कैंसर के इलाज में कारगर डीएनए टेस्ट!

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बेहतर इलाज़ के लिए कैंसर मरीज़ों को नियमित डीएनए टेस्ट कराना चाहिए.

ब्रिटेन के मुख्य मेडिकल अफ़सर प्रोफ़ेसर डेम सैली डेवीज़ ने ये बात अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कही है.

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ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) में कैंसर के मरीजों समेत 31 हज़ार मरीजों ने अपनी डीएनए प्रोफ़ाइलिंग कराई है.

डेम सैली चाहती हैं कि ब्लड टेस्ट और बायोप्सी की तरह ही होल जीनोम स्क्रीनिंग (डब्ल्यूजीएस) को मानक जांच का हिस्सा बना देना चाहिए.

मनुष्य में क़रीब 20,000 जीन होते हैं. असल में जीन डीएन कोड या निर्देश होते हैं जो ये निर्धारित करते हैं कि शरीर कैसे काम करे.

इन्हीं कोडों में थोड़ी सी गड़बड़ी कैंसर का कारण बन जाती है.

जांच

इनमें से कुछ गड़बड़ियां तो अनुवांशिक होती हैं, लेकिन आम तौर पर स्वस्थ कोशिकाओं में ये गड़बड़ी आ जाती है.

डब्ल्यूजीएस जांच में क़रीब 700 पाउंड (क़रीब 58.5 हज़ार रुपये) का खर्च आता है. ट्यूमर और सामान्य कोशिकाओं की डीएनए की तुलना कर इस जांच से जीन्स की गड़बड़ियों का पता लगाया जा सकता है.

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डेम सैली कहती हैं कि दो तिहाई मामलों में यह जानकारी बीमारी की पहचान और इलाज़ में काफ़ी कारगर हो सकती है.

ये जांच डॉक्टरों को मरीज़ के लिए सही दवा चुनने में मदद कर सकती है.

डब्ल्यूजीएस से ये भी पता चल सकता है कि किस मरीज़ को फ़ायदा होगा, ताकि उन्हें ग़ैरज़रूरी दवाएं और कष्टकारी साइड इफ़ेक्ट से बचाया जा सके.

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रोग की पहचान

इस तकनीक की पहुंच सुलभ होने से दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों को काफ़ी फ़ायदा पहुंच सकता है क्योंकि इससे रोग की पहचान तेज़ी से की जा सकती है.

ट्यूबरक्लोसिस या टीबी की बीमारी का पता लगाने और उसके बेहतर इलाज के लिए डॉक्टर पहले से इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं.

डेम सैली का कहना है कि मरीज़ों को इस बात का भरोसा दिलाया जा सकता है कि उनका जेनेटिक डेटा सुरक्षित रखा जाएगा और उनकी निजता को बनाए रखा जाएगा.

डेम सैली ने बीबीसी ब्रेकफ़ास्ट को बताया कि बहुत पैसा ख़र्च हो रहा था, क्योंकि इस समय ये घरेलू उद्योग जैसा हो गया था.

केंद्रीयकृत प्रयोगशालाएं स्थापित करने से इस पैसे का सही सदुपयोग होगा.

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