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रविवार, 06 मई, 2007 को 08:14 GMT तक के समाचार
 
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'ग्लोबल वार्मिंग पर हमारी चिंताएँ अलग'
 

 
 
सौर ऊर्जा - फ़ाइल फ़ोटो
भारत में वैकल्पिक ऊर्जा पर काफ़ी काम किया जा रहा है
इस दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ अपारंपरिक ऊर्जा के लिए केंद्र सरकार में स्वतंत्र मंत्रालय है.

ये भारत की ज़रूरतों को देखकर ही बनाया गया है.

ग्लोबल वार्मिंग से जुड़े भारत के सरोकारों और विकसित देशों के सरोकारों में बहुत फ़र्क है.

आज भारत के लिए ग्लोबल वार्मिंग उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी ये विकसित देशों के लिए है.

फिर भी दुनिया के देशों के सरोकारों से अपने को जोड़ते हुए हम ग्लोबल वार्मिंग की चिंता कर रहे हैं और उपाय और योजनाएं बना रहे हैं.

इस क्षेत्र में अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की बड़ी भूमिका हो सकती है.

भारत में बायोगैस, बायोमास, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत योजना, कचड़े से बिजली बनाने जैसे ढेरों कार्यक्रमों और योजनाओं पर काम हो रहा है.

 अभी हम 10000 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रहे हैं और 2012 तक 25000 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रहे होंगे.
 

भारत में वैकल्पिक ऊर्जा के तौर पर हाइड्रोजन और बायो डीजल पर भी काम चल रहा है.

ये सारी कोशिशें हम ग्लोबल वार्मिंग से होने वाली परेशानियों से बचने के लिए ही कर रहे हैं.

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में हमने एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई है जो वेबसाइट पर मौज़ूद है.

अभी हम 10000 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रहे हैं और 2012 तक 25000 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रहे होंगे.

आत्मनिर्भरता

सौर ऊर्जा - फ़ाइल फ़ोटो
भारत की कोशिश है कि अक्षय ऊर्जा के बारे में आम आदमी को जगारुक किया जाए

आम आदमी को इन कार्यक्रमों से सीधे जोड़ने के लिए हम हर साल राजीव गांधी अक्षय ऊर्जा दिवस मनाते हैं.

इसका उद्देश्य है लोगों में जागृति लाना, लोगों को अक्षय ऊर्जा के बारे में जानकारी देना. ये काम जोरों से हो रहा है और मैं समझता हूँ कि ये समय की ज़रूरत है.

आज हमारी ऊर्जा ज़रूरतें बहुत अधिक हैं. पारंपरिक और अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से बनने वाली बिजली में से विकल्प चुनने की बात तब होगी जब हमारे पास पूरे साधन हों और हमारी सभी ज़रूरतें पूरी हो रही हों.

आज ऊर्जा की हमारी मांग और उपलब्धता में बहुत बड़ा अंतर है. वैसे भी दुनिया में जहाँ भी अपारंपरिक ऊर्जा का निर्माण हो रहा है वो अनुपूरक ऊर्जा की तरह हो रहा है.

अभी दुनिया के देशों में ये अवधारणा नई ही है.

 आज ऊर्जा की हमारी मांग और उपलब्धता में बहुत बड़ा अंतर है. वैसे भी दुनिया में जहाँ भी अपारंपरिक ऊर्जा का निर्माण हो रहा है वो अनुपूरक ऊर्जा की तरह हो रहा है.
 

विकसित और विकासशील देशों ने अभी इस पर काम करना शुरू ही किया है. विकसित देशों में थोड़ा अधिक काम हो चुका है लेकिन हम भी अच्छा काम कर रहे हैं.

अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को देखते हुए हम अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के माध्यम से ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का नारा लेकर चल रहे हैं.

क्योटो प्रोटोकॉल में हम एक हस्ताक्षरकर्ता हैं लेकिन हमने अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किए हैं.

अमरीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किया है और वो ही सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्पादन कर रहे हैं.

उनकी कथनी और करनी में फ़र्क है लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे.

(आलोक कुमार के साथ बातचीत पर आधारित)

 
 
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