हाफ़िज़ सईद से मुलाक़ात का मंज़र

हाफ़िज़ सईद
Image caption इस मुलाकात में केवल हाफ़िज़ सईद ही मुस्कुराकर मिले

एके 47 राइफ़ल लिए जवानों की सतर्क निगाहें लगातार मुझ पर बनी हुई थीं. कराची शहर के मध्य एक मदरसे के अंदर मैं ठीक उस शख़्स के सामने खड़ा था जिसे भारत एक ख़तरनाक आतंकवादी मानता है.

दरमियाने क़द और मौलानाओं जैसी दाढ़ी रखे जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद ने हौले से मुस्कराकर मेरा स्वागत किया और मुझे भीतर एक कमरे में ले गए. कमरे में तनाव था और वहाँ मौजूद हर व्यक्ति पूरी तरह सतर्क दिखने की कोशिश कर रहा था.

मैं एक ऐसे आदमी के साथ खड़ा था जिसे साल 2008 में मुंबई पर हुए हमले के लिए मुख्य तौर पर ज़िम्मेदार माना जाता है.

वो लश्करे तैबा जैसे चरमपंथी संगठन के नेता रहे हैं. वही लश्करे तैबा जो भारत प्रशासित कश्मीर में "जेहाद" कर रही है और भारतीय सेना पर हमले करती है.

पहरे में मदरसा

कराची शहर के बीचों बीच यूनिवर्सिटी रोड पर जमात उद-दावा के बड़े बड़े बैनर लगे हैं और वहीं उनका मदरसा है.

मुझे इस मदरसे से आधे किलोमीटर दूर रुककर इंतज़ार करने को कहा गया. कुछ देर में एक आदमी हमारे पास आया और हमारी गाड़ी में बैठ गया. उसके साथी दूसरी गाड़ी में हमारे पीछे-पीछे आए.

मदरसे पहुँचते ही मैंने अपना माईक निकाल लिया ताकि बीबीसी रेडियो के लिए कुछ रिकॉर्ड कर लूँ. लेकिन मेरे साथ चल रहे लोगों ने मुझे इसकी इजाज़त नहीं दी. मेरे साथ आए कैमरामेन को भी रिकॉर्ड या शूट करने की अनुमति नहीं दी गई.

मदरसे के बाहर जमात-उल-दावा के झंडे और बैनर लगे हुए थे. आक्रामक से दिखने वाले चार हथियारबंद जवान मदरसे के मुख्य द्वार पर मुस्तैदी से पहरा दे रहे थे.

हमारी पूरी तलाशी ली गई.

मदरसे में पढ़ने वाले छात्रों की छुट्टी हुई थी और वो सभी अपनी उम्र के लिहाज़ से काफ़ी गंभीर दिख रहे थे.

अकेली मुस्कान

Image caption हफीज़ सईद ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि मुंबई हमलों में उनके संगठन का कोई हाथ नहीं है.

हम मदरसे की इमारत का पूरा चक्कर काटकर बड़े रसोईघर से होते हुए इमारत के पिछले हिस्से में पहुँचे. वहीं हथियारबंद लोगों की सुरक्षा में एक व्यक्ति कुर्सी पर बैठा हुआ नज़र आया.

करीब पहुँच कर पता चला कि वह हाफिज़ सईद हैं. जब मैं वहाँ पहुँचा तो उन्होंने ऊँची आवाज़ में सलाम-आलैकुम कहा और मुस्कराते हुए मेरा स्वागत किया.

मुझे बहुत अच्छा लगा और कुछ डर भी कम हुआ क्योंकि हाफ़िज़ सईद के अलावा वहां कोई व्यक्ति मुझसे मुस्करा कर नहीं मिला.

हम कमरे के अंदर दाख़िल हुए तो तीन चार हथियारबंद भी अंदर आ गए.

एक ख़ौफ़ मेरे भीतर भी था जो हथियारबंद लोगों को देखकर और गहरा गया. आख़िर मैं एक ऐसे संगठन के रहमो करम पर था जिसका नाम सुनकर पाकिस्तान के भीतर ही नहीं बल्कि बाहर के भी लोग ख़ामोश हो जाया करते हैं.

सवाल पूछने में भी मैं काफ़ी सावधान था क्योंकि हफ़ीज़ सईद को नाराज़ करने का जोखिम कोई नहीं उठा सकता.

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