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सोमवार, 06 अप्रैल, 2009 को 06:05 GMT तक के समाचार

रामचंद्र गुहा
जाने-माने लेखक और इतिहासकार

भारत: लोकतंत्र का चक्रव्यूह

भारत में आम चुनावों का बिगुल बच चुका है. जाने-माने लेखक और इतिहासकार रामचंद्र गुहा इस लेख में पड़ताल कर रहे हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आख़िरकार वो कौन सी बातें हैं जो चुनाव को ख़ास बना देती हैं और इस चुनाव में क्या-क्या ख़ास हो सकता है.

वर्ष 1967 के पहले हफ़्ते में ब्रिटेन के अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ लंदन' ने आम चुनावों की कवरेज के लिए एक संवाददाता को भारत भेजा. भारत भ्रमण के दौरान उस संवाददाता ने पाया कि जनता में उदासीनता और बेबसी है.

बातचीत में कुछ भारतीयों ने उनसे कहा कि वे 'भारत की संसदीय प्रजातांत्रिक प्रणाली के बहिष्कार के लिए तैयार हैं'.

पत्रकार ख़ुद भी भारत में टकराव और भ्रष्टाचार से काफ़ी निराश हुआ. उन्होंने देखा कि भारत का ताना-बाना बिखर रहा है और राज्य ख़ुद को उप-राष्ट्र के तौर पर उभार रहे हैं.

ब्रितानी पत्रकार ने अपने निष्कर्ष में लिखा, "भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था का महाप्रयोग असफल हो गया है. "भारत में चौथी लोकसभा के लिए मतदान होना है, लेकिन निश्चित तौर पर ये आख़िरी आम चुनाव होगा.

भारत पर भविष्यवाणी

भारत के बारे में इस तरह की भविष्यवाणियां पहली बार नहीं की गईं थीं और न ही ये आख़िरी हो सकती थीं.

हालाँकि 70 और 80 के दशक में, जब भारत एक के बाद एक कई संकट में घिरा था, तब ऐसी आशंकाएँ जताई जाती थी कि देश कई टुकड़ों में बंट जाएगा या सैन्य शासन के अधीन चला जाएगा.

लेकिन जब भारत ने वर्ष 1997 में आज़ादी की 50वीं वर्षगांठ मनाई तब जाकर ऐसी क़यामत की भविष्यवाणियों का अंत हो सका.

हालाँकि भारत की पहचान अब भी अत्यंत ग़रीब और सामाजिक संघर्षों से जूझ रहे देश के रूप में होती है, लेकिन किसी को भी अब इस बात का शक नहीं रहा कि ये देश अब एकजुट नहीं रह सकता. सभी इस बिंदु पर सहमत हैं कि भारत में हर हाल में लोकतंत्र कायम रहेगा.

15वीं लोकसभा के लिए अप्रैल और मई में मतदान होना है. चुनाव में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की लड़ाई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से है.

यूपीए का नेतृत्व जहाँ कांग्रेस कर रही है, वहीं एनडीए का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हाथों में है.

भाजपा और कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय दल हैं और देश के अधिकाँश भाग पर इन दलों का प्रभाव है. फिर कई छोटी पार्टियां भी चुनावी दंगल में हैं और प्रत्येक पार्टी किसी ख़ास राज्य, क्षेत्र या जाति का प्रतिनिधित्व करती है.

देश में लगभग 70 करोड़ मतदाता हैं, लेकिन सिर्फ़ 40 करोड़ मतदाताओं के ही अपने मताधिकार का प्रयोग करने की उम्मीद है. इस लिहाज से भी मानव इतिहास में ये किसी भी समय में सबसे बड़ा मतदान होगा.

लेकिन ये चुनाव किसके लिए होंगे? मतदाताओं को किसे और क्या चुनने के लिए कहा जाएगा?

दावेदार

एक स्तर पर चुनाव व्यक्तिगत आधार पर लड़े जाएँगे.

दोनों गठबंधनों ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपने-अपने उम्मीदवारों की घोषणा पहले ही कर दी है.

यूपीए के उम्मीदवार मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं, जिनकी पहचान एक शालीन नेता के रूप में होती है. वहीं एनडीए ने लालकृष्ण आडवाणी को अपना उम्मीदवार बनाया है, जो कि राम मंदिर आंदोलन के लिए जाने जाते हैं.

मनमोहन सिंह की उम्र 76 साल है और आडवाणी उनसे कुछ साल बड़े हैं. इनके नामों की घोषणा के साथ ही दोनों पार्टियों ने ये भी संकेत दे दिए हैं कि इन दलों के उत्तराधिकारी कौन होंगे.

अगर कांग्रेस को मनमोहन सिंह की जगह किसी और को चुनना होगा तो वो राहुल गांधी को चुनेगी. जो नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य हैं और ख़ूबसूरत नौजवान होने के साथ-साथ सभ्य स्वभाव के भी हैं.

हालांकि उन्हें अभी ये साबित करना बाक़ी है कि वे भारत की मुश्किल राजनीति के लिए ज़रूरी इच्छाशक्ति और योग्यता रखते हैं.

भाजपा की बात करें तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, आडवाणी की जगह ले सकते हैं. मोदी एक अच्छे प्रशासक हैं, लेकिन उन पर वर्ष 2002 में हुए गुजरात दंगों का कलंक है.

मुद्दों के आधार पर

चुनावों में और भी कई मुद्दे होंगे और अर्थव्यवस्था इनमें अहम होगा. वर्ष 2004 में एनडीए ने 'इंडिया शाइनिंग' के नाम पर चुनाव लड़ा था और पराजित हुई थी. एनडीए ने उच्च विकास दर को मुद्दा बनाया, लेकिन विपक्ष का दावा था कि विकास का फ़ायदा आम लोगों तक नहीं पहुँचा.

यूपीए अनुभव के हिसाब से चतुर है और आगामी चुनाव में वो किसानों की क़र्ज़ माफ़ी और रोज़गार गारंटी जैसी योजनाओं को भुनाने की कोशिश करेगी.

उधर, एनडीए ये बताने की कोशिश करेगा कि इन योजनाओं से ग़रीबों को कोई लाभ नहीं हुआ, उलटा इनसे भ्रष्टाचार ही बढ़ा है.

ये चुनाव पहचान के आधार पर भी लड़े जाएँगे. भाजपा कहीं न कहीं ये इशारा देगी कि कांग्रेस मुसलमानों का पक्ष लेती है. वो खुद को हिंदुओं के सम्मान का ख़्याल रखने वाली पार्टी के रूप में भी पेश करेगी.

दूसरी पार्टियां जाति, वर्ग और क्षेत्र के आधार पर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करेंगी.

कौन जीतेगा

दक्षिण भारत की बीत करें तो वहाँ कई शक्तिशाली राजनीतिक पार्टियां हैं. अलग-अलग भाषाई समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाली ये पार्टियां अपने राज्यों में भाजपा या कांग्रेस से ज़्यादा ताक़तवर हैं.

उत्तर में जातीय आधार वाली पार्टियां शक्तिशाली हैं, जबकि वामदलों का ज़्यादा असर केरल और पश्चिम बंगाल में है.

वर्ष 1967 के लंदन टाइम्स के संवाददाता के परिप्रेक्ष्य में कम से कम ये तो यक़ीन के साथ कहा जा सकता है कि ये चुनाव भारत के लिए आख़िरी चुनाव नहीं हैं. हाँ, इनके नतीजों के बारे में भविष्यवाणी करना एकदम अलग मुद्दा है.

सरकार गठन की तीन संभावनाएँ बनती हैं. कांग्रेस के नेतृत्व में गठबंधन सरकार, भाजपानीत गठबंधन सरकार या फिर तीसरे मोर्चे की सरकार जिसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों ही न हों.

आख़िरी संभावना के अनुसार मायावती प्रधानमंत्री बन सकती हैं. फिलहाल वो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं. वो महिला होने के साथ-साथ दलित भी हैं और अपने साहस और दृढ़ इच्छा शक्ति के लिए जानी जाती हैं.

चुनाव का नतीजा कुछ भी हो, लेकिन इसकी संभावना बहुत अधिक है कि जो भी सरकार सत्ता में आएगी वो कई दलों के गठजोड़ और कमज़ोर गठबंधन वाली होगी.

कई पार्टियों का केंद्र में सत्ता में होना इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो रही हैं. ये वो दल हैं जो पहले कभी सरकार का हिस्सा नहीं रहे.

अब तक 14 लोकसभा चुनावों की तरह ही इस चुनाव में भी कई रंग बिखरेंगे, बड़े पैमाने पर जोश के साथ लोगों की भागीदारी होगी और ये तय है कि ये नज़ारा दुनिया के किसी भी दूसरे देश से अलग होगा.