BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
 
बुधवार, 15 अप्रैल, 2009 को 07:28 GMT तक के समाचार
 
मित्र को भेजें   कहानी छापें
सत्ता का दबदबा और विपक्ष का अफ़सोस
 

 
 
चुनाव सभा
पहले चरण में सत्ता पक्ष का दबदबा देखने को मिला है
बिहार में पहले चरण के मतदान वाले क्षेत्रों में सम्पन्न होने वाले चुनाव प्रचार की दो बातें ख़ास हैं.

पहली ये कि जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के स्टार प्रचारकों की बड़ी तादाद और साधन संपन्न प्रचार व्यवस्था का भारी दबदबा देखने में आया.

दूसरी ये कि राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी गठबंधन भी अपनी पूरी आक्रामकता के साथ प्रचार में जुटा रहा, लेकिन अंदर से वो अपना कुछ चोट खाया हुआ चेहरा भी नहीं छुपा सका.

लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने आचार संहिता की परवाह किए बिना जो कड़े तीखे शब्दबाण चलाए शायद उसकी असली वजह वही चोट रही हो.

लालू-राम विलास गठबंधन को शुरू में ये ज़रूर लगा था कि इस नई दोस्ती का बड़ा चमत्कारिक असर होगा लेकिन इस संभावना को न तो मीडिया की तरफ़ से और न ही ‘वोट बैंक’ वाले समाज की तरफ़ से कोई ख़ास बढ़ावा या प्रचार मिला.

नीतीश कुमार की कमज़ोरियों को छिपाने वाली ताक़तों ने लालू-पासवान गठबंधन को कुछ ज़्यादा ही चिढ़ा दिया है. ख़ास तौर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के माथे पर ‘विकास तिलक’ सजाने जैसे प्रचार अभियान पर ‘लालू-राबड़ी राज’ वालों का ग़ुस्सा फूटता रहा.

लालू-पासवान
लालू प्रसाद और राम विलास पासवान बिहार में मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं

पेट में दांत

लालू प्रसाद अक़सर कहा करते हैं कि ‘नीतीश के पेट में दांत है’. इस मुहावरे से सहमत लोगों में नीतीश कुमार के कई नज़दीकी मित्रों के भी नाम हैं लेकिन वक़्त की बात है कि इसका असर लोगों पर नहीं हो रहा है.

जिस बात को राबड़ी देवी ने नीतीश कुमार को शर्मिंदा करने के लिए उछाल दिया था, उसे नीतीश कुमार ने अपने हक़ में राजनीतिक हवा बनाने के लिए मोड़ दिया.

इसे नीतीश कुमार की चतुराई ही कहेंगे कि उन्होंने अब तक के अपने चुनाव प्रचार में लालू और राम विलास की तमाम दुखती रगों पर उंगली रख दी, जबकि लालू प्रसाद या राम विलास अपने विरोधी की इस चतुराई के तीर की कोई कारगर काट पैदा नहीं कर पा रहे हैं.

दरअसल कांग्रेस को बिहार में बिल्कुल गया-गुज़रा मानते आ रहे जातीय क्षत्रपों को इस बार थोड़ा चौंकाने वाला आघात लगा है. तीन सीटों के टुकड़े फेंकने वाले अपमान की जैसी कांग्रेसी प्रतिक्रिया सामने आई उसकी कल्पना इन क्षत्रपों ने नहीं की होगी. मात्र पाँच सीटें छोड़ देने से बात बन जाती, ऐसा सब मानते हैं.

अफ़सोस

मणिकांत-नीतीश
नीतीश कुमार अभी तक चुनाव प्रचार में अपने विरोधियों का निशाना बनाने में सफल रहे हैं

राजद-लोजपा ख़ेमा अब अफ़सोस कर रहा है कि मात्र पाँच सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ देने से बात बन जाती यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का ऐसा बिखराव तब नहीं होता.

जदयू-भाजपा ने संप्रग के इस बिखराव को बिहार में लालू-पासवान विरोधी प्रचार का एक कारगर हथियार बना लिया है.

राजद-लोजपा गठबंधन को अपने प्रचार अभियान में सबसे अधिक संकोच कांग्रेस पर निशाना साधने में होता है और कुछ ऐसी ही हालत यहाँ चुनाव प्रचार के लिए आने वाले कांग्रेसी नेताओं की भी है.

और यही वो धर्म संकट है जिस पर जदयू-भाजपा गठबंधन की तरफ़ से चोट पड़ते देख लालू-राम विलास गठबंधन अंदर से बहुत छटपटाता है.

हालाँकि लालू प्रसाद अपने गठबंधन के प्रचार अभियान को पिछड़ने नहीं देने की कला जानते हैं फिर भी इस बार उन्हें इस बाबत ज़्यादा मसाला नहीं मिल पा रहा है.

 
 
इससे जुड़ी ख़बरें
'हवा में उड़ जाएगा तीसरा मोर्चा'
14 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस
सोनिया के निशाने पर आए लालू
11 अप्रैल, 2009 | चुनाव 2009
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
 
 
मित्र को भेजें   कहानी छापें
 
  मौसम |हम कौन हैं | हमारा पता | गोपनीयता | मदद चाहिए
 
BBC Copyright Logo ^^ वापस ऊपर चलें
 
  पहला पन्ना | भारत और पड़ोस | खेल की दुनिया | मनोरंजन एक्सप्रेस | आपकी राय | कुछ और जानिए
 
  BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>