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सोमवार, 19 जुलाई, 2004 को 16:31 GMT तक के समाचार
 
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गैस कांड और मुआवज़े का विवाद
 

 
 
भोपाल के गैस पीड़ितों का प्रदर्शन
भोपाल के गैस पीड़ित लंबे समय से मुआवज़े की लड़ाई लड़ रहे हैं
दो और तीन दिसंबर 1984 की रात बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड के भोपाल कारख़ाने से एक ज़हरीली गैस रिसने लगी.

मिथाइल आइसो सायनाइड (मिक) नाम की इस गैस ने उसी रात हज़ारों लोगों की जानें ले लीं और लाखों को विकलांग बना दिया.

वैज्ञानिक तथ्य है कि गैस पीड़ितों की आने वाली पीढ़ी को भी इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है.

इस गैस हादसे में कुल कितने लोगों की मौत हुई इसे लेकर अलग-अलग दावे हैं.

वैसे भोपाल में गैस पीड़ितों को राहत देने के लिए जो दावा अदालतें बनाई गईं थीं उन्होंने क़रीब छह हज़ार मृत्यु दावों को स्वीकार किया था, हालाँकि दावे 21 हज़ार लोगों के लिए पेश किए गए थे.

दावा राशि

यूनियन कार्बाइड ऑफ़ इंडिया लिमिटेड को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फ़रवरी 1989 में निर्देश दिया था कि वह गैस पीड़ितों के लिए 47 करोड़ डॉलर की मुआवज़ा राशि का भुगतान करे.

कंपनी ने यह बात मानते हुए राशि भारत सरकार को दे दी थी जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक में जमा करा दिया गया था.

इसके बाद भारत सरकार के कल्याण आयुक्त की ओर से गैस पीड़ितों को मुआवज़ा देने की प्रक्रिया शुरु हुई.

भोपाल के 56 वार्डों में से 36 वार्डों को गैस प्रभावित माना गया. हालाँकि इसे लेकर भी विवाद रहा है कि क्या सचमुच सिर्फ़ 36 वार्ड ही गैस पीड़ित थे या पूरे शहर को गैस से पीड़ित माना जाए.

इसके बाद मुआवजा बाँटने के लिए सरकार की ओर से भोपाल के इन 36 वार्डों में 40 मुआवज़ा अदालतें गठित की गईं.

इन अदालतों के फ़ैसले के आधार पर पाँच लाख 70 हज़ार लोगों को मुआवज़ा राशि बाँटी गई.

इसके बाद भी एक बड़ी राशि बैंक में बची हुई थी जो अब ब्याज जोड़कर 1505 करोड़ रुपए हो चुकी है.

बची हुई राशि

इस बची हुई राशि का विवाद बढ़ता जा रहा था.

भोपाल गैस पीड़ितों का प्रदर्शन
दावों और मुआवज़ों को लेकर अभी भी विवाद है

दो साल पहले केंद्र की तत्कालीन वाजपेयी सरकार के विधि मंत्रालय ने रसायन मंत्रालय के सुझाव पर सॉलीसिटर जनरल सोली सोराबजी से सलाह माँगी.

तब के सॉलीसिटर जनरल ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया था कि वह चाहे तो राशि यूनियन कार्बाइड को लौटा सकती है.

उसके बाद मध्यप्रदेश सरकार का सुझाव आया कि इस बची हुई राशि को नर्मदा का पानी भोपाल तक लाने की परियोजना में लगा दिया जाए.

एक सुझाव यह भी था कि इस राशि का उपयोग यूनियन कार्बाइड का ज़हरीला कचरा साफ़ करने के लिए किया जाए.

बाक़ी बहुत सी बातें हो रही थीं लेकिन बस यही बात नहीं हो रही थी कि यह राशि गैस पीड़ितों को ही बाँट दी जाए.

आख़िर 36 गैस पीड़ित वार्डों के 36 प्रतिनिधियों ने पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी कि यह राशि गैस पीड़ितों को ही दी जाए.

इस याचिका पर ही सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 19 जुलाई को निर्देश दिया कि पूरी राशि ब्याज सहित गैस पीड़ितों में ही बाँट जाए.

 
 
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