पाक में हिंदी साहित्य का बोलबाला

किशवर नहीद
Image caption किशवर के मुताबिक हिंदी सहित भारत के सभी भाषाओं का साहित्य पाकिस्तान में पढ़ा जाता है.

पाकिस्तान में हिंदी भाषा के जानकार दूर-दूर तक नहीं मिलेंगे लेकिन अनुवादित हिंदी और भारत की अन्य भाषाओं के साहित्यिक पुस्तकों और मासिक पत्रिकाओं को पढ़ने वाले कई मिल जाएँगे.

पाकिस्तान में हिंदी उपन्यास, लघु-कहानियों, कविताओं और आत्मकथा का उर्दू भाषा में अनुवाद किया जाता है. भारतीय लेखक और साहित्यकार निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, प्रेमचंद, रमेश बख्शी, कमलेश्वर और गीतांजलीश्री काफ़ी लोकप्रिय हैं.

पिछले सप्ताह कराची में साहित्य महोत्सव का आयोजन किया गया था, जिसमें हिंदी, भाषा के तौर पर तो शामिल नहीं हुई लेकिन हिंदी के साहित्यकारों और लेखकों की ख़ूब चर्चा हुई. किसी ने प्रेमचंद की बात तो कोई तुल्सीदास को अच्छे शब्दों में याद कर रहा था.

पाकिस्तान की जानी मानी शायरा किशवर नाहीद कहती हैं कि हिंदी साहित्य को पढ़ने वालों की कोई कमी नहीं है और हिंदी के उपन्यास, लघु-कहानियाँ, कविता और आत्मकथा बड़े शौक से पढ़े जाते हैं.

उन्होंने बताया कि हिंदी के साथ भारत की अन्य भाषाओं कन्नड, उड़िया, मल्यालम और मराठी का अनुवादित साहित्य भी पाकिस्तान में बहुत पढ़ा जाता है.

'बिग फोर्स'

किशवर नाहीद को भारत के जाने माने कवि नारायण बहुत पंसद हैं और उन्होंने अमृता प्रीतम और अजीत कौर की भी प्रशंसा की.

उन्होंने भारत और पाकिस्तान के साहित्य में अंतर बताते हुए कहा कि पाकिस्तान के साहित्य में सैन्य शासन, आतंकवाद और तालेबान जैसे मुद्दों का ज़िक्र होता है जबकि भारत के साहित्य में वहाँ के सामाजिक मसलों पर लिखा जाता है.

पाकिस्तान के जाने-माने उपन्यासकार इंतेज़ार हुसैन ने कराची साहित्य महोत्सव के एक सत्र में इस क्षेत्र के सभ्यता पर चर्चा की और बताया कि किस तरह हिंदी और उर्दू का आपस में संबंध है.

विभाजन से पहले उर्दू और हिंदी के साहित्य पर बात करते हुए उन्होंने हिंदी भाषा के साहित्यकारों को ‘बिस फ़ोर्स’ कहा था और बताया कि इन्हीं के छाया में उन्होंने लिखना शुरु किया था.

उन्होंने बताया कि आज भी पाकिस्तान में हिंदी का अनूवादित साहित्य काफ़ी मशहूर है और इसके पढ़ने वालों में कोई कमी नहीं आई है.

'उर्दू-हिंदी संबंध'

उर्दू भाषा के प्रसिद्ध लेखक मोहम्मद वसीम अंजुम ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा कि हिंदी और उर्दू का बहुत पुराना संबंध हैं और दोनों भाषाएँ एक क्षेत्र और इलाक़े से जुड़ी हुई हैं.

उन्होंने बताया कि दोनों भाषाएँ एक ही हैं और बोलचाल में कोई अंतर नहीं है, अगर अंतर है तो वह है लिपि में और हिंदी में संस्कृत और प्राकृत के शब्द हैं जबकि उर्दू में अरबी और फ़ारसी के शब्द शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि जब से भारतीय मनोरंजन के चैनलों का प्रभाव हुआ तब से पाकिस्तान के बच्चे हिंदी शब्दों को इस्तेमाल करने लगे हैं और इसे पता चलता है कि दोनों भाषाओं का आपस में कितना संबंध है.

मोहम्मद वसीम अंजुम के मुताबिक़ पाकिस्तान में उर्दू साहित्य तो काफ़ी विकास कर रहा है लेकिन अनूवादित हिंदी साहित्य में रुचि बढ़ रही है और कुछ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी हिंदी साहित्यकारों को शामलि किया गया है.

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