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बुधवार, 10 अक्तूबर, 2007 को 10:54 GMT तक के समाचार
 
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'आज भी भारत में लाखों बाल मज़दूर हैं'
 

 
 
बाल मज़दूर
रिपोर्ट के अनुसार लाखों बच्चे उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं
एक अध्ययन के मुताबिक भारत में चौदह साल से कम आयु के बच्चों को घरेलू नौकर या ढाबों में काम न देने के निर्देश के एक साल बाद भी लाखों की तादाद में बच्चे काम कर रहे हैं.

सेव दी चिल्ड्रेन संस्था के इस अध्ययन में कहा गया है कि इन बच्चों को लगातार प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है और इसे रोके जाने के लिए क़दम उठाना ज़रूरी है.

अध्ययन में कहा गया है कि बहुत से बाल कामगारों को भरपेट खाना नहीं मिलता और उनकी पिटाई की जाती है, आग से जलाया जाता है और उनके साथ यौन दुराचार होता है.

 सोनाली पाँच लोगों के परिवार के लिए खाना पकाती है और तीन मंज़िला मकान की सफ़ाई करती है. एक दिन मेज़ पर खाना लगाने में कुछ देर हो गई और उसके मालिकों ने उसके हाथों पर गर्म खाना उंडेल दिया.
 
अनुराधा महाऋषि

आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक भारत में एक करोड़ बीस लाख से ज़्यादा बाल कामगार हैं.

इनमें से दो लाख से ज़्यादा घरेलू नौकर के तौर पर या फिर चाय की दुकानों, रेस्त्रां, होटल और अन्य विश्राम स्थलों में काम करते हैं.

सेव द चिल्ड्रेन की अनुराधा महाऋषि ने बीबीसी से कहा, मैं हाल ही में पश्चिमी बंगाल में बारह वर्षीया सोनाली से मिली. वह पिछले दो साल से कोलकाता में नौकरानी के तौर पर काम कर रही हैं.

सोनाली पाँच लोगों के परिवार के लिए खाना पकाती है और तीन मंज़िला मकान की सफ़ाई करती है. एक दिन मेज़ पर खाना लगाने में कुछ देर हो गई और उसके मालिकों ने उसके हाथों पर गर्म खाना उंडेल दिया.

एक पड़ोसी की मदद से वह वहाँ से निकल पाई और सेव दी चिल्ड़्रेन ने उसे उसके परिवार तक पहुँचाया.

सेव दी चिल्ड्रेन का कहना है कि दि्ल्ली में ही लगभग दस लाख बच्चे घरों या ढाबों में काम करते हैं. हैदराबाद में इनकी संख्या 40 हज़ार और कोलकाता में 50 हज़ार है.

पिछले साल जब से सरकार ने इस पर प्रतिबंध लागू किया है तब से अधिकारियों के अनुसार हनन के 2, 229 मामले दर्ज हुए हैं.

पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आँध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में कार्यरत सेव दी चिल्ड्रेन संस्था का कहना है इनमें से अधिकतर बच्चे असुरक्षित वातावरण में काम करते हैं और लगातार उत्पीड़न के शिकार होते हैं.

बाल मज़दूर
बच्चों का जो समय स्कूल जाने का होता है उसमें वह घरों और ढाबों में काम करते हैं

दि्ल्ली में काम कर रहे बच्चों में 99 प्रतिशत लड़कियाँ हैं और कई मामलों में वे यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं.

अनुराधा महाऋषि का कहना है, ग़रीब घरों से आई बच्चियाँ पंद्रह-पंद्रह घंटे तक काम करती हैं और उन्हें न तो कोई अवकाश मिलता है और न ही पर्याप्त वेतन.

पिछले साल जब सरकार ने प्रतिबंध की घोषणा की थी तो कहा गया था कि क़ानून तोड़ने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी.

इस के तहत तीन महीने से दो साल तक की सज़ा और दस हज़ार से बीस हज़ार रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है.

लेकिन बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले इस को अमल में लाने की प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगा रहे हैं.

 
 
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