स्मार्टफोन ऑपरेटिंग सिस्टम का दंगल: ऐपल से आगे इंडस

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भारत का घरेलू ऑपरेटिंग सिस्टम इंडस देश का दूसरा सबसे लोकप्रिय मोबाइल प्लेटफॉर्म बन गया है.

भारत में तैयार किया गया मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम इंडस देश का दूसरा सबसे लोकप्रिय स्मार्टफोन प्लेटफॉर्म बन गया है. इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसने ऐपल के ऑपरेटिंग सिस्टम को पीछे छोड़ दिया है.

हालांकि भारत के स्मार्टफोन मार्केट में गूगल का एक तरह से एकाधिकार है. यहां बिकने वाले हर 10 में से 9 स्मार्टफोन गूगल के ऐंड्रॉयड प्लेटफॉर्म पर काम करते हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार के दूसरे खिलाड़ी भी अपनी विस्तार की कोशिशों में लगे हुए हैं.

भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे तेजी से उभरता स्मार्टफोन बाजार है. उम्मीद की जा रही है कि साल 2016 में स्मार्टफोन कि बिक्री 10 करोड़ पार कर जाएगी.

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लेकिन एक ऐसे देश में जहां 80 फीसदी आबादी अंग्रेज़ी ठीक से नहीं समझती है, छोटे शहरों और गांवों के नए उपभोक्ताओं तक पहुंचना स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों के लिए चुनौती ही है.

और इन सब के बीच इंडस ऑपरेटिंग सिस्टम आहिस्ता-आहिस्ता खामोशी से अपनी जगह बनाने लगा है. इसकी सबसे बड़ी खूबी है कि यह 12 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है. भारत की 90 फीसदी आबादी इसके दायरे में आती है.

कायदे से देखें तो यह अपने आप में कोई नया ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं है बल्कि इसके डेवलपर्स ने ऐंड्रॉयड प्लेटफॉर्म पर ही थोड़े बहुत बदलाव करके भारत की मोबाइल संस्कृति और इसकी अपनी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश की है.

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Image caption राकेश देशमुख

इंडस ऑपरेटिंग सिस्टम के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी राकेश देशमुख कहते हैं, "हम खासतौर पर भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक प्रोडक्ट बनाना चाहते थे."

काउंटर प्वॉइंट रिसर्च के मुताबिक इंडस ऑपरेटिंग सिस्टम ने जुलाई से सितंबर की तिमाही के दौरान 7.1 फीसदी बाजार हिस्सेदारी पर कब्जा कर लिया. इसके साथ ही इंडस ऐंड्रॉयड के बाद दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला ऑपरेटिंग सिस्टम बन गया.

राकेश देशमुख कहते हैं, "कंपनी की रिसर्च के दौरान पाया गया कि बहुत से लोग सामान्य फोन छोड़कर स्मार्टफोन इस्तेमाल करना चाहते हैं लेकिन भाषाई दिक्कतों के कारण वे हिचकिचा रहे थे."

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बहुभाषी विकल्प के अलावा इंडस ऑपरेटिंग सिस्टम टाइप करते वक्त शब्दों को पूरा करने का सुझाव भी देता है. इतना ही नहीं, इंडस क्षेत्रीय भाषाओं के बीच अनुवाद की सुविधा भी ऑफर कर रहा है. कंपनी ने इस टेक्नॉलजी का पेटेंट भी कराया है.

गूगल प्ले की तरह इंडस का एक अपना ऐप स्टोर है जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं में 35,000 ऐप्स ऑफर किए गए हैं. इंडस के उपभोक्ता अपने मोबाइल फोन पर ये ऐप्स डाउनलोड कर सकते हैं.

दूसरे ऑपरेटिंग सिस्टम के उलट इंडस के यूजर्स को ऐप खरीदने के लिए किसी ईमेल आईडी या फिर क्रेडिट कार्ड की जरूरत नहीं है. यूजर इंडस ऐप स्टोर पर खरीदे गए ऐप्स का बिल अपने फोन बिल के साथ भर सकता है.

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भारत में आधी से ज्यादा आबादी डेबिट या क्रेडिट कार्ड के बगैर है और एक बहुत छोटा हिस्सा ईमेल इस्तेमाल करता है.

देशमुख बताते हैं, "औसतन हमारा एक उपभोक्ता 25 ऐप्स इस्तेमाल करता है. इनमें से वे लोग भी शामिल हैं जो पहली बार स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हैं."

इंडस ने अपने ऑपरेटिंग सिस्टम के विस्तार के लिए माइक्रोमैक्स और इंटेक्स जैसी कंपनियों से करार भी किया है. बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए चीनी मोबाइल निर्माताओं से भी बात की जा रही है.

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इंडस फिलहाल 60 लाख स्मार्टफोनों पर उपलब्ध है. कंपनी का इरादा साल 2019 तक इस संख्या को 10 करोड़ तक पहुंचाना है.

कंपनी इस अवधि में इंडोनेशिया, नेपाल और बर्मा के बाजार में भी जगह बनाना चाहती है. लॉन्चिंग के साथ ही ग्राहकों को जोड़ने में इंडस कामयाब रही है लेकिन इसे आगे ले जाने का रास्ते में कई चुनौतियां हैं.

इसकी वजहें भी हैं. ऑपरेटिंग सिस्टम अपने उत्पादों को स्थानीय जरूरतों के मुताबिक ढालना चाहती हैं ताकि ग्राहकों की मांग पूरी की जा सके और भारतीय बाजार में दखल बढे.

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उदाहरण के लिए ऐंड्रॉयड को इस बात का भी फायदा मिलता है कि गूगल का सर्च इंजन नौ भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है.

एक ओर जहां ऐंड्रॉयड ज्यादातर ग्राहकों की पहली पसंद बना हुआ है, इंडस जैसे दूसरे खिलाड़ियों पर बाजार का दबाव बना रह सकता है.

उम्मीद की जा रही है कि अगले तीन सालों में भारत में 30 करोड़ लोग सामान्य फोन छोड़कर स्मार्टफोन इस्तेमाल करने लगेंगे और उनमें से ज्यादातर को अंग्रेजी नहीं आती.

इंडस जैसी कंपनियों को उम्मीद है कि ये नए ग्राहक सिर्फ कीमत की वजह से स्मार्टफोन नहीं खरीदेंगे बल्कि इसलिए भी खरीदेंगे कि उनका फोन उनकी अपनी भाषा में उपलब्ध होगा.

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