नवाज शरीफ: सियाचिन पर पाक करे पहल

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Image caption 135 के करीब पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को निकालने के लिए बचाव कार्य जारी है.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के प्रमुख नवाज शरीफ ने कहा है कि सियाचिन मुद्दे को हल करने के लिए पाकिस्तान को पहल करनी चाहिए.

उन्होंने मंगलवार को गिलगित बल्तिस्तान की सियाचिन घाटी का दौरा किया जहाँ सात अप्रैल को सियाचिन ग्लेशियर के पास आए हिमस्खलन के कारण एक सैन्य अड्डा चपेट में आ गया था.

इस हिमस्खलन में डबे 124 पाकिस्तानी सैनिकों और 11 नागरिकों को निकालने का काम जारी है. ये सैनिक नॉर्दन लाइट इंफेन्ट्री रेजीमेंट के थे जिन्हें पहाड़ों पर अभियान में ट्रेनिंग दी जाती है.

नवाज शरीफ ने हैलिकॉप्टर के लिए जरिए उस घटनास्थल का दौरा किया क्योंकि खराब मौसम के कारण उन्हें वहाँ न उतरने की सलाह दी गई थी.

बाद में उन्होंने पत्रकारों से बातचीत करते हुए सियाचिन में सेना का बचाव कार्य की प्रशंसा की और सेना को बताया कि भारत के साथ सियाचिन के मुद्दे के हल का अब समय आ गया है.

उन्होंने कहा, “मेरा विचार है कि पाकिस्तानी सरकार को पहल कर देनी चाहिए. भारत की ओर से पहल का इंतजार नहीं करना चाहिए और इसमें कोई नीची दिखने वाली बात नहीं है.”

'मौसम के साथ युद्ध'

उन्होंने सियाचिन को विवादास्पद मोर्चे को दुश्मन के बजाए मौसम के साथ युद्ध करार दिया.

नवाज शरीफ ने कहा, “यहाँ क्या हो रहा है? हम मौसम के साथ एक तरह की जंग कर रहे हैं. काफी ठंड है. इसमें घायल हो जाते हैं और लोग शहीद हो जाते हैं.”

उन्होंने कहा कि दुनिया की कौन सी सेनाएँ पहाड़ों की चोटियों पर रहती हैं. सरकारों को कर्तव्य है कि यह मुद्दा सुलझना चाहिए क्योंकि व्यापार से ज़्यादा यह अहम है.

उन्होंने भारत और पाकिस्तान से मांग की है कि दोनों देश सियाचिन से अपनी सेनाओं को वापस बुलाएँ.

कश्मीर के इस इलाके में हिमस्खलन आते रहे हैं. पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने बताया है कि आमतौर पर हिमस्खलन ज्यादा ऊँचाई वाले अड्डो पर आते रहे हैं जहाँ कम सैनिक रहते हैं.

साल 2010 में यहाँ आए हिमस्खलन में 24 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे. 1947 में बंटवारे के बाद कश्मीर भारत और पाकिस्तान में बट गया था.

सियाचिन ग्लेशियर को विश्व के सबसे ऊँचे जंग के मैदान के तौर पर जाना जाता है. यहाँ 22 हजार फीट की ऊंचाई पर भी सैनिक तैनात हैं.

लेकिन लड़ाई की बजाए खराब मौसम और ठंड के कारण ज्यादा सैनिक मारे जा चुके हैं.

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