न्यायपालिका ने किया 'तख्ता पलट'

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Image caption पाकिस्तान में राजा परवेज़ अशरफ़ ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली .

पाकिस्तान में यूसुफ रज़ा गिलानी को प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य करार दिए जाने के बाद राजनीतिक उथल पुथल में तेजी आ गई.

आखिरकार राजा परवेज़ अशरफ़ को पाकिस्तान का नया प्रधानमंत्री चुन लिया गया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर आम और ख़ास लोगों के बीच बहस गर्म है.

पाकिस्तान की जानी मानी लेखिका और राजनीतिक विश्लेषक आयशा सिद्दीक़ा मानती है कि गिलानी का हटाया जाना न्यायपालिका की ओर से तख्तापलट करने जैसा है और इस पूरे घटनाक्रम में सेना का बड़ा हाथ है. बीबीसी संवाददाता इकबाल अहमद ने उनसे बात की.

गिलानी के हटाए जाने के मामले में न्यायपालिका की भूमिका पर आप क्या सोचती हैं?

कई लोग पाकिस्तान के ताजा घटनाक्रम पर खुश हैं कि न्यायपालिका ने बहुत अच्छा किया लेकिन कई लोग ये कह रहे हैं कि इस सरकार की अवधि खत्म होने ही वाली थी और इसके भविष्य का फैसला पाकिस्तान के अवाम को मिलना चाहिए था.

पाकिस्तान में जो कुछ हुआ है उसे ‘जूडिशियल कू’ या न्यायपालिका द्वारा तख्तापलट कहा जाना चाहिए. इसमें कोई शक नहीं है कि न्यायपालिका काफी सक्रिय है. कई बार ऐसा लगता है कि देश जज ही चला रहे हैं ना कि हुकूमत ख़ुद.

पर क्या इस स्थिति के लिए पाकिस्तान की सरकार ख़ुद जिम्मेदार है?

उस हद कि जिसतरह ये मामला लटकाया गया. पर बात फिर वही आती है कि जिस आधार पर युसुफ रजा गिलानी को हटाया गया ये कह कर कि उन्होंने अदालत के आदेश की अवमानना की है तो क्या और कोई विकल्प नहीं बाकी था.

अदालत ने इस बात को गंभीरता से लिया की गिलानी साहब ने आदेश का पालन नहीं किया लेकिन खुद चार सालों तक उन्होंने अपने मातहत काम कर रही 'अकाउंटबिलिटी' अदालत को ये हुक्म नहीं दिया कि वो सदर के खिलाफ मामलों को खोलें.

राष्ट्रपति को मिली 'इम्युनिटी' का मामला अभी भी साफ नहीं हुआ है. और कई बार ऐसा लग रहा है कि ये मामला दरअसल अदालत और सरकार के बीच का नहीं है बल्कि झगड़ा फौज और सरकार के बीच का है.

सेना की क्या भूमिका हो सकती है?

पाकिस्तान में अभी लोकतंत्र की नींव कमजोर है. इसका मतलब ये है कि बहुत सारे विभाग आपस में बैठकर खुल कर बाते करते हों ऐसा नहीं है. बहुत सारे फैसले परदे के पीछे लिए जाते है. सेना को इस सरकार से कई शिकायते थीं. जो खबरें मुझ तक पहुंच रही हैं वो ये है कि युसुफ रज़ा गिलानी से जनरल कियानी बहुत खुश नही थे और कहीं ये इरादा बन ही गया था कि गिलानी को निकालना है.

क्या नए प्रधानमंत्री के बनने के बाद चीजे स्थिर होंगी या ये मामला जारी रहेगा?

ये मामला बिल्कुल जारी रहेगा. क्योंकि सवाल तो ये भी पूछे जा रहे है कि नए प्रधानमंत्री के लिए परवेज़ अशरफ को ही क्यों चुना गया जब कि उनके खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामले हैं.

लोग पूछ रहे हैं कि किसी बेहतर शख्स को क्यों नहीं इस पद के चुना गया. तो बात ये है कि पीपुल्स पार्टी के पास बहुत विकल्प नहीं है. नए प्रधानमंत्री कितने दिनों तक बने रहेंगे, क्या चुनाव तय समय यानि अगले साल ही होंगे या उससे पहले होने की नौबत आ जाएगी, ये सबकुछ देखना होगा.

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