सैफ़ई तक सीमित है विकास की धारा!

Image caption सैफ़ई में कार्ड खेलते हुए ग्रामीण

सोचिए ज़रा कि किसी गांव में बड़ा सा अस्पताल, मेडिकल यूनिवर्सिटी, कई कॉलेज, स्कूल, स्टेडियम, हवाई पट्टी, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स जैसी समृद्धि को दर्शाने वाली बड़ी-बड़ी इमारतें हों तो वो गांव कैसा होगा?

और जब ये कहा जाए कि वो गांव उत्तर प्रदेश में है, तो हो सकता है कि इस राज्य से परिचित लोग भरोसा भी न करें. लेकिन ये सच है और ये गांव है इटावा ज़िले का सैफ़ई. कई मायनों में ये चर्चा में रहता है, ख़ासकर जब यहां हर साल सैफ़ई महोत्सव में बड़े-बड़े फ़िल्मी कलाकार आते हैं.

यह गांव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का है. मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश तक ने इस गांव में हर वो चीज़ मुहैया कराने की कोशिश की है जो महानगरों में ही सुलभ होती है. इटावा से मैनपुरी जाने वाली सड़क पर दूर से ही पता चल जाता है कि अब सैफ़ई गांव में पहुंच चुके हैं.

गांव के लोगों की बेफ़िक्री देखकर लगता है कि उन्हें काफी कुछ मिला है और जीवन में संघर्ष की जगह बहुत कम है. हालांकि उन्हें ये क़ीमत अपनी ज़मीनें देकर चुकानी पड़ी, लेकिन इसका अफ़सोस नहीं है.

गांव में विकास की तस्वीर देखने के लिए हम क़रीब चार हज़ार की आबादी वाले इस गांव में ख़ूब घूमे. हालांकि अब सैफ़ई नाम से ही सैफ़ई ब्लॉक भी है, सैफ़ई तहसील भी है, लेकिन सैफ़ई गांव अभी भी कागज़ों में इसी नाम से दर्ज है.

सैफ़ई के लोग बताते हैं कि उनका गांव दूसरे गांवों की तुलना में क्यों अलग है. उनके गांव में हर सुविधा है, बिजली भी लगभग चौबीस घंटे आती है, ज़मीनें जो थीं वो विकास के नाम पर भले ही सरकार ने ले ली, लेकिन प्रति बीघा चालीस लाख रुपए का मुआवज़ा भी मिला है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं.

लेकिन विकास और समृद्धि को दर्शाते इस गांव में सब ख़ुश ही हैं, ऐसा नहीं है. कुछ लोग विकास के इस मॉडल को भविष्य के लिहाज़ से सही नहीं मानते.

गांव की एक बुज़ुर्ग महिला कहती हैं, "सुविधा तो सब मिली है, लेकिन यदि कुछ फैक्ट्री- वैक्ट्री लगा दी गई होती तो बच्चों को रोज़गार मिलता. ज़मीन का पैसा लोग कितने दिन खाएंगे? और जिनकी ज़मीनें गईं उन्हें तो पैसा मिल गया, जिनके पास ज़मीन नहीं थी, उनके बच्चे तो बेरोज़गार ही घूम रहे हैं."

वहीं दूसरी ओर, सैफ़ई से लगे कुछ दूसरे गांवों का जब हमने रुख किया तो ऐसा लगा जैसे विकासरूपी नदी की धारा अचानक लुप्त हो गई है.

सैफ़ई ब्लॉक में ही पड़ने वाले डेरा बंजारन गांव की सीमा सैफ़ई को छूती है. यहां सड़क तो है, सड़क के किनारे बिजली के खंभे भी लगे हैं, लेकिन खंभों पर तार तक नहीं है, बिजली तो दूर की बात. सड़क किनारे ही बंजारा समुदाय के कुछ लोगों के घर थे जो दूर से ही अपनी बदहाली को बयां कर रहे थे.

Image caption सैफ़ई स्टेडियम में बैठने की व्यवस्था

गांव के योगेश कुमार बारहवीं तक पढ़े हैं, लेकिन बेरोज़गार हैं. सैफ़ई गांव के पड़ोसी होने के बावजूद अपने गांव की बदहाली को मानो नियति ही मान लिया हो इन्होंने. कहते हैं, "वो मुख्यमंत्री का गांव है तो इतना अच्छा है, हमारा गांव, गांव जैसा है. क्या करें. चुनाव के समय गाड़ी आती है, गांव के लोग वोट दे आते हैं, लेकिन उसके बाद उन्हें पूछने कोई नहीं आता."

गांव की महिलाएं बताने लगीं कि उन्होंने अपने गांव में प्रधान तक को कभी नहीं देखा है और बड़े नेता तो दूर की बात हैं. लोगों ने बताया कि पानी, स्कूल, सरकारी योजनाएं किसी चीज़ का उन्हें कोई लाभ नहीं मिल रहा है. मिट्टी और फूस के घरों में रह रहे इन लोगों की बातों पर भरोसा न करने का कोई कारण भी नहीं दिखता है.

इटावा के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश शाक्य बताते हैं कि, "इतने बड़े राजनीतिक परिवार के लोगों में विकास की सोच सैफ़ई से आगे बढ़ ही नहीं पाई. इसीलिए सैफ़ई के पड़ोसी गांवों में भी विकास की किरण नहीं पहुंचा पाए. वो कहते हैं कि सैफ़ई ब्लॉक में क़रीब अस्सी गांव हैं, लेकिन सैफ़ई को छोड़कर सबकी स्थिति वैसी ही है, जैसी की उत्तर प्रदेश के दूसरे गांवों की."

Image caption सैफ़ई गांव का रात का नज़ारा

वहीं इटावा के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सूरज सिंह यादव कहते हैं कि,"सैफ़ई को छोड़कर इटावा ज़िले में विकास जैसी कोई चीज़ नहीं दिखती. सूरज सिंह यादव के मुताबिक क़रीब 25 साल से सत्ता के केंद्र में रहने के बावजूद मुलायम सिंह यादव या फिर अखिलेश यादव ने आज तक यहां कोई उद्योग लगाने की कोशिश नहीं की."

सूरज सिंह यादव इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि ख़ुद मुलायम सिंह कई बार कह चुके हैं कि उद्योग लगाने से नक्सली पैदा होंगे और श्रमिक संगठन बनेंगे जो वो नहीं बनने देना चाहते.

जहां तक सैफ़ई गांव की ही बात है तो विकास का लाभ भी कुछ लोगों तक ही पहुंच पाया है. तमाम स्कूल, कॉलेज, डिग्री कॉलेज, मेडिकल विश्वविद्यालय, स्टेडियम जैसी अकादमिक संस्थाओं के बावजूद इस गांव से राजनीति को छोड़कर अब तक किसी अन्य क्षेत्र में कोई ऐसी प्रतिभा भी नहीं निकल सकी जिसका कि उल्लेख किया जाए.

शायद इसी वजह से कुछ लोग ये कहते हुए भी मिले कि विकास का ये पैटर्न और मॉडल एक ताक़तवर राजनीतिक परिवार की 'स्वांत: सुखाय' ज़िद को पूरा करने के सिवा और कुछ नहीं है.

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