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गुरुवार, 25 जून, 2009 को 16:14 GMT तक के समाचार
 
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मायावती ने 'जल्दबाज़ी' में किए उदघाटन
 

 
 
स्मारक
स्मारकों के निर्माण से लेकर अभी तक इनका विरोध जारी है

जो लोग दलित सशक्तिकरण के नाम पर तैयार किए जा रहे हज़ारों करोड़ रूपए की लागत वाले स्मारकों के पूरे होने की आस देख रहे थे उनके लिए ख़बर यह है कि निर्माण पूरा होने से पहले ही लखनऊ में खड़े ये आधे-अधूरे स्मारक लोगों को समर्पित हो गए हैं.

जी हाँ, आनन फानन में गुरुवार की शाम राज्य की मुख्यमंत्री मायावती ने राजधानी लखनऊ में स्थित 15 स्मारकों, पार्कों, चौराहों, मैदानों का उदघाटन कर दिया है.

लखनऊ के एक छोर से दूसरे छोर तक फैले इन स्मारकों में मुख्य है बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल... इसके अलावा राजधानी भर में 14 और स्मारक, पार्क, चौराहे, गैलरी आदि बनवाई गई हैं.

हज़ारों करोड़ की लागत से और सैकड़ों एकड़ ज़मीन पर बने इन स्मारकों में बाबासाहेब अंबेडकर और कांशीराम के अलावा मायावती की भी तीन प्रतिमाएं हैं.

मायावती ने गुरुवार की शाम अचानक ही इन स्मारकों के उदघाटन की घोषणा की और स्मारकों का उदघाटन कर भी डाला.

मायावती सरकार को हाल में संपन्न आम चुनावों में राज्य में तीसरे स्थान पर मतदाताओं ने पहुंचा दिया था. जानकारों का कहना है कि ऐसे स्मारकों में पैसा खर्च करना और लोगों के विकास की अनदेखी के ख़िलाफ़ जनता ने मतदान किया है.

विश्लेषक मानते हैं कि मायावती के लिए स्मारकों में उलझे रहने और उनपर करोड़ों, अरबों रूपए खर्च करने की वजह से ही मायावती का आधार राज्य में कमज़ोर हुआ है और उनकी छवि भी बिगड़ी है.

जल्दबाज़ी क्यों

महंगे खर्च पर बन रहे इन स्मारकों के उदघाटन की जल्दबाज़ी पर सवाल उठ रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि जिन जगहों को मायावती ने लोगों के विरोध के बावजूद खड़ा किया, उनका उदघाटन तो शान से करना चाहिए था, इतनी जल्दबाज़ी क्यों.

इन स्मारकों के निर्माण में सरकारी खजाने के दुरुपयोग संबंधी एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी जिसकी सुनवाई जुलाई में होनी थी.

लेकिन अब इस याचिका की सुनवाई इसी महीने यानी 29 जून को होनी है. जानकार मानते हैं कि पूर्व के कुछ मामलों में न्यायपालिका से झटके खा चुकी राज्य सरकार फिलहाल अगली चोट खाने को तैयार नहीं है और सुनवाई से ठीक पहले आधे-अधूरे स्मारकों का उदघाटन यही संकेत देता है.

हालांकि मायावती ने उदघाटन के वक़्त दिए गए अपने संबोधन में कहा है कि देश में इससे पहले भी इतनी बड़ी लागत के स्मारक बनते रहे हैं, राजघाट के लिए तो कभी सवाल नहीं उठाया गया तो फिर दलितों के सम्मान से जुड़े स्मारकों पर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि स्मारकों में उनकी तीन जगह पर मूर्तियां भी इसलिए लगी हैं क्योंकि दलित विचारक कांशीराम ऐसा चाहते थे कि उनकी प्रतिमाओं के साथ मायावती की भी प्रतिमा लगाई जाए.

 
 
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