जीवनशैली में ये 9 साथ, तो हो सकते हैं पागल

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लैंसेट में एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक़ पागलपन के हर तीन से एक मामले को रोका जा सकता है अगर लोग जीवन में मस्तिष्क के स्वास्थ्य का ख़्याल रखें.

अध्ययन के मुताबिक पढ़ने-लिखने की आदत में कमी, सुनने में परेशानी, धूम्रपान और शारीरिक तौर पर कम सक्रिय होने से पागलपन का ख़तरा बढ़ सकता है.

लंदन में अलज़ाइमर की एसोसिएशन इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में यह अध्ययन पेश किया गया है.

अध्ययन के मुताबिक़, एक अनुमान है कि दुनियाभर में 2050 तक क़रीब 13.1 करोड़ लोग पागलपन का शिकार हो सकते हैं.

अनुमान के मुताबिक़, वर्तमान में 4.7 करोड़ लोग इससे पीड़ित हैं.

अध्ययन के मुख्य लेखक और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर गिल लिविंग्सटन ने कहा, "पागलपन का इलाज बाद में किया जा सकता है, लेकिन मानसिक बदलाव बहुत साल पहले ही शुरू हो जाते हैं."

उन्होंने कहा, "अगर अभी इसके लिए एक्शन लिया जाएगा तो आगे चलकर पागलपन के शिकार लोगों और उनके परिवारों की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव देखा जा सकता है. इससे समाज को भी सुधारा जा सकेगा."

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24 अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की ओर से किए गए इस अध्ययन के मुताबिक़, किसी भी व्यक्ति में पागलपन का ख़तरा बढ़ने और घटने की सबसे बड़ी वजह उनका रहन-सहन होता है.

ये हैं बड़े फ़ैक्टर

  1. आधी उम्र में सुनने की समस्या - 9%
  2. शिक्षा पूरी न कर पाना - 8%
  3. धूम्रपान- 5%
  4. डिप्रेशन - 4%
  5. शारीरिक सक्रियता में कमी - 3%
  6. समाज से दूरी यानी एकाकीपन- 2%
  7. हाई ब्लड प्रेशर - 2%
  8. मोटापा- 1%
  9. टाइप 2 डायबिटीज - 1%
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कैंसर से भी बचाव

ये रिस्क फ़ैक्टर क़रीब 35 फीसदी तक होते हैं जिन पर काबू किया जा सकता है लेकिन 65 फीसदी अन्य फ़ैक्टर हैं जिनमें व्यक्तिगत तौर पर कोई नियंत्रण नहीं होता.

इससे बचने के उपायों का जिक्र करते हुए स्टडी में कहा गया कि धूम्रपान न करना, व्यायाम करना, वजन सही रखना, हाई ब्लडप्रेशर और डायबिटीज का इलाज़ न सिर्फ पागलपन, बल्कि कैंसर के ख़तरे से भी बचाता है.

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