रही थीं जिसके तहत कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक तौर पर उसकी बेइज़्ज़ती करने वाले के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई कर सकता है.

लेकिन पाकिस्तान में क़ानूनी प्रक्रिया बहुत मंहगी है और इसीलिए लोग जल्दी क़ानूनी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते.

ऐसे में निजी टेलीविज़न की इन मामलों में उपयोगिता काफ़ी बढ़ी है.

कुछ जानकारों का कहना है कि ऐसी स्थिति में इस तरह के कार्यक्रम ज़रूरी हो जाते हैं.

जबकि कुछ अन्य लोगों का कहना है कि माया ख़ान उसी दकियानूसी मानसिकता का प्रतीक है जो लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार करती है.

संबंधित समाचार