अंगूठे से भी छोटा है ये मेढक

  • 22 फरवरी 2017
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भारत में केरल और तमिलनाडु के जंगलों में चार नए और छोटे मेढक पाए गए हैं. ये इतने छोटे हैं कि आपके अंगूठे के नाखून पर बैठ जाएंगे.

दुनिया के सबसे छोटे मेढकों की श्रेणी में आने वाले ये मेढक जमीन पर रहते हैं और रात में कीट-पतंगों जैसी आवाजें निकालते हैं.

पश्चिमी घाट के जंगलों में इनके अलावा तीन बड़ी प्रजातियों के मेढक भी मिले हैं. इस तरह रात को पाए जाने वाले मेढकों की संख्या सात हो गई है.

भारत के पश्चिमी तट के समानांतर चलने वाली पर्वत श्रृंखलाओं में सैंकड़ों की तादाद में ऐसे दुर्लभ प्रजाति के पौधों और जन्तुओं की भरमार है. लेकिन इनका जीवन खतरे में है.

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कई सालों की खोज के बाद ये नई प्रजातियां मिली हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय की सोनाली ग्रेग बताती हैं, "ये नन्हें मेढक सिक्के या अंगूठे के नाखून पर भी बैठ सकते हैं."

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एकांतप्रिय मेढक

सोनाली नए जीवों को तलाश रही वैज्ञानिकों की खोजी टीम का हिस्सा हैं.

वे बताती हैं, "ये नन्हें मेढक इतनी अधिक तादाद में हमें मिले हैं कि हम हैरान हैं. लगता है आकार में बहुत छोटे होने, एकांतप्रिय और कीटों की तरह आवाज करने के कारण शोधकर्ता इन्हें अब तक नज़रअंदाज करते आ रहे थे."

रात में पाए जाने वाले मेढकों का समूह निक्टीबाट्रेचस नाम से जाना जाता है. इस समूह में पहले से 28 मान्यता प्राप्त प्रजातियां हैं. इनमें से तीन का आकार 18 मिमी से भी कम है.

यह समूह भारत के पश्चिमी घाटों पर पाया जाता है. माना गया है कि ये प्रजाति 7-8 करोड़ साल पुरानी है.

इनमें से अधिकांश नए मेढक मानव बस्ती से सटे सुरक्षित इलाकों में रहते है.

सबसे छोटा मेंढक

दुनिया का सबसे बड़ा मेढक

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शोध का नेतृत्व करने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसडी बीजू ने भारत में उभयचरों की 80 से अधिक नए नस्लों की खोज की है.

वे बताते हैं, "पश्चिमी घाट पर पाए जाने वाले मेढकों में से एक तिहाई, यानी लगभग 32 फीसदी से अधिक मेढक पहले से खतरे में हैं. नई मिली सात प्रजातियों में से पांच पर गंभीर खतरा है. उन्हें तुरंत संरक्षण देने की जरूरत है."

यूके चैरिटी में संरक्षण प्रमुख डॉक्टर लॉरेंस के अनुसार मेढकों की जो नई प्रजातियां मिली हैं उनका वैश्विक रूप से काफी महत्व है.

उनका कहना है कि "इस इलाके में उभयचरों की खास प्रजातियां मौजूद है. ये जैविक रूप से काफी विविधता लिए हुए हैं लेकिन साथ ही इस इलाके पर इंसानी हस्तक्षेप का खतरा बढ़ता जा रहा है."

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लॉरेंस के मुताबिक़, "इन नई प्रजातियों की खोज होने के बाद अब इस इलाके में उभयचरों को संरक्षण देने में हमारी क्या प्राथमिकताएं होनी चाहिए, उसे समझने में आसानी मिलेगी."

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