क्या आपको खाने में सुपरफूड की जरूरत है?

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भारत में ये सवाल इतनी बार पहले कभी नहीं पूछा गया होगा. क्या हमारा खान-पान सही है?

जाहिर है इसका जवाब ना में ही है. जब आप किसी फूड साइंटिस्ट से इसके बारे में पूछेंगे तो उनका जवाब भी इनकार में होगा.

भारत में खाये जाने वाले सबसे अच्छे खाने में अमूमन 65 फीसदी तक स्टार्च, 15 से 20 फीसदी प्रोटीन और 8 से 12 फीसदी के करीब वसा होता है.

लेकिन ज्यादातर भारतीय 80 फीसदी स्टार्च, 7 से 8 फीसदी प्रोटीन खाते हैं और खाने में वसा की मात्रा बढ़कर 6 से 15 फीसदी हो जाती

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वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के सेंट्रल फूड एंड टेक्नॉलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएफटीआरआई), मैसूर के डायरेक्टर प्रोफेसर राम राजशेखरन ने बीबीसी हिंदी को बताया, "हम न केवल ज्यादा वसा खा रहे हैं बल्कि सस्ता भी खा रहे हैं. ये पॉम ऑयल हो सकता है या ज्यादा प्रोसेस्ड किया गया तेल. हमें इसे बदलने की जरूरत है. हमें खान-पान के पुराने तौर-तरीकों की तरफ लौटने की जरूरत है जिनमें सबसे अच्छे भारतीय खाने को बढ़ावा दिया जाता था."

सुपरफूड

भारत के जाने-माने फूड एक्सपर्ट प्रोफेसर राजशेखरन ऐसा कहने वाले अकेले नहीं हैं जो ये कह रहे हैं कि भारतीयों को तेल-घी खाना बंद कर देना चाहिए या फिर अच्छी वसा के खपत को कंट्रोल करना चाहिए.

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Image caption ओमेगा-3 के ग्लोबल मैप में भारत

वास्तव में उन्हें ये कहना पड़ा, "घी अच्छा खाना है. लेकिन अगर आपका कॉलस्ट्रोल लेवल हाई है तो आप को घी खाना बंद कर देना चाहिए. इसे इस नजर से भी देखिए कि अगर भगवान कृष्ण चुरा कर घी खा रहे थे तो इसे अच्छा होना चाहिए."

लेकिन प्रोफेसर राजशेखरन सबसे अच्छे भारतीय खाने की उस खूबी के बारे में बताते हैं जिसके बारे में आम लोगों की समझदारी ज्यादा नहीं है. ये ओमेगा-3 फैटी एसिड है.

शाकाहारियों को आहत होने की जरूरत नहीं है. वे मछली या मछली का तेल खाने की सलाह नहीं दे रहे हैं. कुछ मांसाहारी लोग भी मछली का तेल खाने के नाम पर नाक-भौंह सिकोड़ सकते हैं.

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Image caption प्रोफेसर राजशेखरन

प्रोफेसर राजशेखरन और सीएफटीआरआई में उनके सहयोगियों ने एक पौधे में ओमेगा-3 की सबसे ज्यादा मात्रा खोज निकाली है.

किसानों के पास तकनीक

इसमें प्रूचर मात्रा में प्रोटीन, खाने लायक फायबर, एंटी-ऑक्सिडेंट्स, विटामिंस और दूसरे खनिज पदार्थ.

चिया और कोनिया बीजों के लिए सीएफटीआरआई ने ये तकनीक किसानों को मुहैया कराई और उन्होंने बड़े पैमाने पर इसे उपजाना भी शुरू कर दिया है.

मैसूर के आस-पास के किसानों को ये तकनीक हासिल होने के बाद इसके नतीजे देखने को मिल रहे हैं. अब मध्य वर्ग के लिए चिया महंगा नहीं रह गया है.

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Image caption चिया के पौधे

कभी ये दो से ढ़ाई हज़ार रुपये में एक किलो मिला करता था और अब बेंगलुरु जैसे शहर में 800 रुपये प्रति किलो से कम रेट पर उपलब्ध है.

मातृत्व स्वास्थ्य

प्रोफेसर राजशेखरन कहते हैं, "अगर आप अपने रोज के खाने में अधिकतम 15 ग्राम चिया के बीज लें तो ये बहुत अच्छा है. अगर आप हफ्ते में पांच बार भी चिया के बीज खाएं तो इससे भी काम चल जाएगा."

पिछले साल रिलीज हुए एक ग्लोबल स्टडी रिपोर्ट में बताया गया कि ओमेगा-3 के मामले में भारत खतरनाक स्तर पर पीछे है.

भारत में कुपोषण और मातृत्व स्वास्थ्य की जवाब चिया और क्विनोआ के बीजों में खोजा जा सकता है.

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प्रोफेसर राजशेखरन का कहना है, "आपको केवल स्कूली बच्चों के दोपहर के खाने में इसे मिलाने या ऊपर से छिड़कने भर की जरूरत है या फिर इसे दूध या छाछ में मिलाइए ताकि कुपोषण और मातृत्व स्वास्थ्य की चुनौती से निपटा जा सके."

क्विनोआ में प्रोटीन

चिया में प्रोटीन और वसा प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है. ये वसा अच्छी क्वॉलिटी का है क्योंकि यह ट्रिग्लिसेराइड को खत्म करता है.

क्विनोआ में प्रोटीन के अलावा स्टार्च है और यह ग्लूटेन फ्री है. दोनों ही बीजों में पर्याप्त मात्रा में फायबर भी उपलब्ध है.

इन दोनों बीजों को खाने के और भी फायदे हैं. इससे दूसरे फायदों के अलावा दिल से लेकर ब्लड शुगर तक सभी दुरुस्त रहते हैं.

सीएफटीआरआई की इस तकनीक को अपनाने वाले किसान भी खुश नज़र आ रहे हैं.

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Image caption माना जाता है कि मछली और मछली के तेल में ओमेगा-3 प्रचूर मात्रा में उपलब्ध रहता है

किसानों का एक बड़ा समूह इसे अपना रहा है और वे खुद को रैथ्र मित्र फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी कहते हैं. यह कोई सहकारी समिति नहीं है.

इस कंपनी के चेयरमैन कुरुबुर शांताकुमार कहते हैं, "हमने पिछले साल इससे 80 किसानों को जोड़ा. वे बहुत खुश है. एक अगर एक एकड़ में वे 75,000 रुपया खर्च करते हैं और कम से कम 350 किलो उत्पादन करते हैं तो वे तकरीबन 60,000 रुपया मुनाफा कमा लेते हैं. हमारी कंपनी उनकी उपज खरीद लेती है और उनके लिए हम इसे बेचते हैं."

फसल तैयार होने में 90 से 120 दिन लगते हैं. क्विनोआ की औसत उपज 500 किलो से 700 किलो प्रति एकड़ है जबकि चिया 350 से 400 किलो प्रति एकड़ की दर से उपजता है.

चिया और कोनिया की खेती के और भी फायदे हैं. इसमें मोटे अनाज रागी की तुलना में कम पानी लगता है और जानवर भी इसे पसंद नहीं करते हैं. कीटनाशकों की भी इसे जरूरत नहीं है. ये ऐसे किसी भी इलाके में उपजाया जा सकता है जहां तापमान 35 डिग्री सेल्सियस के करीब रहता हो.

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