समुद्री लहरों को रोकता प्लास्टिक मलबा

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Image caption कैप्टन मूरे की टीम ने बताया कि दक्षिणी प्रशांत में 9,65,000 स्क्वायर मील तक माइक्रो प्लास्टिक फैला हुआ है

कैप्टन चार्ल्स मूरे नाम के एक नाविक जिन्होंने कई साल समुद्र की यात्रा में बिता दिए. अपनी इस सैकड़ों-हज़ारों मील की समुद्री यात्रा में उन्होंने पता लगाया कि दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में 9,65,000 वर्ग मील तक सिर्फ प्लास्टिक मलबा फैला हुआ है.

कैप्टन मूरे हाल ही में ईस्टर आइलैंड और रोबिंसन क्रुसो आइलैंड के अभियान से लौटे हैं.

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वो उस टीम का हिस्सा थे जिसने साल 1997 में उत्तर प्रशांत चक्र से पहले समुद्री कचरे के ढेर का पता लगाया था. इसके बाद उनका ध्यान दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र के प्लास्टिक मलबे पर गया.

दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में इतनी बड़ी मात्रा में प्लास्टिक मलबा मिलने पर यूट्रेच यूनिवर्सिटी के समुद्र विज्ञानी डॉ. एरिक वैन सेबिल कहते हैं कि कैप्टन मूरे और उनके साथियों ने समुद्री प्लास्टिक के बारे में बहुत बड़ी खोज की है, वैज्ञानिकों के पास अभी इस विषय से जुड़ी बेहद कम जानकारी है इसलिए जो कुछ भी हमें मिलता है वह बेहद महत्वपूर्ण है.

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Image caption कैप्टन चार्ल्स मूर 1997 से समुद्र में प्लास्टिक कचरे की खोज कर रहे हैं

समुद्र में अब आसानी से दिख जाता है प्लास्टिक

पहले यह समझा जाता था कि समुद्री कचरा सिर्फ उत्तरी प्रशांत में है, लेकिन अब वह दक्षिणी प्रशांत, आर्किटक और भूमध्य इलाकों में भी दिखने लगा है. डॉ. वैन सेबिल के अनुसार 'समुद्र में प्लास्टिक मलबा अब बहुत आसानी से दिख जाता है, जो बेहद चिंताजनक है.'

कैप्टन मूरे ने अल्गालिटा मरीन रिसर्च नाम का गैर-लाभकारी संगठन भी बनाया है जिसका मकसद समुद्र में बढ़ते प्लास्टिक कचरे का खोजना और उसके दुष्परिणामों का पता लगाना है.

वैज्ञानिक भी मानते हैं कि समुद्र में प्लास्टिक कचरे की बढ़ती मात्रा चिंताजनक है, लेकिन वे उसके सही क्षेत्र के बारे में अभी भी स्पष्ट नहीं हैं.

डॉ. वैन सेबिल कहते हैं कि जब तक प्लास्टिक कचरे के सही स्थान का पता नहीं लग सकेगा तब तक हम उससे होने वाले दुष्परिणामों और उससे निपटने के उपायों पर भी ज्यादा नहीं सोच पाएंगे.

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Image caption समुद्र में सबसे ज़्यादातर कचरा मैदानी इलाकों से हवा में उड़कर पहुंचता है

समुद्री जीवन पर बुरा असर

कैप्टन मूरे को उम्मीद है कि दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में उनके द्वारा की गई खोज वैज्ञानिकों के काम आएगी. कैप्टन मूरे की टीम प्लास्टिक मलबे से समुद्री जीवन पर होने वाले असर का पता लगाने पर भी काम कर रही है.

गहरे समुद्र में पाई जाने वाली लैंटर्न मछली, बड़ी व्हेल और पेंग्विन का भोजन होती है. लैंटर्न द्वारा प्लास्टिक कचरा खाने से बड़ी मछलियों के जीवन पर भी उसका असर देखने को मिल सकता है.

अमेरिकी नौसेना में मरीन बायोलॉजिस्ट क्रिस्टियाना बोर्जर ने बीबीसी को बताया कि 'समुद्र में प्लास्टिक मलबे से होने वाले नतीजों पर बहुत कम अध्ययन हो रहा है, वैज्ञानिकों को इसे गंभीरता से लेना चाहिए और प्रभावित इलाकों की तरफ पूरी दुनिया का ध्यान लाना चाहिए.'

मिस बोर्जर बताती हैं कि उन्होंने कई इलाकों से ऐसी मछलियां देखी हैं जिनके शरीर के भीतर प्राकृतिक खाने से ज्यादा प्लास्टिक कचड़ा भरा हुआ था.

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Image caption मानव द्वारा फैलाया गया कचरा समुद्र के तटों को बहुत ज्यादा प्रदूषित कर चुका है

समुद्री तटों पर सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा

समुद्र मे सबसे ज़्यादा प्लास्टिक मैदानी इलाकों से पहुंचता है, प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े हवा में उड़कर समुद्र में आ गिरते हैं और धीरे-धीरे अपना आकार बड़ा बना लेते हैं.

हालांकि कैप्टन मूरे का कहना है कि दक्षिणी प्रशांत में पाया जाने वाला प्लास्टिक मलबा उत्तरी गोलार्ध से अलग है. यहां पर ज़्यादातर प्लास्टिक फिशिंग इंडस्ट्री से आया है. फिलहाल वैज्ञानिकों का अधिक ध्यान मानवी क्षेत्र के पास वाले समुद्री इलाकों पर है.

डॉ. वैन सेबिल मानते हैं कि समुद्र के बीच जाकर प्लास्टिक मलबे के बारे में पता करने से पहले समुद्री किनारों पर बढ़ते कचरे को कम करने पर विचार करना चाहिए क्योंकि सबसे अधिक कचरा यहीं बढ़ रहा है.

वो कहते हैं कि नुकसान मानव के साथ-साथ समुद्री जीवों को भी हो रहा है. उनका मानना है कि प्लास्टिक प्रदूषण की कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं है, इसलिए सभी देशों को मिलकर इस पर विचार करना चाहिए.

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