'फिरौती और डकैती' से पैसे बना रहा है तालिबान

तालिबान, कराची
Image caption तालिबान के कराची यूनिट ने एक आत्मघाती हमलावर का एक वीडियो जारी किया था.

पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची में पुलिस का कहना है कि तालिबान बैंक डकैती, अवैध वसूली और फिरौती के जरिए करोड़ों रुपए बना रहें हैं.

पुलिस के मुताबिक लोगों को अगवा करने में तालिबान को सबसे ज्यादा फायदा होता है क्योंकि फिरौती की रकम कभी-कभी तो लाखों डॉलर होती है.

बीबीसी संवाददाता ऑर्ला ग्युरिन के मुताबिक तालिबान पाकिस्तान की वित्तिय राजधानी में धीरे-धीरे अपनी पकड़ बना रहा है.

जैसे ही शाम ढलती हैं और अंधेरा होने लगता है पुलिस तालिबान की तलाश में निकल पड़ती है.

पुलिस का आतंकवाद-निरोधी एक दस्ता तालिबान के गढ़ समझे जाने वाले कराची के गदप इलाके में धावा बोलता है.

पुलिस के इस अभियान की अगुवाई कर रहें हैं मोहम्मदग असलम खान.

पिछले साल यानी 2011 के सितंबर में तालिबान ने असलम खान के घर पर लगभग 500 किलोग्राम के एक बम के साथ हमला किया था.

उस हमले में असलम खान के परिवार के लोग तो बच गए लेकिन आठ दूसरे लोग मारे गए.

लेकिन उससे हताश हुए बगैर असलम खान कहते हैं कि वो आखिरी सांस तक चरमपंथियों से लड़ते रहेंगे.

'डरेंगे नहीं'

असलम खान कहते हैं, ''हम अपने मुल्क के लिए कभी भी अपनी जान दे सकते हैं. लिहाजा हम इनसे डरेंगें नहीं बल्कि ये हमसे डरेंगें.''

कराची शहर के एक बाहरी इलाकें में तालिबान बड़ी आसानी के साथ आते जाते हैं लेकिन फिर भी उनसे मिलना इतना आसान नहीं.

बीबीसी संवाददाता ऑर्ला गयुरिन अपने एक भरोसेमंद संपर्क के ज़रिए एक तालिबान से मिलने में सफल होती है.

यूनुस कोडनेम के ये तालिब पहले अफगानिस्तान में लड़ चुके हैं लेकिन अब वो तालिबान के वित्त विभाग के लिए काम करते हैं.

तालिबान को मिल रही आर्थिक मदद के बारे में यूनुस कहते हैं, ''कराची में कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्र और बड़े-बड़े उद्योगपतियों से हमें मदद मिलती है. कराची में एक महीने में हमलोग लगभग 60-70 लाख रुपए जमा कर लेतें हैं. उन रुपयों को बीमार या घायलों के इलाज और दूसरी जरूरतों के लिए खर्च किया जाता है.''

यूनुस ने इस बात से इनकार किया कि तालिबान लोगों को अगवा कर उनसे फिरौती की रकम वसूलती है.

इलजाम

ये पूछे जाने पर यूनुस कहते हैं, ''पुलिस तो हम पर इलज़ाम लगाती रहती है. हमने किसी को अगवा नहीं किया है. जो भी हमें देता है खुशी से देता है. हमने चंदा के लिए कभी किसी को आंख भी नहीं दिखाई है.''

लेकिन इलाके के स्थानीय लोगों का कहना कुछ और है. उनके मुताबिक जब तालिबान आपसे पैसे मांगते हैं तो आप ना नहीं कह सकते.

और यूनुस के इनकार के बावजूद तालिबान के लोगों को अगवा करने की कई सबूत मिलें हैं.

अभी हाल ही में तालिबान ने एक डॉक्टर को अगवा किया था.

तालिबान ने उन्हें एक खुफिया ठिकाने पर एक सप्ताह तक बंदी बना कर रखा था तभी पुलिस ने वहां धावा बोल दिया.

सुरक्षा कारणों से डॉक्टर साहब की पहचान सार्वजनिक नहीं कर रहें हैं.

भाग्यशाली डॉक्टर

तालिबान से छूटने के बाद डॉक्टर साहब ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, ''वे छह दिन तो मेरे लिए 60 हजार साल के बराबर थे. सुबह से शाम करना मुश्किल था. जब पुलिस की रेड शुरू हुई तो तालिबान ने मुझे मारने का फैसला कर लिया था लेकिन मैं किसी तरह बच गया. सबसे ज्यादा चिंता की बात ये थी कि मेरे परिवार के लोग दरवाजे पर नजरें टिकाए मेरे आने का इंतजार कर रहे थे.''

डॉक्टर साहब तो तालिबान के कब्ज़े से सही सलामत निकलने में कामयाब हो गए. लेकिन कई दूसरे ऐसे हैं जो उतने भाग्यशाली नहीं थे.

पुलिस का कहना है कि जब अगवा किए लोगों के घर वाले पैसे नहीं चुकाते तो तालिबान अपहृत व्यक्ति को मार देते हैं.

पुलिस उपाधीक्षक जहांगीर खान के मुताबिक चरमपंथी बहुत क्रूर हैं और संगठित हैं.

जहांगीर खान कहते हैं, ''तालिबान पूरी तैयारी करके बंदों को उठाते हैं. उनको पता होता है कि उनके शिकार कहां से आते हैं. उन्हें किस समय उठाना ज्यादा आसान होगा. कब पुलिस आस-पास मौजूद नहीं होगी. तालिबान खुद को जहां ज्यादा सुरक्षित समझते हैं वहीं से लोगों को अगवा करते हैं.''

तालिबान से रिहा होने के बाद डॉक्टर साहब दोबारा अपने काम में लग गए हैं. लेकिन अब वो अपनी दिनचर्या में थोड़ा बदलाव करते हैं ताकि उनके आने-जाने का कार्यक्रम तयशुदा ना हो. वो जानते हैं कि तालिबान उन्हें अगवा करने की कोशिश दोबारा भी कर सकते हैं.

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