पाकिस्तान:स्कूली किताबों में नफरत फैलाने वाली सामग्री बढ़ी

 बुधवार, 5 सितंबर, 2012 को 20:27 IST तक के समाचार
पाकिस्तान में किताबों से नफरत

किताबों में 'नफरत फैलाने वाली सामग्री' पर पाकिस्तान में बहस होती रही है

पाकिस्तान के सरकारी और निजी स्कूलों में बच्चों को किताबों में ‘नफरत फैलाने वाली’ सामग्री में वृद्धि के आरोप लगे हैं.

एक गैर सरकारी संगठन नेशनल कमिशन फॉर जस्टिस एंड पीस (यानि राष्ट्रीय न्याय और शांति आयोग) की रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरी कक्षा के बच्चों के लिए जारी की गई नई किताबों में ऐसी नफरत फैलाने वाली सामग्री है.

इन किताबों में गैर मुस्लिम लोगों की तरफ इशारा करते हुए कहा गया है, “अन्य धर्मों के लोग अपने धार्मिक उत्सवों के दौरान ऐसे बेतुके अनुष्ठानों में शामिल होते हैं, जिनका अल्लाह से कोई नाता नहीं होता.”

आयोग ने किताबों में दी गई ऐसी कई बातों का जिक्र अपनी रिपोर्ट में किया है.

किताबों से फैलती नफरत

"आठवीं कक्षा के लिए तैयार इतिहास की किताब में लिखा है: हिंदुओं ने, अपनी आदत के अनुसार मुसलमानों को धोखा दिया है. इस तरह की सामग्री इतिहास को गलत तरीके से पेश करती है"

पीटर जैकब, रिपोर्ट के लेखक

‘शिक्षा या नफरत की जमीन तैयार करना’ नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बात इस्लामी अध्ययन जैसे विषय की हो या उर्दू, इतिहास या भूगोल जैसे अन्य विषयों की, नफरत फैलाने वाली पंक्तियां स्कूली किताबों में बढ़ती ही जा रही हैं.

संस्था के कार्यकारी निदेशक पीटर जेकब ने बीबीसी को बताया, "पिछले साल प्रकाशित किताबों में इस तरह की 44 लाइनें थी जबकि इस वर्ष के लिए जारी की गई किताबों में अन्य धर्मों और राष्ट्रीयता के लोगों के लिए बुरा भला कहने वाली 122 लाइनें हैं."

रिपोर्ट कहती है कि आयोग ने पंजाब और सिंध पाठ्यक्रम बोर्ड की ओर से जारी किताबों का ही विश्लेषण किया जो देश के 74 प्रतिशत छात्रों को पढ़ाई जाती हैं.

इस रिपोर्ट के लेखक पीटर जैकब कहते हैं, “आठवीं कक्षा के लिए तैयार इतिहास की किताब में लिखा है: हिंदुओं ने, अपनी आदत के अनुसार मुसलमानों को धोखा दिया है. इस तरह की सामग्री इतिहास को गलत तरीके से पेश करती है और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लोगों की नकारात्मक छवि पेश करती है.”

'मदरसों से भी ज्यादा खतरनाक'

पाकिस्तानी स्कूल

एक रिपोर्ट में स्कूली पाठ्यक्रम को मदरसों के पाठ्यक्रम से भी खतरनाक बताया गया.

हाल के दिनों में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले बढ़े हैं. पिछले महीने 20 शिया मुसलमानों को एक बस से निकाल कर गोली मार दी गई. पिछले महीने ही संभवतः मानसिक रूप से कमजोर एक बच्ची को ईशनिंदा के आरोप में उग्र भीड़ लगभग जिंदा जलाने ही वाली थी कि उसे पुलिस के हवाले किया गया.

ये पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान में स्कूली किताबों पर समाज में असहिष्णुता और चरमपंथ को बढ़ावा देने के आरोप लगे हैं. 2003 में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. एएच नय्यर के सहयोग से तैयार एक रिपोर्ट में स्कूली पाठ्यक्रमों को मदरसे के पाठ्यक्रम से भी ज्यादा खतरनाक बताया गया.

मौजूदा पाठ्यक्रम सैन्य शासक जनरल जिया उल हक के दौर में स्थापित पैटर्न पर ही तैयार किया जा रहा है जबकि उनकी शिक्षा नीति का मकसद अफगान युद्ध के लिए जिहादी तैयार करना था.

"जनरल जिया उल हक ने स्कूली पाठ्यक्रम का इस्तेमाल धार्मिक और जातीयता के आधार पर समाज को बांटने के लिए किया. इसी का नतीजा है कि प्रांत में इतना चरमपंथ, असहिष्णुता, उग्रवाद, सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ फैला है."

खैबर पख्तूनख्वाह पाठ्यक्रम बोर्ड के अध्यक्ष

स्कूली किताबों में आपत्तिजनक सामग्री पर बहस के कारण 2006 और 2009 में पाठ्यक्रमों की नीतिगत समीक्षाएं हुईं, लेकिन पीटर जैकब का कहना है कि इनमें से किसी को भी लागू नहीं किया गया.

बदलाव की जरूरत

चरमपंथ के सबसे ज्यादा शिकार खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के पाठ्यक्रम बोर्ड के अध्यक्ष ने पिछले साल कहा था, “जनरल जिया उल हक ने स्कूली पाठ्यक्रम का इस्तेमाल धार्मिक और जातीयता के आधार पर समाज को बांटने के लिए किया. इसी का नतीजा है कि प्रांत में इतना चरमपंथ, असहिष्णुता, उग्रवाद, सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ फैला है.”

प्रांतीय बोर्ड के अध्यक्ष ने पाठ्यक्रम में अन्य धर्मों के लोगों को मूल्यों को भी पाठ्यक्रम में जगह देने का वादा किया.

पीटर जैकब इस बात पर अफसोस जताते हैं कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार भी शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों को अपनी प्राथमिकता नहीं मानती है.

इस बीच शिक्षा जगत से जुड़े लोगों ने कहा है कि अगर तुरंत पाकिस्तान में स्कूली किताबों में बदलाव नहीं किया गया तो बहुसंख्यक युवा पाकिस्तानियों की और ज्यादा पीढ़ियां में अन्य धर्मों और देशों के प्रति नफरत बढ़ेगी.

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