सेक्स पार्टनर को लेकर महिलाओं की पसंद

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1999 में आई फ़िल्म 'अमरीकन पाय' के उदाहरण से अगर बात कहनी हो और आप ये जानना चाहें कि किसी महिला के कितने सेक्शुअल पार्टनर हैं? तो महिला के जवाब को तीन से गुना कर लीजिए. वहीं पुरुषों के सेक्शुअल पार्टनर की बात हो तो पुरुष जितनी संख्या बताएं, उसमें उसी संख्या से भाग दे दीजिए.

जेसिका (अमरीकन पाय फ़िल्म की अभिनेत्री टारा रीड) फ़िल्म में तीन गुना के नियम को बिल्कुल गुरुत्वाकर्षण के अनुरूप साइंस बताती हैं.

फ़िल्म से अलग हम बात करते हैं 1859 की, जब चार्ल्स डार्विन के सिद्धांतों ने बताया था कि पुरुष जैविक रूप से असंयमी होते हैं जबकि महिलाएं स्वाभाविक रूप से पवित्र यौन संबंधों को चाहती हैं.

हालांकि वक़्त के साथ रीति-रिवाज बदले हैं. अब भी पारंपरिक मान्यता के हिसाब से पुरुषों की कामुकता अनियंत्रित होती है और महिलाओं को इसमें शर्मिंदा किया जाता है.

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साइंस जर्नलिस्ट एंगेला साइनी ने इन धारणाओं को विज्ञान की कसौटी पर कसा है. साइनी ने बीबीसी से कहा, ''पिछले 30-40 सालों में पहले के मुकाबले ज़्यादा सही तस्वीर उभरकर सामने आई है. सेक्स से जुड़ी सारी मान्यताएं धारणाओं और परंपराओं के आधार पर थीं न कि विज्ञान और सबूतों के आधार पर.''

''इसमें यह बताया गया है कि महिलाएं कैजुअल सेक्स के लिए ओपन होती हैं. क्या वे अपने पार्टनर चुनने को लेकर सतर्क रहती हैं- हां, लेकिन इसमें भी वे कम खुली नहीं होती हैं.''

'महिलाओं को धोखा देने की ज़रूरत'

डार्विन का रूढ़िवादी सिद्धांत लंबे समय से लोगों को प्रभावित करती रही. प्लेबॉय के 1978 के अंक में एक स्टोरी छपी थी कि क्या पुरुषों को अपनी महिलाओं को धोखा देने की ज़रूरत है?

इस मामले में नया विज्ञान हामी भरता है. जब बिल क्लिंटन का कुख़्यात प्रेम संबंध सामने आया तो न्यूयॉर्कर ने क्लिंटन के व्यवहार का बचाव किया था.

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न्यूयॉर्कर ने क्लिंटन का विकासवादी मनोविज्ञान के आधार पर बचाव किया था. उस आर्टिकल का शीर्षक था- बॉय्ज विल बी बॉय्ज'. लेकिन साइनी ने बीबीसी को 2013 में जर्मनी में हुई एक स्टडी के बारे में बताया. यह रिपोर्ट 1970 के दशक के एक प्रयोग पर आधारित थी.

इस स्टडी में पुरुषों और महिलाओं के एक ग्रुप को शामिल किया गया था. इन्हें अजनबी लोगों से सेक्स के लिए कहना था. प्रयोग के शुरुआती जो नतीजे आए उसमें पुरुषों की तरफ़ से हां था पर महिलाओं की तरफ़ से ना था.

सामाजिक मान्यताओं की भूमिका

इस मामले में पुरुष ज़्यादा मज़बूती के साथ खड़े रहे. हालांकि इस मामले में साइनी ने कहा कि यहां कई दूसरे कारण भी हैं. इनमें हिंसा का ख़तरा या सामाजिक कंलक की जैसी चीज़ें अहम हैं.

ऐसे में 2013 में इस पर एक स्टडी गोपनीय ढंग से हुई. पुरुषों और महिलाओं को संभावित पार्टनरों की तस्वीरें दिखाई गईं और उनसे पूछा गया कि क्या वे इनके साथ सोना चाहते हैं.

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इस पर दोनों ने हामी भरी. पुरुषों ने आख़िरकार महिलाओं की तुलना में ज़्यादा पार्टनर चुने लेकिन महिलाएं भी समान रूप से कैजुअल सेक्स के लिए सहमत थीं. साइनी के मुताबिक महिलाएं पार्टनर चुनने में सतर्क होती हैं लेकिन संयमी नहीं होतीं.

डार्विन का सिद्धांत उस आइडिया पर आधारित था जिसमें बताया जाता है कि पुरुष जैविक रूप से ज़्यादा उत्तेजित होते हैं. महिलाओं के साथ प्रेग्नेंसी और बच्चों का पालन-पोषण जुड़ा होता है इसलिए वे वैवाहिक जीवन पर भरोसा करती हैं.

इस तरह की सोच आज भी ज़िंदा है. हालांकि साइनी कहती हैं कि डार्विन ने सामाजिक संदर्भों के आधार पर बातें कही हैं. ये सारी चीज़ें पुरातन समाज में फ़िट बैठती हैं. साइनी का कहना है कि पुराने समय में महिलाओं की कामुकता को दबाकर रखा गया था.

उन्होंने कहा कि डार्विन ने इस बात की उपेक्षा की है कि महिलाओं की कामुकता को पितृसत्तात्मक समाज में हज़ारों सालों से दबाकर रखा गया था. ग़ैर-पश्चिमी समाजों का मानना है कि महिलाओं का पारंपरिक यौन व्यवहार जैविक गुणों के मुक़ाबले सांस्कृतिक मूल्यों पर ज़्यादा निर्भर है.

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