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पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, खट्करकलां से लौटकर

भगत सिंह का पुश्तैनी घरः चिराग तले अंधेरा

चिराग तले अंधेरा... इस गाँव के बारे में ऐसा कहना एक गुस्ताख़ी है पर भारतीय पंजाब के नवाँशहर ज़िले में स्थित भगत सिंह के पुश्तैनी गाँव का यही सच भी है.

खट्करकलां नाम के इस गाँव में भगत सिंह का जन्म तो नहीं हुआ पर उनका पुश्तैनी मकान यहाँ आज भी है.

पीले रंग में पुते इस पुराने मकान के बाहर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से एक नोटिस लगा हुआ है. मकान में कुल चार कमरे हैं जिनपर काँच के किवाड़ लगे हैं. इनपर ताला लगा है पर अंदर देखा जा सकता है. एक देखरेख के लिए नियुक्त कर्मचारी के अलावा यहाँ कोई नहीं रहता.

अंदर भगत सिंह के माता-पिता और परिजनों की एक पुरानी तस्वीर टंगी है. साथ में पीतल, कांसे और तांबे के कुछ बर्तन, एक पुरानी कुर्सी है. दूसरे कमरों में एक पुराना पलंग और कुछ दूसरे रोज़मर्रा के सामान हैं.

गांधी और भगत सिंह में वैचारिक मतभेद थे पर सूत कातने का एक चरखा भी यहाँ रखा हुआ है.

आज़ाद देश का गाँव

भगत सिंह के जन्म को 100 वर्ष और देश की आज़ादी को 60 बरस हो चुके हैं और इतने समय में आज़ाद भारत की तस्वीर काफ़ी बदल चुकी है. यह बदलाव इस गाँव में भी साफ़ दिखाई देता है.

गाँव में सिखों के अलावा दलित, सवर्ण, मुस्लिम यानी सभी वर्गों की आबादी है. लगभग एक चौथाई घरों के लोग विदेशों में कमा रहे हैं और इसका असर गाँव पर भी दिख रहा है.

बड़े-बड़े मकानों, कोठियों में भगत सिंह का पैतृक घर छिपकर रह गया है. आलीशान कोठियों, साफ़ रास्तों और बड़ी गाड़ियों वाले इस गाँव के आगे कई शहर भी गंदे और पिछड़े नज़र आते हैं. कई घरों में 5-6 एसी तक लगे हैं पर कई घर गोबर के उपलों में ही खाना बनाते हैं.

यह बात और है कि दलितों और पिछड़ी जाति के लोगों की बस्ती अभी भी संकरी गलियों और खुली नालियों के साथ ही बसती है.

भगत सिंह के पैतृक निवास के पास अब एक पार्क है जिसमें हरा-भरा गलीचा है पर बड़ी कोठियों वाले गाँव ने इसे नहीं बनवाया, इसे पिछली राज्य सरकार के समय में बनवाया गया. गाँववाले तबतक यहाँ सारा कूड़ा और गंदगी डालते थे.

पंजाब के कई गाँवों के बाहर बड़े द्वार बने हैं. गाँव के नामी लोगों या धनी लोगों की स्मृति में, गाँववालों के सौजन्य से. ऐसा ही एक बड़ा-सा कंकरीट का द्वार इस गाँव के बाहर भी बना हुआ है जिसपर लिखा है शहीदे-आज़म भगत सिंह द्वार... पर इसे भी गाँव ने नहीं, प्रशासन ने बनवाया है.

भगत सिंह यानी मौज, मस्ती और..

गाँव में भगत सिंह के नाम पर पिछले कुछ बरसों से एक मेला लगता है- उनकी शहादत की याद में, 23 मार्च को.

यहाँ के युवाओं से पूछा- भगत सिंह को कैसे याद करते हो. जवाब मिला- "मेले में याद करते हैं." मेले में क्या करते हो, जवाब मिला- "नाच, गाना, मौज, मस्ती..." पर भगत सिंह क्या सोचते थे के जवाब पर वो चुप हो जाते हैं. इन बड़े सवालों से उनका वास्ता नहीं.

भगत सिंह नास्तिक थे और यही बताते हुए उनका जीवन ख़त्म हुआ कि वो नास्तिक क्यों हैं पर गाँव में दो गुरुद्वारे हैं. एक गुरुद्वारा है सिंह सभा का जहाँ जा तो कोई भी सकता है पर वहाँ ज़्यादातर संपन्न और उच्च जाति के सिख जाते हैं.

दूसरा गुरुद्वारा गुरू रविदास गुरुद्वारा कहलाता है और यहाँ जाने वाले अधिकतर लोग दलित हैं.

यानी जाति-धर्म से ऊपर उठकर इंसान को एक बताने वाले भगत सिंह के गाँव के लोग आजतक ईश्वर को भी एक नहीं बना पाए. इंसानों को एक होने में न जाने कितना वक्त लगेगा.

गाँव के गुरुद्वारे के जत्थेदार से बातचीत की और पूछा कि क्या गाँव दूसरा भगत सिंह देगा तो जवाब में वो गाँव के सबसे धनी लोगों की तरक्की की प्रशंसा करने लग गए. गाँव में किसी भी तरह का सांप्रदायिक और जातीय भेदभाव होने को उन्होंने सिरे से ख़ारिज कर दिया.

भगत सिंह के घर की देखरेख करने वाले रामआसरे बताते हैं कि गाँव के 70 प्रतिशत लोगों को यह तक नहीं मालूम कि इस मकान में क्या यादें संजोई गई हैं. गाँव को अपनी चमक-दमक का ख्याल तो रहा पर भगत सिंह की सुध लेने का ज़िम्मा आज़ादी के पाँच दशकों तक सरकारों पर ही रहा.

नई पीढ़ी के भगत सिंह

इस गाँव में आने से पहले जितने काल्पनिक बिंब बन रहे थे, यहाँ आने के बाद सब ध्वस्त होते चले गए. गाँव की तरक्की और समृद्धि की चमक भी शायद इसी वजह से फीकी लगने लगी.

यह शायद भगत सिंह का गाँव नहीं है. यह वही गाँव है जो पंजाब का गाँव है, भारत का गाँव है. जिसके लिए विकास के मायने सामाजिक बदलाव नहीं, कंकरीट और स्टील है.

यहाँ के युवा भगत सिंह की नहीं पंजाब के उसी युवा की बानगी हैं जो आज नशे का शिकार है, गाड़ियों पर सवार है और बदलते भारत की चकाचौंध में आगे बढ़ रहा है. उसके पास आज तरह-तरह के साधन, संसाधन हैं पर इनसे वो भारत की तस्वीर बदलने के सपने पता नहीं देखता भी है या नहीं पर हाँ, ज़िंदगी का मज़ा ज़रूर लेना चाहता है.

यहाँ अमीर-ग़रीब, जाति-मज़हब, छोटा-बड़ा, समता-सम्मान.. ऐसे कई विशेषण आज भी विशेषण ही हैं, यहाँ की सच्चाई नहीं बन सके हैं.

यहाँ सरकार को दोष नहीं, श्रेय देना चाहिए. देर से ही सही, भगत सिंह का कुछ तो इस गाँव में संजोया जा चुका है. ईंट-पत्थरों और लोहे-पीतल के ही सही, भगत सिंह के कुछ निशान यहाँ दिखाई तो दे रहे हैं.