बच्चों को कैसे बताएँ चरमपंथी हमलों के बारे में?

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दुनियाभर में चरमपंथी हमलों की खबरें हमेशा दहशत पैदा करने वाली होती हैं लेकिन माता-पिता के लिए यह एक और उलझन भरी समस्या लेकर आती है कि वो अपने बच्चों को कैसे इन घटनाओं के बारे में समझाएं.

क्या बच्चों को ख़बर देखने से ही रोक दिया जाए? सबसे अच्छा होगा कि टीवी ही बंद कर दिया दिया जाए? जो तस्वीरें वे टीवी पर ऐसी खबरों में देखेंगे वो बच्चों पर बुरा असर डालेंगी? या मुझे अपने बच्चों को क्या हुआ है, सच-सच बता देना चाहिए?

बच्चों से कैसे बात की जाए ?

ऐसे ना जाने कितने सवाल माता-पिता के सामने खड़े हो जाते हैं.

हादसों के बारे में बात करें

मनोविज्ञान के क्षेत्र से जुड़े हुए कुछ पेशेवर लोगों का मानना है कि इन सवालों से बचने की बजाए हमें बच्चों से इस बारे में बात करनी चाहिए.

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क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट एमा सिट्रॉन का कहना है कि परिवार के लोगों को बच्चों के साथ ऐसी त्रासदियों के बारे में बात करने से नहीं बचना चाहिए. उनसे खुलकर इस बारे में बात करनी चाहिए.

एमा सिट्रॉन बच्चों के मनोविज्ञान पर काम करती हैं.

उनका मानना है, "बच्चों को मूल तथ्यों से वाकिफ़ करवाएं. उन्हें वो सब बताएं जो वो जानना चाहते हैं. उनसे पूछे कि वो क्या जानना चाहते हैं फिर उन्हें वो जानकारी मुहैया कराएं."

"उनका साथ देकर उन्हें सहज बनाए और हमेशा उनके साथ खड़े रहे, उन्हें गले लगाए, उनके साथ रोएं भी जब वो रोएं तो. उनके साथ बिलकुल वैसा ही व्यवहार करें, जैसा वो भावुक होकर कर रहे हैं."

क्या टीवी बंद कर देना चाहिए

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रॉयल कॉलेज ऑफ़ साइकैट्रिस्ट के डॉक्टर बर्नाडका डुबिका का मानना है कि बच्चे ऐसी घटनाओं की ख़बरें ना देखे इसके लिए टीवी बंद करना आज के समाज में व्यवहारिक नहीं है.

वो कहते हैं, "माता-पिता पूरी तरह से अपने बच्चों तक इस तरह की ख़बरे पहुंचने से रोक नहीं सकते हैं. वास्तविकता तो यह है कि चौबीस घंटे आज की तारीख में बच्चे और नौजवान खबरों की दुनिया से घिरे रहते हैं. अगर बच्चों तक खबर नहीं पहुंचने देंगे तो भी उन्हें कहीं और से पता चल जाएगा."

सिट्रॉन कहती हैं, "इन घटनाओं के बारे में बात तो करनी चाहिए लेकिन अनावश्यक विस्तार से चीज़ें बताने से बचना चाहिए."

बातचीत में सावधानी

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सिट्रॉन कहती हैं कि माता-पिता को अपने बच्चों के साथ इस तरह की बातचीत का तरीका विकसित करना चाहिए. इसके लिए कुछ बहुत ही साधारण शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए.

वो कहती हैं, "हम नहीं चाहते हैं कि हमारे बच्चे दहशत के माहौल में बाहर निकले. हम चाहते हैं कि वो एक समान्य, खुशनुमा और स्वस्थ्य ज़िंदगी जिएं."

अगर किसी को किसी घटना को लेकर इस तरह के सवाल का सामना करना पड़ जाए कि, "यह दोबारा से हो सकता है मम्मी?" तो सिट्रॉन सलाह देती हैं कि हमें ईमानदारी से सच बताना चाहिए लेकिन उन्हें साथ में आश्वस्त भी करना चाहिए ताकि उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित ना हो.

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