नोबेल विजेता क्यों हैं बूढ़े?

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अभी तक जितने भी नोबेल पुरस्कार विजेताओं की घोषणा हुई है उनकी औसत उम्र 72 साल है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था.

साल 2016 के भौतिक विज्ञान, चिकित्सा और रसायन शास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता सभी पुरूष हैं और कम से कम 65 साल और अधिकांश 72 साल के हैं.

20 वीं सदी के पहले छह महीने देखें तो नोबेल पुरस्कार विजेता औसतन 'केवल' 56 साल के थे. भौतिकी के पुरस्कार विजेता अब औसतन साठवें साल के अंतिम दौर में चल रहे पुरुषों का समूह है, जिनकी उम्र औसतन 47 साल हुआ करती थी.

वास्तव में, परंपरागत विज्ञान में जीवन के बाद के वर्षों में नोबेल विजेता बनने की एक महत्वपूर्ण प्रवृति देखने को मिली है, जो 1950 से शुरू हुई थी और मौजूदा दौर तक जारी है.

आप अक्सर कहानियों में सुनते हैं कि फलां लेखक या दार्शनिक सैकड़ों वर्ष पहले हर किताब को पढ़ने वाला अंतिम व्यक्ति था. हालांकि यह संदेहास्पद हो सकता है,

निश्चित रूप से ज्ञान बढ़ा है. क्या आज इतनी जानकारी और सिद्धांत हो सकते हैं कि वैज्ञानिक सफलताएं बुढ़ापे में ही मिले पाए ?

यही कारण है कि शायद इस सवाल का जवाब नहीं है.

नोबेल संग्रहालय के एक वरिष्ठ क्यूरेटर गुस्ताव कालस्ट्रेंड ने हमें बताया है कि 100 साल पहले जहां केवल 1000 के आसपास भौतिकविद् थे. एक अनुमान के अनुसार आज ये दुनिया में 10 लाख हैं.

उन्होंने कहा, " इसलिए यह एक महत्वपूर्ण कारक है. नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने का समय लंबा हो रहा है और आपको एक सफलता पाने के तुरंत बाद पुरस्कार नहीं मिलता है.''

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यहां तक ​​कि अब वैज्ञानिक प्रारंभिक जीवन में ही खोजें कर लेते हैं, लेकिन दूसरे हजारों लोगों के साथ जो यह ही कर रहे होते हैं और नोबेल पुरस्कार समिति को एक उच्च स्तर के सत्यापन की जरूरत होती है, इसलिए एक पुरस्कार जीतने में कई साल लग जाते हैं.

लेकिन ये सवाल अभी भी परेशान करता है. 100 साल पहले की तुलना में आज शांति के लिए काम करने वाले हजारों अधिक लेखक, अर्थशास्त्री और लोग भी हैं. हालांकि नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने में उनकी उम्र का रूझान बिल्कुल अलग है. और ये क्यों है कि भौतिकी का नोबेल प्राप्त करने वाले चिकित्सा के क्षेत्र के अपने नोबेल विजेता साथियों की तुलना में तेजी से बुढा रहे है ?

ये सब 20 सदीं के प्रारंभ में आई क्वांटम यांत्रिकी के तेजी से बढ़ते क्षेत्र की वैज्ञानिक क्रांति से कम हो सका.

गुस्ताव लिखते हैं कि "सदी की पहली छमाही में भौतिक विज्ञान में एक तेजी से बढ़ता क्षेत्र था, कई भौतिकविद युवा थे और वे तेजी से खोजें कर रहे थे."

और नोबेल समिति यह जानती थी.

उन्होंने कहा, "समिति इस पर ध्यान दे रही थी. यह एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें वे दिलचस्पी रखते थे और वे उपलब्धियों को तेजी से पहचान रहे थे."

वर्नर हाइजेनबर्ग (बाद में ब्रेकिंग बैड के एक उपनाम के लिए प्रेरणा) और पॉल डिराक केवल 31 साल के थे जब वे 1930 के दशक में भौतिक विज्ञान में नोबेल पुरस्कार विजेता बने थे. दोनों को क्वांटम यांत्रिकी पर काम करने के लिए नोबेल मिला था.

यह एक नई टूलकिट की खोज जैसा था जो कि तेजी से खोजों की उपज कर सकता था. जैसा कि एक वैज्ञानिक ने कहा: "औसत दर्जे के भौतिकविद भौतिकी की महान खोज कर सकते थे."

यही कारण है कि शांति पुरस्कार विजेता उम्र बढ़ाने के चलन का विरोध करते रहे हैं. गुस्ताव कहते हैं कि अब यह पुरस्कार बहुत अलग है.

"शांति पुरस्कार समिति और अधिक आधुनिक होने की कोशिश करती हैं. वे ये देखने के लिए इंतजार नहीं करते कि शांति के उपाय पूरी तरह से सफल होंगे."

उदाहरण के लिए वह ये नहीं देखते कि इंडोनेशिया में प्रजातंत्र कब तक रहेगा.

विज्ञान और मानवीय कार्यों में इन सब बदलावों के बावजूद एक चीज जिस पर आप भरोसा कर सकते हैं, नोबेल पुरस्कार विजेता जबर्दस्त तरीके से पुरुष ही होंगे.

तेजी से बढ़ती वैज्ञानिकों की जनसंख्या पुरस्कार के लिए विजेताओं को सालों का इंतजार कराएगी. इसका ये भी मतलब है कि मौजूदा समय में पुरूषों की तुलना में महिलाओं का असंतुलित अनुपात ये दिखाता है दशकों पहले दुनिया कैसी दिखती थी.

विज्ञान के क्षेत्र में पुरुषों का प्रतिनिधित्व अभी भी काफी हैं, लेकिन जैसे ही विविधता में सुधार आता है और पुरस्कार के लिए बैकलॉग साफ होता है. तो शायद नोबेल पुरस्कारों में प्रतिनिधित्व में बराबरी एक वास्तविकता बन सकती है.

नोबेल संग्रहालय ने बीबीसी को आश्वासन दिया है कि वहाँ के पैनल का जानबूझकर महिलाओं के काम को अनदेखा करने का कोई रिकॉर्ड नहीं हैं.

जब 1903 में मैरी क्यूरी को नोबेल पुरस्कार के लिए नामित नहीं किया गया तो उनके पति और विकिरण में संयुक्त शोधकर्ता ने इसका विरोध किया और पुरस्कार स्वीकार करने से मना कर दिया. बाद में पैनल ने उनका नाम देर से जमा किया 1902 का सबमिशन स्वीकार किया और वह नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला बन गई.

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