पाकिस्तान पत्रकारों के लिए अब भी खतरनाक

पाकिस्तानी पत्रकार इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption पाकिस्तान में पत्रकार पिछले कई सालों से अपने अधिकारों और सुरक्षा के लिए संघर्ष भी कर रहे हैं.

बहाउद्दीन पेशे से पत्रकार हैं और उनका संबंध पाकिस्तान के अशांत कबायली इलाके बजौड़ एजेंसी से हैं. वे पिछले कुछ समय से पेशावर में रह रहे हैं.

वे एक स्थानीय समाचार पत्र और कुछ अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्थाओं के लिए खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत और कबायली इलाकों से रिपोर्टिंग करते रहते हैं.

कबायली इलाके बाजौड़ एजेंसी में पिछले कई सालों से सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच भीषण संघर्ष चल रहा है और उनके मुताबिक उन्हें स्वतंत्र रुप से काम करने नहीं दिया जा रहा.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा, “एक तो पत्रकारों को कबायली इलाकों में खबर मिलने में मुश्किलें होती हैं और हालत इस तरह है कि हर कोई अपनी मर्जी की खबर लगवाना चाहता है.”

वह कहते हैं कि कबायली इलाकों में जानकारी मिलना काफी मुश्किल होती है और अगर पत्रकार सूत्रों से खबर देता है तो उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ता है कि उन्होंने सही खबर नहीं दी है.

पाकिस्तान बना खतरनाक

उन्होंने कहा कि धमकियाँ देने वालों में चरमपंथी और खुफिया एजेंसियों के लोग होते हैं और कई बार जान से मारने की भी धमकियाँ मिलती हैं.

पाकिस्तान खास तौर पर कबायली इलाकों में बतौर पत्रकार काम करना काफी कठिन है और संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक संस्था यूनेस्को ने अपनी ताजा रिपोर्ट में पाकिस्तान को पत्रकारों के लिए खतरनाक देशों की सूची में दूसरे स्थान पर रखा है.

पाकिस्तान में सैन्य शासकों की सरकारें, बढ़ता चरमपंथ और आतंकवाद पत्रकारों के लिए कठिन परिस्थितियों में काम करने के कारण बने हैं.

पत्रकारों के अधिकारों के लिए काम करने वाली अतंरराष्ट्रीय संस्था के मुताबिक 1992 से अब तक पाकिस्तान में 42 पत्रकारों की हत्या हुई है, जिनमें ज्यादातर कबायली इलाकों के हैं.

इन हत्याओं के लिए चरमपंथियों और खुफिया एजेंसियों दोनों को जिम्मेदार माना जाता है लेकिन दोनों हमेशा से इस बात का खंडन करते रहते हैं.

'अपनी मर्जी की खबर'

पेशावर स्थित एक ओर पत्रकार इरफान अशरफ कबायली इलाकों में काम करने की मुश्किले बताते हैं, “कबायली इलाकों में ऐसे तत्व हैं जिनके पास ताकत और हथियार दोनों हैं, वे पत्रकारों को धमकियाँ देते रहते हैं और अपनी मर्जी की खबर प्रकाशित करवाना चाहते हैं.”

उनके मुताबिक धमकियों से तंग आ कर 40 प्रतिशत से अधिक पत्रकार अपने इलाके छोड़ कर दूसरे शहरों में काम करने पर मजबूर हुए हैं.

उन्होंने कहा, “पत्रकारों के लिए दो विकल्प हैं या तो वह सच लिखें और मौत का सामना करें या फिर दूसरी की मर्जी की खबर लिखे. ऐसी स्थिति में ठीक पत्रकारिता नहीं हो रही है.”

उन्होंने बताया कि कबायली इलाकों के पत्रकार आर्थिक रुप से काफी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं और समाचार संस्थाओं की ओर से उन्हें अच्छे पैसे नहीं दिए जा रहे हैं.

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पत्रकारों के लिए अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था के मुताबिक पिछले साल 14 पत्रकारों की हत्या हुई, जिसमें से ज्यादातर का संबंध खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत से है.

संबंधित समाचार